सृष्टि, ईश्वर और धर्म
 


सृष्टिकर्ता अनिवार्य है।


प्राचीन काल से ही मनुष्य के मन में यह प्रश्न उठता रहा है कि सृष्टि का आरंभ कब हुआ,

कैसे हुआ, क्या यह संभव है कि मनुष्य कभी यह समझ सके कि चाँद, सितारे, आकाशगंगाएं, पुच्छलतारे, पृथ्वी, पर्वत, उसकी ऊँची ऊँची चोटियाँ, जंगल, कीड़े-मकोड़े, पशु,

पक्षी, मनुष्य, जीव-जन्तु यह सब कहाँ से आए और कैसे बने?

हमने और आपने हो सकता है न सोचा हो किन्तु हज़ारों वर्षों से इस पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों ने सोचा और यहीं से धर्म का जन्म हुआ।

हम ब्रहमाण्ड की रचना की जटिल बहस का उल्लेख नहीं करेंगे

क्योंकि बिग-बैंग, जो इस सृष्टि की रचना का कारण बताया जाता है, उस पर भी वैज्ञानिकों ने बहुत से प्रश्न उठाए हैं।

यहाँ बस केवल एक प्रश्न है जो हर काल में प्रायः हर मनुष्य के मन में उठता रहा है कि क्या कोई वस्तु बिना किसी बनाने वाले के बन सकती है?

एक अरब ग्रामीण से पूछा गया कि तुमने अपने ईश्वर को कैसे पहचाना? तो उसने उत्तर दिया कि ऊँट की मेंगनियाँ, ऊँट का प्रमाण हैं, पद-चिन्ह किसी पथिक का प्रमाण हैं,

तो क्या इतना बड़ा ब्रह्माण्ड, यह आकाश, और कई परतों में पृथ्वी, किसी रचयिता का प्रमाण नहीं हो सकती!

यह अत्यधिक सादे शब्दों में ईश्वर के अस्तित्व के बारे में दिया जाने वाला वह प्रमाण है जिस पर बड़े-बड़े दार्शनिकों ने बहस की है और अपने विचार व्यक्त किए हैं,

किन्तु अधिकांश लोगों ने ब्रह्माण्ड में मौजूद व्यवस्था को, ईश्वर के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण माना है।

अल्लामा हिल्ली एक बहुत प्रसिद्ध शीया बुद्धिजीवी थे। उनके काल में एक नास्तिक बहुत प्रसिद्ध हुआ। वह बड़े बड़े आस्तिकों को बहस में हरा देता था, उसने अल्लामा हिल्ली को भी चुनौती दी।

बहस के लिए एक दिन निर्धारित हुआ और नगरवासी निर्धारित समय और निर्धारित स्थान पर इकट्ठा हो गए।

वह नास्तिक भी समय पर पहुंच गया, किन्तु अल्लामा हिल्ली का कहीं पता नहीं था। काफ़ी समय बीत गया लोग बड़ी व्याकुलता से अल्लामा हिल्ली की प्रतीक्षा कर रहे थे

कि अचानक अल्लामा हिल्ली आते दिखाई दिए। उस नास्तिक ने अल्लामा हिल्ली से विलंब का कारण पूछा तो उन्होंने विलंब के लिए क्षमा मांगने के पश्चात

कहा कि वास्तव में मैं सही समय पर आ जाता, किन्तु हुआ यह कि मार्ग में जो नदी है

उसका पुल टूटा हुआ था और मैं तैर कर नदी पार नहीं कर सकता था, इसलिए मैं परेशान होकर बैठा हुआ था

कि अचानक मैंने देखा कि नदी के किनारे लगा पेड़ कट कर गिर गया और फिर उसमें से तख़्ते कटने लगे और फिर अचानक कहीं से कीलें आईं और उन्होंने तख़्तों को आपस में जोड़ दिया

और फिर मैंने देखा तो एक नाव बनकर तैयार थी। मैं जल्दी से उसमें बैठ गया और नदी पार करके यहाँ आ गया।

अल्लामा हिल्ली की यह बात सुनकर नास्तिक हंसने लगा और उसने वहाँ उपस्थित लोगों से कहाः "मैं किसी पागल से वाद-विवाद नहीं कर सकता, भला यह कैसे हो सकता है?

कहीं नाव, ऐसे बनती है?" यह सुनकर अल्लामा हिल्ली ने कहाः "हे लोगो! तुम फ़ैसला करो। मैं पागल हूँ या यह, जो यह स्वीकार करने पर तैयार नहीं है

कि एक नाव बिना किसी बनाने वाले के बन सकती है,

किन्तु इसका कहना है कि यह पूरा संसार अपने ढेरों आश्चर्यों और इतनी सूक्ष्म व्यवस्था के साथ स्वयं ही अस्तित्व में आ गया है"। नास्तिक ने अपनी हार मान ली और उठकर चला गया।

मानव इतिहास के आरंभ से ही ईश्वर को मानने वाले सदैव अधिक रहे हैं अर्थात अधिकांश लोग यह मानते हैं कि इस संसार का कोई रचयिता है, अब वह कौन है? कैसा है?

और उसने क्या कहा है? इस बारे में लोगों में मतभेद है किन्तु यही सच है कि यदि सही अर्थ में कोई धर्म है तो फिर उसका उद्देश्य भी मनुष्य को ईश्वर तक पहुँचाना होता है।

वैसे यह बिन्दु भी स्पष्ट रहे कि ईश्वर और धर्म को मानने में ही भलाई हैं,

क्योंकि आप दो ऐसे व्यक्तियों के बारे में सोचें कि जिनमें से एक धर्म और ईश्वर को मानता है और दूसरा नहीं मानता।

उदाहरण स्वरूप दो व्यक्ति किसी ऐसे नगर की ओर जा रहे हैं जहाँ के बारे में दोनों को कुछ नहीं मालूम है।

मार्ग में उन्हें एक अन्य व्यक्ति मिलता है जो उनसे कहता है कि जिस नगर में तुम दोनों जा रहे हो वहाँ खाने पीने को कुछ नहीं मिलेगा,

इसलिए उचित होगा कि वहाँ के लिए थोड़ा भोजन और पानी रख लो तो ऐसी स्थिति में बुद्धि क्या कहती है?

