सृष्टि, ईश्वर और धर्म
 



मनुष्य और उसके कर्म





सब से पहले तो हमें यह समझना होगा कि भाग्य क्या है? वास्तव में भाग्य किसी घटना के लिए ईश्वर द्वारा निर्धारित चरणों और उसके परिणाम को कहा जाता है। ईश्वर द्वारा निर्धारित भाग्य के कई प्रकार हैं किंतु यहां पर हम अत्यधिक जटिल चर्चा से बचते हुए केवल व्यवहारिक भाग्य के बारे में बात करेंगे जिसका प्रभाव स्पष्ट रूप से मनुष्य पर पड़ता और जिसका वह आभास करता है किंतु प्रश्न यह है कि व्यवहारिक भाग्य है क्या?



ईश्वर द्वारा भाग्य के निर्धारण का अर्थ यह है कि हम विभिन्न प्रक्रियाओं और घटनाओं को उसके सभी चरणों के साथ अर्थात आरंभ से अंत तक ईश्वर के तत्व ज्ञान व सूझबूझ के अंतर्गत समझें। अर्थात यह विश्वास रखें कि जो कुछ हो रहा है वह ईश्वर का इरादा है और ईश्वर ने चाहा है कि ऐसा हो इसलिए यह हो रहा है।



बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए हम कह सकते हैं कि जैसाकि हर वस्तु की उपस्थिति, ईश्वर की अनुमति और इच्छा पर निर्भर होती है और उसकी अनुमति के बिना किसी भी वस्तु का अस्तित्व संभव ही नहीं है उसी प्रकार हर वस्तु की उत्पत्ति को भी ईश्वर द्वारा निर्धारित भाग्य और सीमा व मात्रा से संबंधित समझना चाहिए क्योंकि ईश्वर की इच्छा के बिना कोई भी वस्तु अपने विशेष रूप व आकार तथा मात्रा तक नहीं पहुंच सकती और न ही अपने अंत तक पहुंच सकती है किंतु प्रश्न यह है कि यदि ऐसा है तो फिर कामों पर मनुष्य के अधिकार का क्या अर्थ है?



भाग्य निर्धारित होने की चर्चा इतनी ही जटिल है कि बहुत से विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी इस चर्चा के कारण अपनी राह से भटक गये। वास्तव में इस विषय को समझना बहुत कठिन है कि हर प्रक्रिया ईश्वर से संबंधित है और उसके सभी चरणों का ईश्वर ने निर्धारित किया है जिसे भाग्य कहा जाता है किंतु इसके साथ ही मनुष्य अपने कामों में स्वतंत्र भी है और उसका अपने कामों पर अधिकार भी है।



बहुत से लोग जो यह मानते थे कि भाग्य ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है और हर काम व प्रक्रिया उससे संबंधित होती है, मनुष्य को अपने कामों में कठपुतली और विवश समझने लगे किंतु कुछ अन्य बुद्धिजीवी जिन्हें मनुष्य को विवश समझने से पाप व पुण्य तथा प्रतिफल की व्यवस्था की ख़राबी का ध्यान था, मनुष्य को पूर्ण रूप से स्वतंत्र और ईश्वरीय इरादे को मनुष्य के कामों से पूर्ण रूप से अलग समझने लगे किंतु हमारा यह कहना है कि मनुष्य के काम और अंजाम का निर्धारण एक सीमा तक ईश्वर द्वारा निर्धारित भाग्य से और किसी सीमा तक मनुष्य के अपने कामों द्वारा होता है किंतु इसके लिए हमें एक परिणाम के बहुकारक के नियम को समझना होगा। अर्थात यह मानना होगा कि कोई परिणाम या काम संभव है कई कारकों द्वारा इस प्रकार से हुआ हो कि हर कारक की अपनी भूमिका हो।



एक प्रक्रिया के कई कारक की कल्पना की कई दशाएं हो सकती हैं। जैसे कई कारक ऐसे हों जिनका प्रभाव एक साथ प्रक्रिया पर पड़ता है। जैसे बीज को पौधा बनाने के लिए उसे एक साथ ही बीज, पानी और तापमान की आवश्यकता हीती है और यह सारे कारक एक साथ उस पर अपना प्रभाव डालते हैं।



