सृष्टि, ईश्वर और धर्म
 



ईश्वर के एक होने के तर्क





ईश्वर एक है इसके बहुत से तर्क प्रस्तुत किये गये हैं और ईश्वर एक है या कई यह विषय अत्यधिक प्राचीन है और इस पर बहुत चर्चा हो चुकी है और जैसा कि हम ने पिछले कार्यक्रम में बताया था ईश्वरीय दूतों के संघर्ष का बहुत बड़ा भाग अनेकेश्वरवाद में विश्वास रखने वालों के विरुद्ध था।



इस कार्यक्रम में हम ईश्वर के एक होने के कुछ सरल प्रमाण पेश कर रहे हैं । जैसे यदि यह मान लिया जाए कि इस सृष्टि की रचना २ या कई ईश्वरों ने मिल कर की है तो इस धारणा के लिए कुछ दशाएं होगी या तो विश्व की हर वस्तु को उन सब ने मिल कर बनाया होगा या फिर कुछ वस्तुओं को एक ने और कुछ अन्य को दूसरे ने बनाया होगा। या फिर समस्त रचनाओं को किसी एक ईश्वर ने ही बनाया होगा किंतु कुछ अन्य देवता संसार को चलाते होंगे किंतु यदि हम यह मान लें कि हर रचना को कई ईश्वरों ने मिल कर बनाया है तो यह संभव नहीं है क्योंकि इस का अर्थ यह होगा कि विश्व की एक वस्तु को २ या कई देवताओं ने मिल कर बनाया है और हर एक ने एक वस्तु को बनाया है जिससे से हर वस्तु के कई अस्तित्व हो जाएंगें जबकि एक वस्तु का एक ही अस्तित्व होता है अन्यथा वह एक वस्तु नहीं होगी किंतु यदि यह माना जाए कि कई देवताओं में से प्रत्येक ने किसी वस्तु विशेष या कई वस्तुओं की रचना की है तो इस धारणा का अर्थ यह होगा कि हर रचना केवल अपने रचनाकार के बल पर अस्तित्व में आई होगी और उसे अपने अस्तित्व के लिए केवल अपने रचनाकार की ही आवश्यकता होगी अर्थात केवल उसी ईश्वर की आवश्यकता होगी जिसने उसे बनाया है किंतु इस प्रकार की आवश्यकता सारी वस्तुओं को बनाने वाले अंतिम रचनाकार की होगी जो वास्तव में ईश्वर है।



दूसरे शब्दों में संसार के लिए कई ईश्वर मानने का अर्थ यह होगा कि संसार में कई प्रकार की व्यवस्थाएं हैं जो एक दूसरे के अलग- अलग भी हैं जब कि संसार की एक ही व्यवस्था है और सारी प्रक्रियाएं एक दूसरे से जुड़ी हैं और एक दूसरे पर अपना प्रभाव भी डालती हैं और उन सब को एक दूसरे की आवश्यकता होती है इसी प्रकार पहली प्रक्रिया अपने बाद की प्रक्रिया से संबंध रखती है और पहले की प्रत्येक प्रक्रिया अपने बाद की प्रक्रिया के अस्तित्व का कारण होती है इस प्रकार से ऐसी रचना जिसकी विभिन्न प्रक्रियाएं एक दूसरे से जुड़ी हों और सारी प्रक्रियाएं और व्यवस्थाएं एक व्यापक व्यवस्था के अंतर्गत हों तो उन का कई नहीं एक ही रचनाकार हो सकता है अर्थात इस प्रकार से व्यस्थित परिणामों व प्रक्रियाओं का एक ही कारक हो सकता है और वह कई कारकों का परिणाम नहीं हो सकता किंतु यदि यह माना जाए कि वस्तुतः ईश्वर एक ही है किंतु उसकी सहायता के लिए और संसार को चलाने के लिए कई अन्य देवता मौजूद हैं तो यह भी सही नहीं है क्योंकि हर वस्तु अपने पूरे अस्तित्व के साथ अपने कारक से संबंधित है और उसका अस्तित्व उसी के सहारे पर निर्भर होता है और किसी अन्य अस्तित्व में उसे प्रभावित करने की शक्ति नहीं होती अलबत्ता यहां पर प्रभावित करने से वह प्रभाव आशय नहीं है जो वस्तुएं एक दूसरे पर डालती हैं ।



इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि यदि ईश्वर के सहायकों की बात मान ली जाए तो फिर इसकी दो दशाएं होंगी। एक यह कि ईश्वर को इन सहायकों की आवश्यकता होती है या उसे उनकी आवश्यकता नहीं होती। अब यदि हम यह मान लें कि ईश्वर को सहायकों की आवश्यकता होती है तो फिर वह ईश्वर नहीं हो सकता क्योंकि सहायता की आवश्यकता उसे होती है जो अकेले की कोई काम करने की क्षमता नहीं रखता और हम पहले की यह चर्चा कर चुके हैं कि ईश्वर आवश्यकता मुक्त और हर काम करने की क्षमता रखता है किंतु यदि यह माना जाए कि ईश्वर को सहायकों की आवश्यकता नहीं हैं किंतु फिर भी उसके सहायक हैं तो फिर यह अकारण काम होगा अर्थात ईश्वर ने सहायकों की आवश्यकता न होने के बावजूद कुछ लोगों को अपनी सहायता के लिए रखा है तो इस से यह सिद्ध होगा कि ईश्वर ने एसा काम किया है जिसकी आवश्यकता ही नहीं थी और यह ईश्वर के लिए सही नहीं है क्योंकि वह केवल वही काम करता है जिसकी आवश्यकता होती है अनाश्वयक काम मनुष्य तो कर सकता है किंतु ईश्वर नहीं कर सकता।



यदि हम यह मानें कि ईश्वर के कुछ लोग सहायक हैं तो फिर यह प्रश्न उठता है कि उनकी किसने रचना की? यदि ईश्वर ने ही उनकी रचना की है तो फिर उन सहायकों का अस्तित्व, ईश्वर पर निर्भर होगा तो फिर एसे लोग साधन हो सकते हैं, ईश्वर के सहायक नहीं। वैसे हम बता चुके हैं कि सहायता की आवश्यकता अक्षमता व कमज़ोरी का चिन्ह है किसी कंपनी या संस्था में सहायक इस लिए होते हैं क्योंकि सारे कामों की देखभाल महानिदेशक अकेले नहीं कर सकता अर्थात उसमें यह क्षमता नहीं होती कि वह सारे छोटे- बड़े काम अकेले की करे इसलिए सहायकों की नियुक्ति की जाती है किंतु ईश्वर के लिए हम यह कल्पना नहीं कर सकते कि कोई काम उसके लिए संभव नहीं हैं या अकेले वह इतने सारे काम नहीं कर सकता इस लिए उसने अपने लिए कुछ सहायक रखे हैं। क्योंकि ईश्वर की तुलना मनुष्य से नहीं की जा सकती और न ही मनुष्य के काम काज की शैली की ईश्वरीय व्यवस्था से तुलना की जा सकती है।



इस लिए हमारा मानना है कि ईश्वर एक है ऐसा एक जो कभी दो नहीं हो सकता। अकेला है न उसका कोई भागीदार है और न ही सहायक। न उसका कोई पिता है और न ही वह किसी का पिता है। न उसकी किसी से नातेदारी है और न ही उसका कोई परिवार अथवा पत्नी है यह सब मनुष्य की विशेषताएं हैं और ईश्वर के बारे में इस प्रकार की बातों की कल्पना भी नहीं की जा सकती।













कर्मो का ज़िम्मेदार मनुष्य





ईश्वर मुख्य कारक है और वही सब कुछ करता है और उसकी अनुमति के बिना एक पत्ता की नहीं खड़कता यह ऐसे वाक्य हैं जो विदित रूप से बिल्कुल सही लगते हैं किंतु इन वाक्यों और उनके अर्थों को समझने के लिए बहुत अधिक चिंतन व गहराई की आवश्यकता है। अर्थात क्रियाओं पर ईश्वर का प्रभाव कैसा है और किस सीमा तक ईश्वर उस प्रभाव में हस्तक्षेप करता है और किस सीमा तक भौतिक कारक उसमें प्रभावी होते हैं ये बहुत ही गूढ़ विषय हैं और इस प्रभाव के संतुलन को समझने के लिए जहां एक ओर बौद्धिक विकास व विलक्षण बुद्धि चाहिए वहीं इस संतुलन और प्रभाव की सीमा का सही रूप से वर्णन भी आवश्यक है। ईश्वर भौतिक प्रक्रिया पर किस सीमा तक प्रभाव डालता है इस विषय को सही रूप से न समझने के कारण बहुत से लोग पथभ्रष्ट हो गये और उन्होंने संसार की हर क्रिया और प्रक्रिया को पूर्ण रूप से केवल ईश्वर से संबंधित समझ लिया और यह कहा कि ईश्वर के आदेश के बिना कोई पत्ता भी नहीं हिलता अर्थात उन लोगों ने भौतिक कारकों के प्रभाव का सिरे से इन्कार कर दिया अर्थात यह दर्शाने का प्रयास किया कि उदाहरण स्वरूप ईश्वर चाहता है कि आग रहे तो गर्मी रहे और यदि कोई खाना खा ले तो उसकी भूख समाप्त हो जायेगी तो चूंकि ईश्वर ऐसा चाहता है कि इस लिए गर्मी उत्पन्न होती है और भूख ख़त्म हो जाती है और गर्मी उत्पन्न करने तथा भूख मिटाने में आग और खाने की कोई भूमिका व प्रभाव नहीं है।