बुद्धि यही कहती है कि वहाँ के लिए कुछ खाना पानी रख लिया जाए, क्योंकि यदि वह सही कह रहा होगा तो मरने का ख़तरा टल जाएगा और यदि झूठ बोल रहा होगा तो कोई हानि नहीं होगी।

अब इस कल्पना के दृष्टिगत एक व्यक्ति ने खाना पानी रखा लिया किन्तु दूसरे ने कहा कि इस व्यक्ति ने मज़ाक़ किया है,

या यह कि झूठ बोल रहा था, या यह कि देखने में भरोसे का आदमी नहीं लग रहा था, यह सोच कर उसने कुछ साथ नहीं लिया। नगर आया तो उसने देखा कि खाना पानी सब कुछ था,

जो व्यक्ति खाना पानी साथ लाया था उसने उसे फेंक दिया, बस सब कुछ ठीक हो गया, किन्तु दूसरी स्थिति में सोचें कि ये दोनो यात्री उस नगर में जब पहुंचे तो

देखा कि वहाँ कुछ भी नहीं था तो अब जिसने अपने साथ खाना पानी रख लिया था, उसकी तो जान बच गई किन्तु जिसने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया था वह भूख और प्यास से मर गया।

इसिलए बुद्धि हमें यह सिखाती है कि यदि ख़तरा या लाभ बहुत बड़ा हो तो उसकी सूचना देने वाला चाहे जैसा हो, बुद्धि कहती है कि उसके लिए कुछ प्रबंध अवश्य करना चाहिए।

यदि दस ग्लास पानी हमारे सामने रखा है और कोई कहता है कि किसी एक में विष है तो बुद्धि कहती है कि किसी भी ग्लास का पानी न पिया जाए।

इस संसार में बहुत से लोग आए जो विदित रूप से अच्छे मनुष्य थे, लोगों की सहायता करते थे, अच्छे कार्य करते थे, लोकप्रिय थे, किन्तु वे कहा करते थे कि हम ईश्वरीय दूत हैं,

इस संसार का एक रचयिता है, मरने के बाद एक अन्य लोक है जहाँ कर्मों का हिसाब किताब होगा और अच्छे कार्य करने वालों को स्वर्ग और बुरे कार्य करने वालों को नरक में भेजा जाएगा।

तो फिर इस संदर्भ में हमारी बुद्धि क्या कहती है? यदि हम केवल बुद्धि की बात मानें तो होना यह चाहिए कि हम यह सोचें कि

यदि इन लोगों ने सही कहा होगा तो हम स्वर्ग में जाएंगे और नरक में जाने से बच जाएंगे किन्तु यदि उन लोगों ने ग़लत कहा होगा तो मरने के बाद मिट्टी में मिल जाएंगे और परलोक नाम का कोई लोक नहीं होगा और हमें कोई हानि भी नहीं होगी।

हमने अपने जीवन में जो अच्छे कर्म किए उसके कारण लोग हमें याद रखेंगे।

इन सब बातों से यह निष्कर्ष निकलता है कि इस सृष्टि का कोई रचयिता है, क्योंकि कोई भी वस्तु बिना बनाने वाले के नहीं बनती। बनाने वाले को अधिकांश लोग मानते हैं,

उसे पहचानने के लिए विभिन्न लोगों को भिन्न-भिन्न मार्ग अपनाना पड़ता है। धर्मों में विविधता का कारण यही है।

बुद्धि कहती है कि ईश्वर और परलोक की बात करने वालों पर विश्वास किया जाए, क्योंकि अविश्वास की स्थिति में यदि उनकी बातें सही हुईं तो बहुत बड़ी हानि होगी।







धर्म क्या है?



धर्म क्या है? धर्म वास्तव में कुछ लोगों के विश्वासों और ईश्वर की ओर से मानव समाज के लिए संकलित शिक्षाओं को कहा जाता है और इसे एक दृष्टि से कई प्रकारों में बांटा जा सकता है।

उदाहरण स्वरूप प्राचीन व विकसित धर्म। यदि इतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो धर्म व मत लाखों करोड़ों प्रकार के हैं

किंतु हम धर्म के प्रकारों पर चर्चा नहीं करना चाहते बल्कि हम स्वयं धर्म पर संक्षिप्त सी चर्चा करेंगे।

धर्म या दीन का अर्थ आज्ञापालन, पारितोषिक आदि बताया गया है किंतु दीन अथवा धर्म की परिभाषा हैः

संसार के रचयिता और उसके आदेशों पर विश्वास व आस्था रखना। अर्थात धर्म एक प्रक्रिया का नाम है

जिसके अंतर्गत धर्म का मानने वाला इस सृष्टि के रचयिता के अस्तित्व को मानते हुए उसके आदेशों का पालन करता है।

इस आधार पर जो लोग किसी रचयिता के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते और इस सृष्टि के अस्तित्व को संयोगवश घटने वाली किसी घटना का परिणाम मानते हैं।

उनके विचार में कोई प्रलय और परलोक नहीं है बल्कि संसार एक दिन समाप्त हो जाएगा और उसी के साथ सारा अस्तित्व विलुप्त हो जाएगा। इस प्रकार के लोगों को नास्तिक कहा जाता है।

जो लोग इस सृष्टि के रचयिता को मानते हैं उन्हें धर्मिक और आस्तिक कहा जाता है अब चाहे उनकी अन्य आस्थाओं में कुछ अनुचित बातें भी क्यों न शामिल हों।

इस प्रकार संसार में पाए जाने वाले धर्मों को दो क़िस्मों में बांटा जा सकता है। सत्य व असत्य धर्म। सच्चा धर्म वह है

जिसके सिद्धांत तार्किक और वास्तविकताओं से मेल खाते हों और जिन कार्यों का आदेश दिया गया है उसके लिए उचित व तार्किक प्रमाण मौजूद हों।

अर्थात धर्म की जो परिभाषा यहां बताई गई उसके आधर पर हर वो प्रक्रिया जिसमें मनुष्य ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए कुछ संस्कार करता है उसे धर्म कहा जाता है

किंतु यह निश्चित नहीं है कि वो संस्कार सही हो क्योंकि धर्म के पालन का उद्देश्य इस सृष्टि के रचयिता को प्रसन्न करना होता है

और यह नहीं हो सकता कि वो ईश्वर परस्पर विरोधी कामों से प्रसन्न हो।

उदाहरणस्वरूप यह संभव नहीं है कि ईश्वर दूसरों को लूटने वाले से भी प्रसन्न हो और दूसरों की सहायता करने वाले से भी। झूठ से भी प्रसन्न हो और सत्य से भी।