बहुकारक वाली प्रक्रिया की एक दशा यह है कि कई कारक एक के बाद एक अपना प्रभाव डालें जैसे एक के बाद एक इंजन चलाने से अंत में हवाई जहाज़ उड़ने लगता है।



बहुकारकों वाली प्रक्रिया के कई कारकों की एक दशा यह होती है कि कारक का प्रभाव अपने पहले वाले पर निर्भर हो जैसे क्रमबद्ध सड़क दुर्घटना या फिर मनुष्य का इरादा, फिर हाथ में क़लम उठा कर उसे चलाना तथा लिखना। तो यहां पर सारे कारक एक दूसरे पर निर्भर हैं और जब सारे कारक अपना काम करेंगे तो ही लिखावट होगी।



कई कारकों की एक दशा यह भी है कि कारकों का अस्तित्व ही अपने पहले वाले कारक पर निर्भर हो। यह दशा, पहली वाली दशा से भिन्न है क्योंकि पहली वाली दशा में कारक का प्रभाव अपने पहले वाले कारक के प्रभाव पर निर्भर होता है स्वयं कारक का अस्तित्व नहीं। जैसे क़लम की लिखावट मनुष्य के हाथ हिलाने पर निर्भर है किंतु स्वंय क़लम नहीं।



इस प्रकार से यह स्पष्ट हो गया कि एक परिणाम के कई कारक संभव हैं। बल्कि यह कहें कि कुछ प्रक्रियाएं ऐसी हैं जिनके लिए कई कारकों का होना आवश्यक है। इस प्रकार से यह भी स्पष्ट हो गया कि मनुष्य जो काम करता है उसके दो कारक होते हैं एक तो मनुष्य का इरादा और दूसरे ईश्वर का इरादा किंतु मनुष्य के काम उन बहुकारक परिणामों में से हैं जिनके कारक तीसरी दशा से संबंध रखते हैं अर्थात मनुष्य के काम वह परिणाम हैं जिनके कई कारकों में से हर कारक अपने- अपने वाले कारक पर निर्भर होता है और पहले वाले कारक के बिना दूसरे कारक का अस्तित्व ही संभव नहीं है।



अर्थात मनुष्य यदि कोई काम करता है तो उसका इरादा उसका कारक होता है और स्वंय मनुष्य अपने इरादे का कारक होता है और ईश्वर जिसने उसकी रचना की वह मनुष्य और उसके इरादे का कारक होता है। इस प्रकार से मनुष्य का हर काम कई कारकों का परिणाम होता है।



यदि कोई यह समझ ले कि एक परिणाम के कई कारक होते हैं फिर उसे भाग्य और उस पर मनुष्य और ईश्वर के प्रभाव की बात भी अच्छी तरह से समझ में आ जाएगी किंतु भाग्य के बारे में पूरी बात समझने के लिए आप हमारी अगली चर्चा अवश्य पढ़िये।













मनुष्य का भाग्य एवं कर्म







मनुष्य जो कुछ करता है या जो कुछ उसके साथ होता है उसके दो कारक होते हैं एक स्वंय मनुष्य का इरादा और दूसरे ईश्वर का इरादा किंतु प्रश्न यह है कि यदि भाग्य है तो फिर कैसा है, अर्थात यदि मनुष्य और ईश्वर दोनों का इरादा प्रभावी है तो किस प्रकार से और भाग्य की रचना कैसे होती है?