इस प्रकार की सोच व विचार धारा के कुप्रभाव उस समय प्रकट होते हैं जब हम मनुष्य के कामों के दायित्व के बारे में बात करें। अर्थात यदि हम यह बात पूर्ण रूप से मान लें कि संसार में हर काम ईश्वर से संबंधित है और वही हर काम करता है तो फिर मनुष्य और उसके कर्म के मध्य कोई संबंध नहीं रहता अर्थात मनुष्य जो कुछ करता है उसकी उस पर ज़िम्मेदारी नहीं होती।



दूसरे शब्दों में इस ग़लत विचारधारा का एक परिणाम यह होगा कि फिर मनुष्य के किसी काम में उसकी इच्छा का कोई प्रभाव नहीं होगा जिस के परिणाम स्वरूप मनुष्य अपने कामों का ज़िम्मेदार भी नहीं होगा और इस प्रकार से मनुष्य की सब से महत्वपूर्ण विशेषता अर्थात चयन का अधिकार का इन्कार हो जाएगा और हर वस्तु और हर क़ानूनी व्यवस्था खोखली हो जायेगी तथा धर्म व धार्मिक शिक्षाओं का भी कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। क्योंकि यदि मनुष्य को अपने कामों में किसी प्रकार का अधिकार नहीं होगा और सारे काम ईश्वरीय आदेश व इच्छा से होंगे तो फिर दायित्व व धार्मिक प्रतिबद्धता तथा पाप व पुण्य का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा और इस से पूरी धार्मिक व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाएगा। अर्थात उदाहरण स्वरूप चोरी करना या किसी की हत्या करना धार्मिक रूप से महापाप है और इस पर कड़ा दंड है किंतु यदि हम यह मान लें कि ईश्वर के आदेश के बिना कोई पत्ता नहीं हिलता और मनुष्य के सारे काम ईश्वर के आदेश से होते हैं तो फिर चोर और हत्यारा यह कह सकता है कि यदि मैंने चोरी की या हत्या की तो इसकी ज़िम्दारी मुझ पर नहीं है ईश्वर पर है उसने मुझे से चोरी करवाई और हत्या करवाई तो फिर यदि ज़िम्मेदारी नहीं होगी तो उसे दंड भी नहीं दिया जा सकता इसी प्रकार पुण्य करने वाले को यदि प्रतिफल दिया जाएगा और स्वर्ग में भेजा जाएगा तो भी यह आपत्ति हो सकती है कि यदि उसने अच्छा काम किया तो फिर उसमें उसका क्या कमाल है क्योंकि ईश्वर ने चाहा कि वह अच्छा काम करे इस लिए उसने अच्छा काम किया तो इसका फल उसे क्यों मिले?



इस्लाम में सृष्टि की रचना का उद्देश्य, मनुष्य की रचना के लिए भूमिका तैयार करना बताया गया है ताकि वह अपनी इच्छा से किये जाने वाले कामों द्वारा ईश्वर की उपासना करते और इस प्रकार पारितोषिक और ईश्वर से निकटता का बड़ा इनाम पाए किंतु यदि मनुष्य के पास कोई अधिकार नहीं होगा और वह हर काम विवशता में और कठपुतली की भांति करेगा तथा ईश्वरीय आदेश से करता होगा तो फिर उसे किसी भी प्रकार का इनाम या पुण्य प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा जिससे सृष्टि का उद्देश्य ही ग़लत हो जाएगा और पूरा संसार कठपुतली के खेल की भांति होकर रह जाएगा जहां मनुष्य कठपुतली की भांति चलता- फिरता और काम करता है और उसके कुछ कामों पर उसकी सराहना की जाती है और कुछ कामों पर दंड दिया जाता है।



अब प्रश्न यह है कि यह विचारधारा मनुष्य में पैदा कैसे हुई और इसका मुख्य कारण क्या है? तो इसके उत्तर में हम कहेंगे कि इस प्रकार की विचारधारा का मुख्य कारण, अत्याचारी शासनों के राजनीतिक उद्देश्य हैं क्योंकि यह शासन इस प्रकार की विचारधारा द्वारा, अपने गलत कार्यों का औचित्य दर्शाते थे और अज्ञानी लोगों को अपने वर्चस्व व राज को स्वीकार करने तथा उन्हें प्रतिरोध व संघर्ष से रोकने पर विवश करते थे। इसी लिए इस विचारधारा को राष्ट्रों को भ्रमित करने का मुख्य साधन माना जा सकता है।