वो यह तो झूठ से प्रसन्न होगा या फिर सत्य से। इस लिए हम यह नहीं कह सकते कि इस संसार में जितने भी धर्म हैं सब ईश्वर तक पहुंचाते हैं

और मनुष्य चाहे जिस धर्म का माने अंततः ईश्वर तक पहुंच ही जाएगा क्योंकि किसी भी गंतव्य तक पहुंचने के लिए कुछ निर्धारित मार्ग होते हैं

इस लिए यदि कोई मनुष्य ईश्वर तक पहुंचना चाहता है तो उसके लिए आवश्यक है कि वो सही मार्ग की खोज करे।

इस बात का पता लगाने का प्रयास करे कि कौन से संस्कार और कौन से कर्म ईश्वर को प्रसन्न करते हैं और कौन से कामों से वो अप्रसन्न होता है।

अब प्रश्न यह है कि हमें इस बात का पता कैसे चले कि ईश्वर कौन से कामों से प्रसन्न होता है और कौन से कामों से अप्रसन्न होता है? धर्म हमें यही बताता है।

मनुष्यों में विभिन्न प्रकार की विचारधाराएं पायी जाती हैं किंतु भौतिक व आध्यात्मिक दृष्टि से उन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है।

अर्थात कुछ विचारधाराएं ऐसी होती हैं जिनमें इस भौतिक संसार से परे भी किसी लोक व संसार के अस्तित्व को माना गया है जबकि कुछ विचारधाराएं ऐसी होती हैं

जिनमें केवल इसी संसार को सब कुछ समझा गया है। इस प्रकार से विश्व की समस्त विचारधाराएं दो प्रकार की होती हैं। ईश्वरीय विचारधारा और सांसारिक या भौतिक विचारधारा।

भौतिक विचारधारा रखने वालों को भौतिकतावादी, नास्तिक आदि जैसे नामों से याद किया जाता है जबकि आधुनिक युग में उन्हें मैटीरियालिस्ट भी कहा जाने लगा है।

भौतिकवाद में भी विभिन्न प्रकार के मत पाए जाते हैं किंतु हमारे युग में सबसे अधिक प्रसिद्ध मत है डायलेक्टिक मटीरियलिज़्म जो मार्क्सिस्ट विचारधारा का आधार है।

विभिन्न धर्मों के अस्तित्व में आने के बारे में बुद्धिजीवियों और धर्मों के इतिहास के जानकारों तथा समाज शास्त्रियों के मध्य मतभेद पाए जाते हैं

किंतु इस्लामी दृष्टिकोण से जो बातें समझ में आती हैं वह यह हैं कि धर्म के अस्तित्व में आने का इतिहास, मनुष्य के अस्तित्व के साथ ही आरंभ हुआ है।

पृथ्वी पर आने वाले सर्वप्रथम मनुष्य हज़रत आदम ईश्वरीय दूत और एकेश्वरवाद के प्रचारक थे तथा अनेकेश्वरवाद सच्चे धर्म का बिगड़ा हुआ रूप है।

अर्थात कुछ लोगों ने स्वार्थ और राजा-महाराजाओं को प्रसन्न करने के लिए ईश्वरीय धर्मों में कुछ बातें मिला दीं या कुछ बातों को कम कर दिया।

एकेश्वरवादी धर्म जो वास्तव में सच्चे धर्म हैं तीन आस्थाओं में समान दिखाई देते हैं।

एक ईश्वर में विश्वास

परलोक में मनुष्य के अनंत जीवन पर विश्वास

इस संसार में किए गए कर्मों के प्रतिफल तथा मानवजाति के मार्गदर्शन के लिए ईश्वरीय दूतों के आगमन पर विश्वास

यह तीन सिद्धांत वास्तव में हर मनुष्य के इस प्रकार के प्रश्नों के आरंभिक उत्तर हैं, सृष्टि का आरंभ कब हुआ? जीवन का अंत क्या होगा?

और किस मार्ग पर चलकर सही रूप से जीवन व्यतीत करना सीखा जा सकता है। इस प्रकार ईश्वरीय संदेश द्वारा मनुष्य को जीवनयापन का जो कार्यक्रम प्राप्त होता है।

इसी को धर्म कहते हैं जिसका आधार ईश्वरीय विचारधारा होती है।

मुख्य सिद्धांत व आस्था के लिए बहुत सी चीज़ों की आवश्यकता होती है

जो एक साथ मिलकर किसी मत अथवा विचारधारा को अस्तित्व प्रदान करती हैं और इन्हीं बातों में मतभेद के कारण ही विभिन्न प्रकार के धर्मों और मतों का जन्म होता है।

उदाहरणस्वरूप कुछ ईश्वरीय दूतों के बारे में मतभेद और ईश्वरीय किताब के निर्धारण में अलग-अलग मत ही यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म के मध्य मतभेद का मूल कारण है

जिसके आधार पर शिक्षाओं की दृष्टि से इन तीनों धर्मों में बहुत अंतर हो गया है। उदाहरण स्वरूप ईसाई त्रीश्वर को मानते हैं जो उनकी एकेश्वरवादी विचारधारा से मेल नहीं खाता।

यद्यपि ईसाई धर्म में विभिन्न प्रकार से इस विश्वास का औचित्य दर्शाने का प्रयास किया गया है।

इसी प्रकार इस्लाम में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के उत्तराधिकारी के निर्धारण की शैली के बारे में मतभेद।

अर्थात यह कि पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी का निर्धारण ईश्वर करता है या जनता। शीया व सुन्नी मुसलमानों के मध्य मतभेद का मुख्य व मूल कारण है।

तो फिर निष्कर्ष यह निकलता है कि समस्त ईश्वरीय धर्मों में एकेश्वरवाद, ईश्वरीय दूत और प्रलय मूल सिद्धांत व मान्यता के रूप में स्वीकार किया जाता है

किंतु इन सिद्धांतों की व्याख्या के परिणाम में जो अन्य विश्वास व आस्थाएं सामने आई हैं उन्हें मुख्य शिक्षा व सिद्धांत का भाग मात्र कहा जा सकता है।