इस प्रश्न के उत्तर में हम कहेंगे कि मनुष्य जो इरादा करता है और जो काम करता है उससे ऊपर के स्तर पर ईश्वर का इरादा होता है अर्थात मनुष्य का कोई भी काम ईश्वर के इरादे व ज्ञान से बाहर नहीं होता किंतु काम करने वाला स्वंय मनुष्य होता है। भाग्य में मनुष्य और ईश्वर दोनों का प्रभाव होता है इस बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए हम एक उदाहरण देते हैं जो किसी सीमा तक इस विषय को स्पष्ट कर सकता है। उदाहरण स्वरूप कोई व्यक्ति जब हवाई यात्रा का इरादा करता है तो सब से पहले किसी एयर लाइन का चयन करता है उसके बाद वहां जाकर टिकट ख़रीदता है समय और फ्लाइट का चयन करता है और निर्धारित समय पर एयरपोर्ट पहुंच जाता है और फिर समय आने पर विमान में सवार हो जाता है और विमान उड़ान भर लेता है। इस पूरी प्रक्रिया में कोई भी नहीं कहेगा कि इसमें उस यात्री का इरादा नहीं था और वह विवश था वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र होता है किंतु उसके इरादे के ऊपर भी कुछ लोगों का इरादा होता है जो उसकी यात्रा के समय व अवधि को प्रभावित करता है जैसे एयर लाइन या एयर पोर्ट के अधिकारी चाहे तो उड़ान का समय बदल सकते हैं यहां पर यात्री विवश हो जाएगा या फिर उड़ान भरने के बाद यदि यात्री वापस जाना चाहे तो विमान वापस नहीं होगा और वह विवश होगा किंतु यदि विमान चालक, एयर लाइन या कंट्रोल टावर या सुरक्षा अधिकारी चाहें तो विमान वापस भी हो सकता है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि एक व्यक्ति की यात्रा में किसी सीमा तक और कुछ मामलों में यात्री स्वतंत्र होता है किंतु कुछ विषयों में वह विवश होता है।



अब आते हैं भाग्य की ओर भाग्य का मामला भी कुछ इसी प्रकार है। ईश्वर ने इस संसार के लिए कुछ भौतिक और आध्यात्मिक नियम बनाएं हैं और कुछ ऐसे विषय हैं जो एक दूसरे से संबंधित और एक दूसरे पर निर्भर हैं। अब उदाहरण स्वरूप इस भौतिक संसार का यह नियम है कि यदि कोई व्यक्ति सैंक़डों मीटर ऊंची इमारत से गिरेगा तो उसके शरीर को जो नुक़सान पहुंचेगा उससे उसकी मृत्यु हो जाएगी यह ईश्वर द्वारा बनाए गये शरीर की विशेषता है अब यदि कोई सैंकड़ों मीटर ऊंची इमारत से छलांग लगा देता है तो ईश्वर के भौतिक नियमों के अंतर्गत और ईश्वर द्वारा बनाए गये शरीर की विशेषताओं के कारण उसे मर जाना होगा। यह नियम है और छलांग लगाने के बाद न तो वह व्यक्ति वापस लौट सकता है और न ही नियम के अनुसार वह जीवित रह सकता है। अर्थात छलांग लगाने के बाद वह नीचे गिरने और मरने पर विवश है किंतु यह विवशता मनुष्य के लिए है और छलांग लगाने के बाद मनुष्य के इरादे की सीमा समाप्त हो जाती है किंतु ईश्वर का इरादा रहता है और यदि ईश्वर चाहे तो मनुष्य के विवश होने के बावजूद अपने इरादे से उसे नीचे गिरने से रोक सकता है और उसे जीवित रख सकता है। ठीक उसी प्रकार जैसे विमान यात्री विवश होता है किंतु दूसरे कुछ लोग विमान को वापस लौटाने में विवश नहीं होते।