दूसरी ओर, कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्हें इस विचारधारा की कमज़ोरियों का पता चल गया था किंतु न तो उन में पूर्ण एकेश्वरवाद पर विश्वास था और न ही इस विचारधारा को नकारने की क्षमता व ज्ञान था और न ही उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों की शिक्षाओं से लाभ उठाया इसी लिए उन्होंने इस विचारधारा को गलत मानते हुए इसे पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दिया और इसकी विपरीत दशा को मान लिया अर्थात वह यह मानने लगे कि मनुष्य के कार्य पूर्ण रूप से उस से प्रभावित होते हैं और ईश्वर का उससे कोई संबंध नहीं होता और न ही वह हस्तक्षेप करता है अर्थात उन्होंने ईश्वर को मनुष्य के कामों से पूर्ण रूप से असंबंधित मान लिया और हर काम ईश्वर के आदेश से होता है, की विचार धारा के विपरीत यह कहा कि कोई भी काम ईश्वर के आदेश से नहीं होता बल्कि सारी क्रियाएं और प्रक्रियाएं पूर्ण रूप से मनुष्य से संबंधित और वही उन का पूर्ण रूप से कारक होता है। पहली विचार धारा की भांति यह भी गलत विचार धारा है क्योंकि इसका अर्थ यह होगा कि ईश्वर मनुष्य के कामों में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं करता बल्कि नहीं कर सकता और उसने इस सृष्टि की रचना करके उसे अपने हाल पर छोड़ दिया है और जो कुछ हो रहा है वह स्वंय ही एक व्यवस्था के अंतर्गत है और ईश्वर चाह कर भी उसमें कुछ नहीं कर सकता। यह विचारधारा भी सही नहीं है क्योंकि इस से ईश्वर की क्षमता व महानता पर प्रश्न चिन्ह लगता है।



पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों ने जो ज्ञान के वास्तविक स्रोत हैं उन्होंने तीसरा मार्ग सुझाया है और इन दोनों विचारधारों के बीच का मार्ग अपनाया है जिसमें इन दोनों विचार धाराओं की ख़राबियां नहीं हैं किंतु उस पर हम अपने अगले कार्यक्रम में चर्चा करेंगे।













मनुष्य और परिपूर्णता





इससे पहले वाली चर्चा में हमने कहा था कि कर्मों के संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों ने तीसरा मार्ग सुझाया है अर्थात न ही ईश्वर मनुष्य के समस्त कामों में पूर्ण रूप से हस्तक्षेप करता है और न ही पूर्ण रूप से उसने समस्त कामों को मनुष्य के ऊपर छोड़ दिया है और चूंकि यह बहुत ही गूढ़ चर्चा है इस लिए यदि इस विषय को कोई अच्छी तरह से समझना चाहता है तो उसे बहुत ध्यान रखना होगा।



तीसरा मार्ग यह है कि मनुष्य अपने कामों में न तो पूरी तरह से स्वतंत्र है और न ही पूर्ण रूप से विवश बल्कि कुछ कामों में किसी सीमा तक स्वतंत्र है और कुछ काम पूरी तरह से उसकी क्षमता से बाहर हैं। एक व्यक्ति ने इमाम जाफ़रे सादिक अलैहिस्सलाम से पूछा कि यह जो आप कहते हैं कि मनुष्य अपने कुछ कामों में स्वतंत्र है और कुछ में नहीं तो इसका कोई उदाहरण दे सकते हैं? इमाम ने उससे कहा कि अपना दायां पैर उठा कर खड़े हो जाओ उसने ऐसा ही किया फिर आप ने कहा बायां पैर उठा कर खड़े हो जाओ वह बाया पैर उठा कर खड़ा हो गया फिर उससे कहा अब अपने दोनों पैर उठा कर खड़े हो जाओ तो उसने कहा यह कैसे हो सकता? इमाम ने कहा स्वतंत्रता व विवशता के मध्य के मार्ग का अर्थ यही है। यह एक उदाहरण था अब हम इस विषय पर विशेष रूप से चर्चा आरंभ कर रहे हैं।



मनुष्य स्वंय सोच कर काम करता है या कठपुतली की भांति है इसके लिए सब से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि मनुष्य में इरादा और निर्णय लेने की शक्ति है या नहीं। निर्णय लेने की शक्ति, उन विषयों में से है जिन पर मनुष्य को पूरा विश्वास है क्योंकि इस विषय को हर व्यक्ति अपने आभास द्वारा अपने भीतर महसूस करता है जैसा कि हर व्यक्ति अपनी मनोदशाओं को जानता है यहां तक कि यदि उसे किसी विषय के बारे में शंका होती है तो वह अपने भीतर मौजूद ज्ञान द्वारा उस शंका से अवगत होता है और उसे अपने भीतर शंका के बारे में किसी प्रकार की शंका नहीं होती।