ईश्वर को मानने वाले विभिन्न धर्मों में विविधता और मतभेद का कारण यही है।

इस चर्चा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं,

ईश्वर तक पहुंचने के लिए सही मार्ग का चयन आवश्यक है क्योंकि ईश्वर दो परस्पर विरोधी कामों से प्रसन्न नहीं हो सकता।

इस लिए इस बात का पता लगाना आवश्यक है कि ईश्वर कौन से कामों से प्रश्न होता है और कौन से कामों से अप्रसन्न और यह बात हमें वही बता सकता है जो उसकी ओर से आया हो।

ईश्वर तक पहुंचने का सही मार्ग वही होता है जो तर्क और बुद्धि पर खरा उतरे।

ईश्वर तक ले जाने वाले धर्मों में प्रायः मूल सिद्धांत एक समान होते हैं किंतु कुछ नियमों की व्याख्या के बारे में विभिन्न मत ईश्वरीय धर्मों की विभिन्नता कारण हैं।







जिज्ञासा





मनुष्य में स्वाभाविक रूप से वास्तविकता की खोज और सत्य तक पहुंचने की इच्छा होती है जो बालावस्था से ही उसमें प्रकट होने लगती है।

यही भावना जिसे जिज्ञासा भी कहा जाता है मनुष्य को उन विषयों के बारे में भी विचार व अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है

जो धर्म के रूप और नाम से उसके सामने पेश किए जाते हैं।

उदाहरण स्वरूप इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए मनुष्य विचार व अध्ययन करने पर प्रोत्साहित हो सकता है जैसेः क्या किसी ऐसी शक्ति का अस्तित्व है

जिसका आभास नहीं किया जा सकता और जो भौतिक विशेषताओं से परे है?

क्या लोक-परलोक के मध्य कोई संबंध है?

यदि कोई संबंध है तो क्या कोई शक्ति ऐसी भी है जिसे इंद्रियों से न समझा जा सकता हो किंतु उसीने इस ब्रह्मांड की रचना की है?

क्या मनुष्य का अस्तित्व इसी भौतिक शरीर तक और उसका जीवन इसी सांसारिक जीवन तक सीमित है या फिर कोई अन्य जीवन भी है?

यदि कोई अन्य जीवन है तो क्या उस जीवन और सांसारिक जीवन के मध्य कोई संबंध है?

यदि कोई संबंध है तो फिर किस प्रकार के सांसारिक काम परलोक और दूसरे जीवन में लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं?

जीवनयापन के सही नियम और शैली की पहचान के लिए कौन सा मार्ग अपनाया जाए कि जिससे मनुष्य लोक-परलोक दोनों में सफलता तक पहुंचे?

वह कार्यक्रम क्या है जो किसी मनुष्य को दोनों लोकों में सफल बना सकता है?

इस प्रकार मनुष्य के भीतर वास्तविकता को जानने की जो स्वाभाविक जिज्ञासा होती है।

वह उसे हर प्रकार की वास्तविकता जान लेने और उसके बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करती है। धर्म के बारे में जानकारी भी इससे अपवाद नहीं है।

मनुष्य में स्वाभाविक रूप से सत्य व वास्तविकता की खोज की जो भावना होती है, उसके अतिरिक्त भी बहुत से कारक होते हैं

जो मनुष्य को अध्ययन व वास्तविकता की खोज के लिए प्रेरित करते हैं।

वास्तविकता की खोज के अपने सिद्धांत होते हैं। सबसे पहले तो जिस विषय के बारे में जानकारी प्राप्त करनी होती है उससे संबंधित कई ऐसे विषय होते हैं

जिनकी जानकारी आवश्यक होती है।

क्योंकि बहुत सी चीज़ें ऐसी होती हैं जो किसी विशेष जानकारी पर ही निर्भर होती हैं।

उदाहरणस्वरूप विभिन्न प्रकार की भौतिक व सांसारिक सुविधाओं के लिए वैज्ञानिक शोध आवश्यक होते हैं।

आज विभिन्न प्रकार की सुविधाएं जो इस युग में हमें उपलब्ध हैं वो इसी प्रकार के वैज्ञानिक प्रयास का परिणाम हैं।

दूसरे शब्दों में मनुष्य जिस वस्तु को आवश्यक समझता है उस तक पहुंचने के लिए प्रयास करता है और इस मार्ग में आवश्यक साधन भी जुटाता है

तो फिर यदि यह विश्वास कर लिया जाए कि धर्म भी मनुष्य के हितों की रक्षा कर सकता है

और उसे बहुत से ख़तरों से बचा सकता है तो मनुष्य में अपने हितों की रक्षा और ख़तरों से बचने की जो भावना होती है

वह उसे धर्म के बारे में अध्ययन व शोध पर प्रेरित करेगी। इस प्रकार यह भावना धर्म के बारे में अध्ययन का एक कारक मानी जाती है।

अर्थात यदि कोई सही अर्थ में यह समझने लगे कि धर्म भी एक ऐसी चीज़ है जो उसे लाभ पहुंचा सकता है

और यदि उसे छोड़ दिया जाए तो उसे हानि हो सकती है तो फिर स्वाभाविक रूप से उसे धर्म के बारे में जानकारी जुटानी चाहिए।

क्योंकि हितों की रक्षाऔर हानियों से बचना मनुष्य के स्वभाव व प्रवृत्ति का भाग है। किंतु जानकारियों के इतने बड़े समूह में लोगों के पास मौजूद कम समय के कारण ऐसा हो सकता है

कि बहुत से लोग अध्ययन के लिए ऐसे विषयों का चयन करें जिनका परिणाम सरलता और शीघ्रता से

सामने आ जाए और धर्म के बारे में यह सोचकर की इस संदर्भ में अध्ययन कठिन भोगा और उसके परिणाम महत्वहीन होंगे लोग धर्म के बारे में अध्ययन न करें।

इस दृष्टि से यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि धर्म का बहुत अधिक महत्व है और यह कि धर्म के बारे में अध्ययन से अधक महत्व किसी और अध्ययन का नहीं है।

यहां पर हम यह भी स्पष्ट करना चाहेंगे कि मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ईश्वर में विश्वास एक स्वाभाविक इच्छा है जो किसी अन्य इच्छा से संबंधित नहीं है।

इस रुजहान को धर्म-बोध कहा जाता है और इसे जिज्ञासा, भलाई और सुंदरता जैसे बोधों के साथ मानव आत्मा का चौथा पहलू समझा जाता है।