ईश्वर ने इस संसार के लिए कुछ नियम बनाए हैं उनमें से कुछ भौतिक हैं और कुछ आध्यात्मिक। कुछ काम ऐसे होते हैं जो मनुष्य के जीवन के आगामी चरणों को निर्धारित करते हैं उदाहरण स्वरूप पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम तथा अन्य ईश्वरीय मार्गदर्शकों के कथनों के अनुसार जो अपने माता- पिता के साथ दुर्व्यवहार करता है उसकी संतान भी उसके साथ वैसा ही करती है और उसकी रोज़ी और आजीविका कम हो जाती है। उदाहरण स्वरूप किसी व्यक्ति ने यदि अपने माता- पिता के साथ दुर्व्यवहार किया हो और उसके माता- पिता मर गये हों और उनकी मृत्यु के दसियों वर्ष पश्चात अनथक परिश्रम के के बाद भी उस व्यक्ति के व्यापार या आय में उस प्रकार वृद्धि न हो जो वही व्यापार या काम करने वाले अन्य लोगों की आय में होती है तो विदित रूप से लोग यही कहेंगे कि यह उसका दुर्भाग्य है और उसके भाग्य में अधिक लाभ नहीं लिखा था किंतु यदि हम उसका अतीत देखें तो हमें नज़र आएगा कि यह भाग्य उसने स्वंय लिखा है अर्थात जब उसने अपने माता- पिता के साथ बुरा व्यवहार किया तो फिर उसके भाग्य में कम रोज़ी और अपनी संतान की ओर से दुःख उठाना ईश्वर ने लिख दिया अब वह चाहे जितना परिश्रम करे या अपनी संतान के साथ चाहे जितनी भलाई करे उसे अपने किये का दंड अवश्य मिलेगा। इस प्रकार से हम यह समझ सकते हैं मनुष्य के भाग्य में किस प्रकार से ईश्वर और मनुष्य दोनों का इरादा होता है। अर्थात ईश्वर ने इस संसार के लिए जो व्यवस्था बनायी है उसमें मनुष्य के हर काम का एक प्रभाव और परिणाम है जो इस सांसारिक व्यवस्था का भाग है। यदि मनुष्य अपने इरादे से वह काम कर लेता है तो फिर आगे चल कर अपने जीवन में अपने अतीत के उस काम का प्रभाव उसे अवश्य मिलेगा। अच्छे काम का अच्छा और बुरे काम का बुरा प्रभाव। इस प्रकार से हम समझ सकते हैं कि किसी सीमा तक उन लोगों की बात भी सही है जो यह कहते हैं मनुष्य अपना भाग्य अपने हाथ से लिखता है।



अलबत्ता यहां पर एक बात यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि धार्मिक और इस्लामी दृष्टि से हर दुख और समस्या, अतीत में की गयी किसी बुराई या हर सुख और समृद्धि अतीत में की गयी अच्छाई का ही परिणाम नहीं होती। अर्थात यह सही नहीं है कि हम यदि आज किसी को समस्याओं में घिरा हुआ पाएं तो तत्काल यह निर्णय कर लें कि अवश्य उसने अतीत में कोई बुराई की होगी इस लिए ईश्वर ने उसके भाग्य में समस्याएं और दुःख लिख दिए हैं। या किसी को समृद्ध देखें तो कहें कि अवश्य उसने कोई बहुत भला काम किया होगा इस लिए ईश्वर ने उसके भाग्य में सुख लिख दिया है।



कभी- कभी यह भी होता है कि ईश्वर अपने उपर लोगों के विश्वास और उनकी धर्मपरायणता की परीक्षा के लिए दुःख देता है और देखता है कि यह लोग दुःख में क्या करते और फिर दुख और समस्याओं में उसके व्यवहार के आधार पर उन्हें संसार या परलोक में दंड या प्रतिफल मिलता है। इसी प्रकार ईश्वर कभी- कभी लोगों को सुख व समद्धि देकर आज़माता है कि इस दशा में उनका व्यवहार क्या होता है और फिर उसी आधार पर उन्हें लोक व परलोक में प्रतिफल मिलता है।



इसके साथ यह बात भी उल्लेखनीय है कि ईश्वर के निकट यह संसार कुछ दिनों तक रहने वाला है और मनुष्य का जीवन अत्यन्त सीमित होता है इस लिए ईश्वर जिन लोगों से प्रेम करता है उनकी भलाईयों का प्रतिफल परलोक के लिए सुरक्षित रखता है क्योंकि परलोक का प्रतिफल सदा रहेगा जबकि संसार में मिलने वाला इनाम कुछ दिनों तक होगा ।



इसी प्रकार ईश्वर जिन भले लोगों से प्रेम करता है उनकी छोटी- मोटी बुराईयों का दंड यहीं इसी संसार में दे देता है ताकि वे परलोक के दंड से सुरक्षित रहें क्योंकि संसार का दंड कुछ दिनों तक रहेगा जब कि परलोक का दंड सदैव रहेगा।



ईश्वर जिन लोगों को उनकी बुराईयों के कारण पसन्द नहीं करता वह लोग यदि कोई अच्छाई करते हैं तो चूंकि ईश्वर ने वचन दिया है कि वह हर अच्छाई और बुराई का बदला देगा इस लिए बुरे लोगों की अच्छाइयों का इनाम इसी ससांर में सुख- समृद्धि के रूप में दे देता है।