इसी प्रकार हर कोई अपने भीतर थोड़ा सा ध्यान देने के बाद यह समझ जाता है कि वह बात कर सकता है या नहीं, अपना हाथ हिला सकता है या नहीं, खाना खा सकता है या नहीं।



किसी काम को करने का फैसला कभी शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए होता है उदाहरण स्वरूप एक भूखा व्यक्ति खाने का फैसला करता है या प्यासा व्यक्ति पानी पीने का इरादा करता है किंतु कभी-कभी मनुष्य का इरादा और निर्णय बौद्धिक इच्छाओं व उच्च मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए होता है जैसाकि एक रोगी स्वास्थ्य लाभ के लिए कड़वी दवांए पीता है और स्वादिष्ट खानों से परहेज़ करता है या अध्ययन करने वाला और शिक्षा प्राप्त करने वाला व्यक्ति ज्ञान प्राप्ति और वास्तविकताओं की खोज के लिए, भौतिक सुखों की ओर से आंख बंद कर लेता है और अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कठिनाइयां सहन करता या साहसी सैनिक अपने देश की रक्षा जैसे उच्च लक्ष्य के लिए अपने प्राण भी न्यौछावर कर देता है। तो इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि उद्देश्य उच्च हो तो उसके मार्ग में कठिनाईयों का कोई महत्व नहीं होता। वास्तव में मनुष्य का महत्व उस समय प्रकट होता है जब उस की विभिन्न इच्छाओं के मध्य टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाए और वह नैतिक गुणों और सही अर्थों में मानवता की चोटी पर पहुंचने के लिए अपनी शारीरिक इच्छाओं व आवश्यकताओं की उपेक्षा करता है और यह तो स्पष्ट है कि हर काम, जितने मज़बूत इरादे और चेतनापूर्ण चयन के साथ किया जाता है वह आत्मा के विकास या पतन में उतना ही प्रभावी होता है तथा दंड या पुरस्कार का उसे उतना ही अधिक अधिकार होता है।



अलबत्ता शारीरिक इच्छाओं के सामने प्रतिरोध की क्षमता सब लोगों में हर वस्तु के प्रति समान नहीं होती किंतु हर व्यक्ति थोड़ा बहुत ईश्वर की इस देन अर्थात स्वतंत्र इरादे का स्वामी होता ही है और जितना अभ्यास करता है उसकी यह क्षमता उतनी ही बढ़ती जाती है। इस आधार पर मनुष्य में इरादे की उपस्थिति के बारे में कोई शंका नहीं है और इस प्रकार की स्पष्ट और महसूस की जाने वाली भावना के बारे में कोई शंका होनी भी नहीं चाहिए और यही कारण है कि मनुष्य में इरादे और स्वतंत्रता के विषय पर सभी ईश्वरीय धर्मों में बल दिया गया है और इसे सभी ईश्वरीय धर्मों और नैतिक मतों में एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया गया है क्योंकि इस विशेषता के बिना कर्तव्य, दायित्व, आलोचना, दंड, अथवा पुरस्कार आदि की कोई गुंजाईश ही नहीं रहेगी।



इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि इरादा और निर्णय की शक्ति हर मनुष्य में पायी जाती है और यह शक्ति इतनी स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति थोड़ा सा ध्यान देकर इसे महसूस कर सकता है किंतु इसके बावजूद कुछ लोग मनुष्य में इरादे और निर्णय लेने की क्षमता व शक्ति का इन्कार करते हुए कहते हैं कि मनुष्य अपने कामों में विवश है और उसके सारे काम ईश्वर करता है वह तो केवल कठपुतली है इस प्रकार की स्पष्ट विशेषता के इन्कार और मनुष्य में अधिकार व इरादे के न होने में विश्वास का कारण, कुछ शंकाएं है जिन का निवारण किया जा सकता है।













महान ईश्वर सर्वज्ञाता है





जो लोग यह मानते हैं कि मनुष्य का हर काम ईश्वर के आदेश से होता है और मनुष्य में अपना कोई इरादा नहीं होता और वह अपने इरादे से कोई काम नहीं कर सकता उनका कहना है कि मनुष्य का इरादा आंतिरक रूचियों व रुझानों से बनता है और यह आंतरिक रूचियां और रुझान का पैदा होना स्वंय मनुष्य के बस में नहीं है और न ही जब उसमें बाहरी कारकों के कारण उबाल आता है तो उस पर मनुष्य का बस होता है इसलिए इसमें अधिकार व चयन की गुंजाइश नहीं बचती। उनका यह कहना है कि जब इरादा पैदा करने वाले कारक मनुष्य के बस में नहीं हैं तो फिर इरादे को उस के अधिकार के अंतर्गत आने वाला विषय कैसे कहा जा सकता है।