बुद्धिजीवी ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर कहते हैं कि ईश्वर की उपासना सदैव ही किसी न किसी रूप में मानव समाज में मौजूद रही है

और यही तथ्य धर्म के स्वाभाविक व सदैव से होने का ठोस प्रमाण है। (जारी है)







परिपूर्णता का मार्ग





भले इंसान की भांति जीवन व्यतीत करने के लिए सही आयडियालोजी व विचारधारा आवश्यक है। इस बात को समझने के लिए तीन बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक हैः

१, मनुष्य परिपूर्णता की खोज करने वाला प्राणी है।

२, मनुष्य परिपूर्णता तक कुछ ऐसे कामों द्वारा पहुंचता है जो बुद्धि से मेल खाते हों और जिनका काना या न करना उसके अधिकार में हो।

, बुद्धि के व्यवहारिक आदेश विशेष प्रकार की वैचारिक पहचान के अंतर्गत ही संभव होते हैं

जिनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण सृष्टि के आरंभ अर्थात एकेश्वरवाद की पहचान,

जीवन के अंत अर्थात प्रलय में सफलता तक पहुंचाने वाले मार्ग की पहचान। दूसरे शब्दों में सृष्टि की पहचान, मनुष्य की पहचान और मार्ग की पहचान।

अब आइए इन तीनों के बारे में विस्तार से बात करते हैः

जो भी अपनी भावनाओं और स्वाभाविक इच्छाओं पर विचार करेगा उसे पता चल जाएगा कि इस प्रकार की बहुत सी इच्छाओं का कारण वास्तव में परिपूर्णता तक पहुंचने की भावना होती है।

मूल रूप से कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहता कि उसके अस्तित्व में किसी प्रकार की कमी रहे। वह सदैव यह प्रयास करता है कि

जितना हो सके अपनी कमियों और बुराइयों को दूर करे ताकि परिपूर्णता तक पहुंच सके और जब तक यह कमियां उसमें रहती हैं वह उन्हें दूसरों से छिपाने का प्रयास रकता है।

यह इच्छा यदि सही दिशा पा जाए तो फिर भौतिक व आध्यात्मिक विकास व उन्नति का कारण बनती है किंतु यदि विशेष परिस्थितियों के कारण अपने सही मार्ग से भटक जाए तो फिर अहंकार, दिखावा, आत्ममुग्धता आदि जैसे अवगुणों का कारण बन जाती है।

बहरहाल परिपूर्णता व अच्छाई की ओर रुजहान मनुष्य के अस्तित्व में नहिति एक स्वाभाविक कारक है जिसके चिन्हों को प्रायः बहुत ध्यान देकर समझा जा सकता है

किंतु यदि थोड़ा से चिंतन-मनन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इसका मुख्य स्रो मनुष्य में परिपूर्णता की खोज है।

पेड़-पौधों की परिपूर्णता परिस्थितियों पर निर्भर होती है और जब उसके लिए आवश्यक परिस्थितियां बन जाती हैं तो फिर बिना किसी इच्छा व अधिकार के पेड़-पौधे उगते और बढ़ते हैं।

कोई भी वृक्ष न तो अपनी इच्छा से बढ़ता है और न फल देता है क्योंकि उसके पास बोध व आभास नहीं होता।

अलबत्ता पशुओं के बारे में स्थिति थोड़ी भिन्न होती है।

उनमें इरादा और चयन की सीमित शक्ति होती है जो वास्तव में उनकी प्राकृतिक इच्छाओं से प्रेरित होती है।

पशुओं की सीमित बोध शक्ति उनके शरीर के इन्द्रीय ज्ञान पर निर्भर होती है।

किंतु मनुष्य को अपने इरादे और एक प्राणी होने के नाते उसे जो योग्यताएं प्राप्त हैं उनके अलावा आत्मिक रूप से भी दो विशिष्टताएं प्राप्त हैं।

एक ओर स्वाभाविक आवश्यकताओं के दायरे में उसकी स्वाभाविक इच्छाएं सीमित नहीं होतीं और दूसरी ओर उसे बुद्धि जैसी शक्ति भी प्राप्त है

जिसकी सहायता से वो अपने ज्ञान का असीमित रूप से बढ़ा सकता है और इन्हीं विशिष्टताओं के कारण मनुष्य के संकल्प व इरादे की सीमा, भौतिकता को पार करते हुए अनन्त तक फैल जाती है।

जिस प्रकार से पेड़-पौधे उसी समय परिपूर्ण होते हैं जब उन्हें विशेष प्रकार की ऊर्जा व शक्ति के प्रयोग का और उससे लाभ उठाने का अवसर प्राप्त हो जाए

और किसी पशु की परिपूर्णता उसी समय संभव होती है जब वह अपनी इंद्रियों और स्वाभाविक इच्छाओं का पूरी तरह पालन करे।

इसी प्रकार मनुष्य के लिए भी विशेष परिपूर्णता उसी समय संभव है जब मनुष्य अपनी विशेष शक्तियों अर्थात ज्ञान व बुद्धि का सही प्रयोग करे,

भलाई और बुराई के विभिन्न स्तरों को पहचाने और अपनी बुद्धि द्वारा भले कर्मों में सबसे अच्छे काम का चयन कर सके।

इस आधार पर एक व्यवहार उसी समय मानवीय हो सकता है जब बुद्धि के प्रयोग के साथ और विशेष मानवीय इच्छाओं के अंतर्गत हो

और जो काम पशुओं की विशेषताओं के साथ अर्थात बुद्धि व बोध के प्रयोग में लाए बिना किए जाएंगे वो निश्चित रूप से पशुओं वाले व्यवहार कहलाएंगे भले ही उसे करने वाला विदित रूप से मनुष्य दिखाई दे।

इसी प्रकार मनुष्य का वह काम जो स्वभाव या किसी प्रतिक्रिया के रूप में बिना किसी इरादे के किया गया हो वह केवल शारीरिक प्रक्रिया होती है।

संकल्प व इरादे के साथ किया जाने वाला काम इच्छित परिणाम तक पहुंचने का एक मार्ग होता है और उसका महत्व, परिणाम और आत्मा की परिपूर्णता में उसके प्रभाव पर निर्भर करता है

तो फिर यदि कोई काम किसी आत्मिक विशेषता से हाथ धोने कारण बने तो वह नकारात्मक काम होगा।

इस प्रकार मानव बुद्धि, इरादे के साथ किए जाने वाले कामों के बारे में तभी निर्णय ले सकती है और उसके महत्व को उसी समय समझ सकती है

जब उसे मनुष्य की परिपूर्णता के मानदंडों और चरणों का ज्ञान हो, उसे पता हो कि मनुष्य किस प्रकार का प्राणी है?