इस शंका के उत्तर में यह कहना चाहिए कि रुझान या रूचि पैदा होना इरादे और फैसले की भूमिका प्रशस्त करता है किसी काम के इरादे को बनाता नहीं जिसे रूचि व रूझान का ऐसा परिणाम समझा जाए जो मनुष्य से प्रतिरोध या विरोध की क्षमता ही छीन ले। अर्थात शंका करने वालों ने जो यह कहा है कि इरादे का आधार रूचि व रूझान होता है, सही नहीं है रूचि व रूझान और बाहरी कारक इरादे की भूमिका प्रशस्त करते हैं। इरादे को अनिवार्य नहीं बनाते अर्थात यह सही नहीं है कि कहा जाए जब भी रूझान व रूचि होती है इरादा भी बन जाता है। इरादा किसी भी प्रकार से रूचि व रूझान का अनिवार्य परिणाम नहीं है बल्कि उसके लिए परिस्थितियां अनुकूल करता है इसीलिए देखा गया है कि कभी- कभी रूचियां होती हैं, परिस्थितियां होती हैं रूझान भी होता किंतु मनुष्य फैसला नहीं लेता अर्थात इरादा नहीं करता क्योंकि वास्तविकता है यह है कि इरादे के लिए केवल रूचि व रुझान ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि इस के बाद मनुष्य चिंतन-मनन करता है सोच-विचार करता है उसके बाद यदि सही समझता है तो फिर इरादा और फैसला करता है। इस प्रकार से यह कहना सही नहीं है कि मनुष्य परिस्थितियों और रूचियों के आगे इरादा करने पर विवश होता है बल्कि वह स्वतंत्र होता है इसी लिए कभी- कभी परिस्थितियों और रूचियों के विपरीत भी इरादा करता है और निर्णय लेता है।



मनुष्य में इरादे व संकल्प की शक्ति में विश्वास रखने वालों पर जो शंकाए की जाती हैं उनमें से एक यह भी है कि वे कहते हैं कि ज्ञान- विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में प्रमाणित विषयों के आधार पर अब यह सिद्ध हो चुका है कि जेनेटिक कारक तथा विशेष प्रकार के आहारों और दवाओं के कारण हार्मोन्ज़ के स्राव तथा समाजिक व मनुष्य के आसपास के वातावरण जैसे बहुत से कारक मनुष्य में किसी काम के इरादे को बनाने में प्रभावी होते हैं और मनुष्य के व्यवहारों में अंतर भी इन्हीं कारकों के कारण होता है और धार्मिक शिक्षाओं में भी इस विषय की पुष्टि की गयी है इस लिए यह कहना सही नहीं है कि मनुष्य अपने इरादे में पूर्ण रूप से स्वतंत्र होता है।



इस शंका को अधिक स्पष्ट करते हुए हम कहेंगे कि शंका करने वालों का यह कहना है कि मनुष्य जिस समाज में रहता है उसकी विशेष परिस्थितियां और उसका अपना परिवार और जेनेटिक विशेषताएं उसके इरादों को प्रभावित करती हैं उदाहरण स्वरूप पश्चिम में रहने वाला व्यक्ति बहुत से ऐसे काम करने का इरादा करता है जिसके बारे में पूरब में रहने वाला व्यक्ति सोच भी नहीं सकता। इसी प्रकार घर परिवार भी मनुष्य के इरादे में प्रभावित होते हैं इस लिए यह नहीं कहा जा सकता कि मनुष्य इरादे में पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। अर्थात मनुष्य के कार्य को पूर्ण रूप से स्वतंत्रता के साथ किये गये इरादे का परिणाम नहीं माना जा सकता।



इस शंका का निवारण यह है कि स्वतंत्र इरादे व इच्छा को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि उस में यह तत्व प्रभावी नहीं होते बल्कि इस का अर्थ यह है कि इन सारे तत्वों व कारकों की उपस्थिति के साथ, मनुष्य प्रतिरोध कर सकता है और विभिन्न प्रकार की भावनाओं व रूचियों के घेरे में किसी एक का चयन कर सकता है और यही चयन कर सकने की शक्ति इस बात को सिद्ध करती है कि मनुष्य का अपना इरादा होता है।



अलबत्ता कभी- कभी इन कारकों में से कुछ कारण ऐसे भी होते हैं जो मनुष्य को अपने विरुद्ध निर्णय लेने से रोकते हैं उदारहण स्वरूप लोभ और भविष्य की चिंता मनुष्य को दान से रोकती है या क्रोध व बदला की अत्यधिक तीव्र भावना मनुष्य को संयम से रोकती से रोकती है और इसी लिए इन कारकों का विरोध करने के निर्णय लेने पर पारितोषिक और प्रतिफल भी अधिक मिलता है। इसी प्रकार क्रोध और भावनाओं के आवेग में किये जाने वाले अपराध का दंड, पूर्ण रूप से शांत भाव व सोच विचार के साथ किये जाने वाले अपराध के दंड की तुलना में हल्का होता है। इस प्रकार से हम यह तो कह सकते हैं कि परिस्थितियां और कारक, इरादों में प्रभावी होते हैं किंतु यह नहीं कहा जा सकता कि परिस्थितियां और कारक पूर्ण रूप से इरादे के पैदा होने का करण और उसका अपरिहार्य परिणाम होते हैं।



इरादे पर मनुष्य के अधिकार पर की जाने वाली एक शंका यह भी है कि कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर विश्व की हर वस्तु से यहां यहां तक कि मुनष्य के समस्त कार्यों से इस से पूर्व के वह कोई काम करे, अवगत होता है और ईश्वर के ज्ञान में गलती नहीं हो सकती तो फिर सारी घटनाए ईश्वर के सदैव से रहने वाले ज्ञान के अनुसार घटित होती हैं और इस के विपरीत कुछ नहीं हो सकता इस आधार पर मनुष्य के अधिकार व चयन का कोई प्रश्न ही नहीं है। अर्थात जब ईश्वर को समस्त घटनाओं और मनुष्य के समस्त इरादों का ज्ञान है तो फिर इस का यह अर्थ हुआ कि मनुष्य उस से हट कर कुछ नहीं कर सकता इस लिए यह कहना सही नहीं है कि मनुष्य अपने इरादे में स्वतंत्र होता है।



इस शंका का उत्तर इस प्रकार से दिया जाता है कि यह सही है कि ईश्वर हर घटना का जिस प्रकार से वह घटित होती है ज्ञान रखता है और मुनष्य का हर काम भी उसके अधिकार के दायरे में रहते हुए ईश्वर के ज्ञान में होता है किंतु इसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि ईश्वर मनुष्य को उस पर बाध्य करता है बल्कि मनुष्य के हर इरादे और हर काम का ईश्वर को ज्ञान होता है और उसे यह भी पता होता है कि मनुष्य यह काम किस परिस्थिति में करेगा। अर्थात ईश्वर को केवल यही ज्ञान नहीं होता कि अमुख काम होने वाला है बल्कि उसे यह भी ज्ञान है कि कौन मनुष्य किन परिस्थितियों में कौन सा इरादा करेगा और क्या काम करेगा किंतु इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि मनुष्य अपने इरादे में स्वतंत्र नहीं है अर्थात ईश्वर का ज्ञान, मनुष्य की स्वतंत्रता नहीं छीनता। इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि मनुष्य में इरादे नाम की भावना होती है जो हर प्रकार से उसके अधिकार में होती है और बहुत से अन्य कारक उस पर प्रभाव डाल सकते हैं किंतु उसे अपरिहार्य नहीं बना सकते।



कुछ लोग मनुष्य को भाग्य व क़िस्मत के आगे विवश मानते हैं और उनका कहना है कि जो लिखा होता है वही होता है इस लिए मनुष्य के काम या उसके इरादे का कोई महत्व नहीं है।













धर्म और भाग्य







मनुष्य का भाग्य या क़िस्मत उन विषयों में से है जिनका सही चित्र बहुत कम लोगों के मन में होगा। भाग्य के बारे में बहुत से प्रश्न उठते हैं। सब से पहले तो यह कि भाग्य है क्या? भाग्य के बारे में यदि आम लोगों से पूछा जाए कि वह क्या है तो वह यही कहेंगे कि भाग्य ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है और जिसके भाग्य में जो लिखा होता है वही होता है और मनुष्य कुछ नहीं कर सकता यह वास्तव में उसी विचारधारा का क्रम है जिसमें कहा जाता है कि मनुष्य में स्वतंत्र इरादा नहीं होता।



वास्तव में यदि हम इसी अर्थ में भाग्य को मान लें तो फिर कर्म व प्रतिफल की पूरी व्यवस्था बाधित हो जाएगी। अर्थात यदि हर व्यक्ति के साथ वही होता है जो उसके भाग्य में है तो फिर उसका अपना अधिकार समाप्त हो जाएगा और वह कठपुतली की भांति हो जाएगा। उदाहरण स्वरूप यदि किसी व्यक्ति के घर में चोरी हो जाती है तो वह कहता है कि क्या करें भाग्य में यही लिखा था तो यदि चोर पकड़ा जाए और उसे चोरी पर दंड दिया जाने लगे तो वह यह कह सकता है कि इसमें मेरा क्या दोष है? इसके भाग में लिखा था कि इसके घर में चोरी हो और मेरे भाग्य में लिखा था कि मैं इसके घर में चोरी करूं तो मैंने तो वही किया जिसे ईश्वर ने हम दोनों के भाग्य में लिखा था तो इस पर मुझे दंड क्यों दिया जाए? या इसी प्रकार हम देखते हैं कि इस संसार में कोई धनी होता है और कोई निर्धन, किसी के पास इतना धन होता है कि वह अपने कपड़ों और जूते- चप्पल पर लाखों रूपये ख़र्च करता है और किसी के पास खाने के लिए दो समय की रोटी नहीं होती और वह कुछ हज़ार रूपये के लिए आत्म हत्या करने पर विवश हो जाता है।