उसके जीवन की परिधि कहां तक है? एक मनुष्य आध्यात्मिक दृष्टि से कितनी ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है? दूसरे शब्दों में बुद्धि यह समझ ले कि मनुष्य के अस्तित्व के आयाम क्या हैं

और उसके जन्म का उद्देश्य क्या है?

इस आधार पर सही विचारधारा तक उसी समय पहुंचा जा सकता है जब विचाराधारा स्वस्थ हो और विचारधारा के अनुसरण के समय उसे जिन समस्याओं का सामना करना पड़े

उसके समाधान की उसमें शक्ति हो। क्योंकि जब तक इस प्रकार की समस्याओं के समाधान की शक्ति मनुष्य में नहीं होगी उस समय तक व्यवहार अथवा किसी काम के महत्व का बोध प्राप्त करना उसके लिए कठिन होगा। इसी प्रकार जब तक लक्ष्य स्पष्ट नहीं होगा उसम समय तक उस लक्ष्य तक पहुंचने के मार्ग का पता लगाना भी संभव नहीं हो सकता।

इस चर्चा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैः

प्रत्येक मनुष्य में प्रगति की चाहत होती है और वह स्वाभाविक रूप से अपनी कमियों को छिपाने का प्रयास करता है।

प्रगति की स्वाभाविक चाहत को यदि सही दिशा मिल जाए तो वह मनुष्य की परिपूर्णता का कारण बनती है अन्यथा विभिन्न प्रकार के अवगुणों को जन्म देती है।

पेड़-पौधों की अपनी प्रगति के लिए विशेष प्रकार की परिस्थितियां और वस्तुओं की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार पशुओं की प्रगति कुछ विशेष वस्तुओं पर निर्भर होती है। मनुष्य की प्रगति भी विशेष प्रकार की है और उसके लिए बुद्धि सहित कुछ विशेष तत्वों की आवश्यकता होती है। (जारी है)







स्वाभाविक भावना




यह जो कहा जाता है कि धर्म के प्रति जिज्ञासा एक स्वाभाविक बात है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि यह भावना सदैव सब लोगों में समान रूप से पायी जाती है

बल्कि संभव है कि बहुत से लोगों में यह भावना विशेष परिस्थितियों और ग़लत प्रशिक्षण के कारण निष्क्रिय रूप में दबी पड़ी हो या अपने स्वाभाविक मार्ग से विचलित हो गई हो।

मनुष्य की दूसरी स्वाभाविक भावनाओं से साथ भी ऐसा होना संभव है। उदाहरण स्वरूप खाने की इच्छा मनुष्य में स्वाभाविक रूप से भूख की दशा में उत्पन्न होती है

किंतु यह आवश्यक नहीं है कि यह इच्छा सब लोगों में समान रूप से पायी जाए। उदाहरण स्वरूप कुछ लोगों को किसी रोग के कारण भूख नहीं लगती,

हालांकि उनके शरीर को खाने की आवश्यकता होती है या फिर कुछ लोग भूख मिटाने वाली दवा खाकर इस इच्छा को दबाते हैं

किंतु इससे इस वास्तविकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि भूख एक स्वाभाविक इच्छा है। यही स्थिति धार्मिक भावना की भी है।

यदि कुछ लोग अपने परिवार या आसपास के वातावरण के कारण इस ओर आकृष्ट नहीं होते तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि उनमें यह भावना मौजूद नहीं है।

यह बात तो स्पष्ट हो चुकी है कि वास्तविकता की खोज और अपने हितों की रक्षा जैसी स्वाभाविक भावनाएं अध्ययन व चिंतन तथा ज्ञान प्राप्ति के लिए शक्तिशाली कारक होती हैं।

इस आधार पर जब किसी को यह पता चले कि पूरे इतिहास में कुछ ऐसे लोग रहे हैं

जो दावा करते थे कि हम इस सृष्टि के रचयिता की ओर से मानवजाति के मार्गदर्शन के लिए चुने गए हैं और हमारा ईश्वरीय कर्तव्य है कि हम लोगों के लोक-परलोक को संवारें।

इसके साथ ही यह भी पता चले कि इन लोगों ने अपने इस अभियान के लिए बड़ी कठिनाइयां झेलें और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी बात पर अडिग रहे यहां तक कि

इस प्रकार के बहुत से लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा तो फिर स्वाभाविक रूप से मनुष्य के भीतर इस प्रकार के लोगों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की भावना उत्पन्न होगी।

वह अवश्य यह जानना चाहेगा कि क्या इन ईश्वरीय दूतों के दावे सही थे और उनके पास ठोस प्रमाण थे?

विशेषकर जब उसे यह पता चलेगा कि इन ईश्वरीय दूतों ने मनुष्य के कल्याण व लोक-परलोक में सफलता दिलाने का वचन दिया है

और कहा है कि उनका मार्ग न अपनाने की स्थिति में मनुष्य को ऐसा दंड मिलेगा जो कभी भी समाप्त नहीं होगा।

अर्थात उनका यह कहना है कि यदि उनकी बात मान ली जाए तो मनुष्य को अत्यधिक लाभ पहुंचेगा और विरोध की स्थिति में बहुत बड़े नुक़सान उठाने पड़ेंगे।

इस बात को जान लेने क बाद कोई भी जानकार और समझदार व्यक्ति अपने आपको इन ईश्वरीय दूतों और उनके लाए हुए संदेशों के बारे में अध्ययन व जानकारी इकट्ठा करने से कैसे रोक सकता है?