तो क्या यहां यह कहा जा सकता है कि धनवान व्यक्ति के भाग्य में धन लिखा था इस लिए वह धनवान है और निर्धन के भाग्य में भूख से मरना लिखा था इस लिए वह निर्धन है? यदि हम यह मान लें तो फिर ईश्वरीय न्याय पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है? अर्थात सारे मनुष्य, ईश्वर की रचना हैं और ईश्वर सारे मनुष्यों से समान रूप से प्रेम करता है तो फिर उसने किस आधार पर किसी के भाग में धन व सुख व आंनद लिखा और कुछ लोगों के भाग्य में निर्धनता, दुख व पीड़ा? क्योंकि भाग्य जब लिखा जाता है तो मनुष्य हर प्रकार की बुराई और अच्छाई से दूर होता है अर्थात जो लोग भाग्य को इस अर्थ में स्वीकार करते हैं उनके अनुसार भाग्य, मनुष्य के जन्म के साथ ही लिख दिया जाता है तो फिर उस समय मनुष्य न अच्छाई किये होता है और न ही बुराई तो फिर ईश्वर क्यों किसी के भाग्य में सुख व किसी के भाग्य में दुख लिखता है? क्या यह न्याय है कि कुछ लोगों को बिना कुछ किये ही जीवन भर के लिए सुख दिया जाए और कुछ दूसरे लोगों को बिना कोई बुराई किये जीवन भर का दुख दे दिया जाए?



इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि भाग्य इस अर्थ में कि सब कुछ पहले से निर्धारित और मनुष्य की क़िस्मत में लिखा होता है सही नहीं है किंतु इसके साथ यह प्रश्न भी उठता है कि तो फिर क्या भाग्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है? यदि यह मान लिया जाए तो भी यह सही नहीं लगता? अर्थात जैसाकि कुछ लोग कहते हैं कि भाग्य नाम की कोई चीज़ नहीं है और सब कुछ मनुष्य के हाथ में होता है हर इंसान अपनी तक़दीर का मालिक होता है तो यह बात भी पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि कई बार हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति कोई ऐसा काम करता है जिसे उससे पहले कई लोगों ने किया होता है और उससे उन्हें लाभ होता है किंतु वह जब वही काम उसी प्रकार से करता है तो उसे नुक़सान हो जाता है ऐसे समय पर लोग कहते हैं कि भाग्य में नहीं था। या फिर उदाहरण स्वरूप सैंक़डों लोग रेल की पटरी पार करते हैं किंतु एक व्यक्ति जब पार करता है तो उसी समय रेल आ जाती है और वह मर जाता है लोग कहते हैं उसका दुर्भाग्य था।



प्रश्न यह है कि यदि मनुष्य अपनी क़िस्मत का मालिक होता है तो कभी- कभी हर बात पर पूरी तरह से ध्यान देने के बावजूद उसे वह सब कुछ नहीं मिल पाता जो उससे पहले वही काम करने वालों को मिल चुका होता है? तो इसका अर्थ है कि भाग्य नाम की कोई वस्तु है जो नियमों और मनुष्य के कामों से ऊपर है और जिसके कारण कभी- कभी मनुष्य को ऐसी स्थिति का सामना होता है जो विदित रूप से उसके कामों के परिणाम में नहीं होना चाहिए था।



हमारा भी यही कहना है कि यह सही नहीं है कि भाग को सिरे से नकार दिया जाए और यह कहा जाए कि सब कुछ मनुष्य के हाथ में होता है और वह जैसा चाहे उसका भविष्य वैसा ही होता है और वास्तव में यह विचार, धर्म को नकारने वालों और भौतिकवादी लोगों का है जो इस संसार को ही सब कुछ मानने हैं और भौतिकता से परे किसी भी वस्तु या विषय पर विश्वास नहीं रखते किंतु हम इस विचार धारा की पुष्टि किसी भी स्थिति में नहीं कर सकते बल्कि हम भी मानते हैं कि भाग्य नाम का विषय है किंतु हम उस भाग्य को नहीं मानते जो आलसी लोगों के लिए कुछ न करने का बहाना और बुरे लोगों के लिए सब कुछ करने का बहाना हो। भाग्य क्या है? और यदि है तो उसका सही रूप क्या है? और हमें किस प्रकार के भाग्य को मानना चाहिए? यह वह प्रश्न है जिसका उत्तर अगली चर्चा में दिया जायेगा।