हां यह भी हो सकता है कि कुछ लोग आलस्य के कारण अध्ययन व जानकारी प्राप्त करने का कष्ट न उठाना चाहें

या फिर यह सोचकर कि धर्म ग्रहण करने के बाद उन पर कुछ प्रतिबंध लग जाएंगे और उन्हें बहुत से कामों से रोक दिया जाएगा, इस संदर्भ में अध्ययन न करें।

किंतु ऐसे लोगों को यह सोचना चाहिए कि कहीं उनका यह आलस्य उनके लिए सदैव रहने वाले दंड और प्रकोप का कारण न बन जाए।

ऐसे लोगों की दशा उस नादान रोगी बच्चे से अधक बुरी है जो कड़वी दवा के डर से डाक्टर के पास जाने से बचता है

और अपनी निश्चित मृत्यु की भूमिका प्रशस्त करता है क्योंकि इस प्रकार के बच्चे की बुद्धि पूर्ण रूप से विकसित नहीं होती

जिसके कारण वह अपने हितों और ख़तरों को भलीभांति समझ नहीं सकता। डाक्टर के सुझाव का पालन न करने से मनुष्य इस संसार में कुछ दिनों के जीवन से ही वंचित होगा।

जानकार मनुष्य जो परलोक में सदैव रहने वाले दंड के बारे में सोचने व चिंतन करने की क्षमता रखता है उसको सांसारिक सुखों

और परलोक के दंडों और सुखों की एक दूसरे से तुलना करनी चाहिए।

संभव है कि कुछ लोग यह बहाना बनाएं कि किसी समस्या का समाधान खोजना उस समय सही होता है जब मनुष्य को उसके समाधान तक पहुंचने की आशा होती है

किंतु हमें धर्म के बारे में चिंतन व अध्ययन से किसी परिणाम की आशा ही नहीं है। इस लिए हम समझते हैं कि ईश्वर ने हमें जो योग्यताएं, क्षमताएं और शक्ति दी है

उसे हम उन कामों के लिए प्रयोग करें जिनके परिणाम व प्रतिफल हमें सरलता से मिल जाएं और जिनके परिणामों की हमें अधिक आशा हो।

ऐसे लोगों के उत्तर में यही कहना चाहिए कि पहली बात तो यह है कि धर्म संबंधी समस्याओं के समाधान की आशा अन्य विषयों से किसी भी प्रकार कम नहीं है

और हमें पता है कि विज्ञान की बहुत सी समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने दसियों वर्षों तक अनथक प्रयास किए हैं।

दूसरी बात यह है कि समाधान की आशा के प्रतिशत पर ही नज़र नहीं रखनी चाहिए बल्कि उसके बाद मिलने वाले लाभ की मात्रा को भी दृष्टिगत रखना चाहिए।

उदाहरण स्वरूप यदि किसी व्यापार में लाभ प्राप्त होने की आशा पांच प्रतिशत हो और दूसरे किसी व्यापारिक कार्य में लाभ प्राप्त होने की आशा दस प्रतिशत हो किंतु पहले वाले काम में अर्थात

जिसमें लाभ मिलने की आशा पांच प्रतिशत हो लाभ की मात्रा एक हज़ार रूपए हो और दूसरे काम में अर्थात जिसमें लाभ प्राप्त होने की आशा दस प्रतिशत है

किंतु लाभ की मात्रा सौ रूपए हो तो पहला काम दूसरे काम से दस गुना अधिक लाभदायक होगा।

उदाहरण स्वरूप यदि किसी व्यक्ति को दो स्थान बताए जाएं और उससे कहा जाए कि पहले स्थान पर दस ग्राम सोना गड़ा है किंतु इस बात की संभावना कि वहां सोना गड़ा हो पचास प्रतिशत है

जबकि दूसरे स्थान पर दस किलोग्राम सोना गड़े होने की संभावना है किंतु सोना गड़ा है कि नहीं इसकी संभावना बीस प्रतिशत है

और उस व्यक्ति को एक ही स्थान पर खुदाई करने का अधिकार हो तो बुद्धिमान व्यक्ति वही काम करेगा जिसमें संभावित लाभ अधिक हो क्योंकि निश्चित लाभ किसी स्थान पर भी खुदाई से नहीं है

तो फिर खुदाई वहीं करेगा जहां अनुमान सही होने की स्थिति में अधिक लाभ की संभावना है।

अब चूंकि धर्म के बारे में अध्ययन और उसमें चिंतन व खोज का संभावित लाभ, किसी भी अन्य क्षेत्र में अध्ययन व खोज से अधिक होगा, भले ही खोज का लाभ प्राप्त होने की संभावना कम हो,

क्योंकि किसी भी अन्य क्षेत्र में खोज का लाभ चाहे जितना अधिक हो, सीमित ही होगा परंतु धर्म के बारे में खोज के बाद जो लाभ प्राप्त होगा वह मनुष्य के लिए अनंत व असीमित होगा।

तार्किक रूप से धर्म के बारे में खोज न करने का औचित्य केवल उसी दशा में सही हो सकता है जब मनुष्य को धर्म और उससे संबंधित विषयों के ग़लत होने का विश्वास हो जाए।

किंतु यह विश्वास भी अध्ययन व खोज के बिना कैसे होगा?

चर्चा के सार बिंदु इस प्रकार हैः

धर्म की खोज एक स्वाभाविक होने के बावजूद आवश्यक नहीं है कि सारे लोगों में समान रूप से हो

क्योंकि अन्य स्वाभाविक भावनाओं की भांति इस इच्छा पर भी वातावरण व घर परिवार का प्रभाव पड़ता है।

यदि किसी मनुष्य को इतिहास में कुछ ऐसे लोगों के बारे में ज्ञात हो जो ईश्वरीय दूत होने का दावा करते थे

और कहते थे कि उनके लाए हुए धर्म को स्वीकार करने की दशा में दोनों लोकों में सफलताएं मिलेंगी और इंकार की स्थिति में सदैव के लिए नर्क में रहना होगा तो एक बुद्धिमान मनुष्य के लिए

आवश्यक है कि उनके बारे में कुछ जानकारियां जुटाए और देखे कि वे लोग क्या कहते थे और अपने कथनों के लिए उनके पास क्या प्रमाण थे? (जारी है)







स्वयं को पहचानें किंतु क्यों?




पिछली चर्चा में हमने जाना कि प्रत्येक मनुष्य में प्रगति की चाहत होती है और वह स्वाभाविक रुप से अपनी कमियों को छिपाने का प्रयास करता है

प्रगति की स्वाहाविक चाहत को यदि सही दिशा मिल जाए तो वह मनुष्य की परिपूर्णता का कारण बनती है अन्यथा विभिन्न प्रकार के अवगुणों को जन्म देती है।

इस के साथ ही हम ने इस बात पर भी चर्चा की कि पेड़ पौधों को अपनी प्रगति के लिए विशेष प्रकार की परिस्थितियों और वस्तुओं की आवश्यकता होती है

इसी प्रकार पशुओं की प्रगति विशेष प्रकार की है और उस के लिए बुद्धि सहित कुछ विशेष तत्वों की आवश्यकता होती है।

मनुष्य स्वाभाविक रुप से स्वंय को समस्त अच्छाइयों से सुसज्जित करना चाहता है। वह चाहता है कि ऐसे काम करे जो उसे एक परिपूर्ण मनुष्य बना दें

और सब लोग उसे अच्छा कहें और समझें अर्थात स्वाभाविक रुप से हर व्यक्ति में सही अर्थों में मनुष्य बनने की इच्छा होती हैं

किंतु इस बात को जानने के लिए कि कौन से वास्तव में आनन्द होग की पाश्विक भावना का अनुसरण करते हैं उन्हें मनुष्य नहीं कहा जा सकता ।

क्योंकि मनुष्य को ईश्वर ने इच्छा के साथ बुद्धि भी दी है जब कि पशुओं को केवल इच्छा दी है इस लिए जो मनुष्य बुद्धि के प्रयोग के बिना अपनी इच्छाओं का अनुसरण करता है

वह पशुओं से भी बुरा होता है। क्योंकि पशुओं के पास तो बुद्धि नहीं होती किंतु मनुष्य के पास बुद्धि होती है फिर भी वह उस का प्रयोग नहीं करता।

इस के साथ यह भी है कि चूंकि ऐसे लोग अपनी मानवीय योग्यताओं को जो वास्तव में ईश्वरीय कृपा होती है, नष्ट करते हैं इस लिए उन्हें दंड भी मिलता है।

क्योंकि स्वाभाविक बात है कि यदि आप किसी को कोई बहूमूल्य उपहार दें और उपहार लेने वाला उस का प्रयोग न करे बल्कि उसे नष्ट कर दे तो निश्चित रुप से आप को गुस्सा आएगा।

मनुष्य और ईश्वर के बारे में भी यही स्थिति है। ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि तथा अन्य बहुत सी योग्यताएं दी हैं

अब यदि मनुष्य अपनी बुद्धि और योग्यताओं का प्रयोग न करे और अपनी परिपूर्णता में उस का प्रयोग न करे

बल्कि उसे नष्ट करके पशुओं की भांति केवल अपनी इच्छाओं का अनुसरण करने लगे तो निश्चित रुप से वह ईश्वर के प्रकोप का पात्र बनेगा कि जिस ने उसे यह योग्यतांए प्रदान की हैं।

अच्छे कर्म मनुष्य को उस के गंतव्य तक पहुंचाएंगे किंतु सबसे पहले उसे अपनी परिपूर्णता की सीमाओं का ज्ञान प्राप्त करना होगा।

अर्थात मनुष्य को मनुष्य बनने के लिए किसी भी प्रयास से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि एक मनुष्य किस सीमा तक आगे जा सकता है कितनी प्रगति कर सकता है और उस की परिपूर्णता की सीमा क्या है?

मानवीय परिपूर्णता का ज्ञान और पहचान मनुष्य के अस्तित्व की वास्तविकता और उस के आरंभ व अंत के ज्ञान पर निर्भर होती है। अर्थात जब तक हमें यह ज्ञान नहीं होगा कि हम क्या हैं?

कौन हैं? कहॉं से आए हैं? हमारी वास्तविकता क्या है? तब तक हमें अपनी परिपूर्णता के मार्ग का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता इसी लिए कहा जाता है कि परिपूर्णता का ज्ञान,

मनुष्य की पहचान पर निर्भर है। उस के बाद मनुष्य के लिए विभिन्न व्यवहारों की अच्छाई व बुराई को जानना और परिपूर्णता के विभिन्न चरणों की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होगा

ताकि अपने आप को परिपूर्ण मनुष्य बनाने के लिए सही रास्ते को चुन सके क्योंकि मनुष्य जब तक इस रास्ते पर नहीं चलेगा वह सही आयडियालॉजी और मत को स्वीकार नहीं कर सकता।

इस लिए सही धर्म की खोज की दिशा में प्रयास आवश्यक है और उस के बिना मानवीय परिपूर्णता तक पहुंचना संभव नहीं होगा।

क्योंकि जो काम इस प्रकार के मूल्यों व मान्यताओं के अंर्तगत नहीं किए जाएंगे वह वास्तव में मानवीय व्यवहार ही नहीं होंगे।

जैसा कि हम बता चुके हैं जिस प्रकार पेड़ पौधों के विकारस के लिए विशेष परिस्थितियों की आवश्यक्ता होती है

उसी प्रकार मनुष्य के विकास के लिए भी विशेष परिस्थितयां होती चाहिए जो लोग सच्चे धर्म को पहचानने का प्रयास नहीं करते

या फिर पहचान लेने के बाद भी हठ धर्मी व ज़िद के कारण उस का इन्कार करते हैं वह वास्तव में स्वंय को पशुओं की पंक्ति में खड़ा कर लेते हैं।

इस अध्याय में चर्चा के मुख्य बिंदुः

मनुष्य स्वाभाविक रुप से स्वंय को समस्त अच्छाइयों से सुसज्जित करना चाहता है।

वह चाहता है कि ऐसे काम करे जो उसे एक परिपूर्ण मनुष्य बना दे।

मनुष्य को मनुष्य बनने के लिए किसी भी प्रयास से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि एक मनुष्य किस सीमा तक आगे जा सकता है

कितनी प्रगति कर सकता है और उस की परिपूर्णता की सीमा क्या है।

सही धर्म की खोज की दिशा में प्रयास आवश्यक है और उस के बिना मानवीय परिपूर्णता तक पहुंचना संभव नहीं होगा।

जो मनुष्य बुद्वि के प्रयोग के बिना अपनी इच्छाओं का अनुसरण करता है वह पशुओं से भी बुरा होता है।

क्योंकि पशुओं के पास तो बुद्धि नहीं होती किंतु मनुष्य के पास बुद्धि होती है फिर भी वह उस का प्रयोग नहीं करता।

मनुष्य यदि ईश्वर द्वारा प्रदान किये गये उपहारों अर्थात अपनी बुद्धि और योग्यताओं को नष्ट करता है तो ईश्वरीय प्रकोप का पात्र बन जाता है।