अक़ायदे नूर
 

बाईसवाँ सबक़

रजअत

रजअत अक़्ल की रौशनी में

अरबी ज़बान में रजअत पलटने के मअना में है और इस्तेलाह में मौत के बाद और क़यामत से पहले बाज़ लोगों के दोबारा ज़िन्दा होने को रजअत कहते हैं, इमाम मेहदी (अ) के ज़हूर के साथ ही रजअत भी होगी। यह एक ऐसी हक़ीक़त है जो न अक़्ल के ख़िलाफ़ है और न ही वहयी से इस का टकराव ज़ाहिर होता है।

इस्लाम और दूसरे आसमानी दीन की नज़र से इंसान की अस्ल उस की वह रुह होती है जिस को नफ़्स भी कहा जाता है और वह बदन के फ़ना हो जाने के बाद भी बाक़ी रहती है।

दूसरी तरफ़ हम देखते हैं कि ख़ुदा क़ादिरे मुतलक़ है और उस की क़ुदरत को कोई चीज़ महदूद नही कर सकती।

बयान की गई दोनो बातों से यह वाज़ेह हो जाता है कि रजअत का मसला अक़्ल के हिसाब से एक मुम्किन काम है। इस लिये कि जो ख़ुदा इंसान को पहली बार पैदा कर सकता है उस ख़ुदा के लिये कुछ इंसानों को दोबारा इस दुनिया में पलटाना तो और भी ज़्यादा आसान होगा।



रजअत क़ुरआन की नज़र में

क़ुरआने मजीद में पिछली उम्मतों और क़ौमों में रजअत के नमूने पाये जाते हैं जिन से मालूम होता है कि तारीख़ में कुछ ऐसे लोग गुज़रे हैं जिन को ख़ुदा ने मौत के बाद दोबारा इस दुनिया में पलटाया है। हज़रत मूसा (अ) की क़ौम के बारे में इरशाद होता है:

و اذ قلتم یا موسی لن نومن لک حتی نری الله جهرة فاخذتکم الصاعقة و انتم تنظرون

(और याद करो उस वक़्त को जब तुम ने कहा: ऐ मूसा, हम उस वक़्त तक तुम पर ईमान नही लायेगें जब कि ख़ुदा को देख नही लेते। लिहाज़ा तुम पर बिजली गिरी और तुम देखते रह गये फिर हमने तुम्हे तुम्हारी मौत के बाद ज़िन्दा किया कि शायद तुम शुक्र गुज़ार बन जाओ।) (सूर ए बक़रा आयत 55, 56)

इसी तरह क़ुरआने मजीद में हज़रत ईसा (अ) की ज़बानी इरशाद होता है: واحي الموتي باذن الله

(मैं मुर्दों को ख़ुदा के हुक्म से ज़िन्दा करता हूँ।) (सूर ए आले इमरान आयत 49)

पिछली दोनो आयतें रजअत के मुम्किन होने को साबित करती हैं जब कि ऐसी भी आयतें मौजूद हैं जिन में क़यामत से पहले बाज़ लोगों के बारे में ज़िन्दा होने की ख़बर दी गई है और यही वह रजअत है। जिस के हम शिया क़ायल है, यह रजअत अभी तक वाक़े नही हुई है, इस सिलसिले में इरशाद होता है: و اذ وقع القول علیهم اخرجنا لهم دابة من الارض تکلمهم ان الناس کانوا بآیاتنا لا یوقنون و یوم نحشر من کل امة فوجا ممن یکذب بآیاتنا فهم یوزعون

(और जब उन पर वादा पूरा होगा तो हम ज़मीन से एक चलने वाला निकाल कर खड़ा कर देगें जो उन से बात करे कि कौन लोग हमारी आयतों पर यक़ीन नही रखते थे और उस हम हर उम्मत से एक फ़ौज इकठ्ठा करेगें। जो हमारी निशानियों को झुठलाया करते थे और फिर अलग अलग तक़सीम कर दिये जायेगें।) (सूर ए नम्ल आयत 82, 83)

क़यामत से पहले पेश आने वाली रजअत के सुबूत में इन आयतों को दलील बनाने के लिये नीचे बयान होने वाली बातों पर तवज्जो देना ज़रुरी है:

1. शिया और सुन्नी मुफ़स्सिरों के मुताबिक़ यह आयतें क़यामत के बारे में नाज़िल हुई है। पहली आयत, क़यामत की अलामत बयान कर रही है जब कि जलालुद्दीन सुयूती एक रिवायत नक़्ल करते हैं जिस में ज़िक्र हुआ है कि चौपाये का निकलना क़यामत की निशानी है।[1]
2. बिला शक व शुबहा क़यामत के दिन तमाम इंसान उठाये जायेगें न कि कोई ख़ास गिरोह। इस लिये कि क़ुरआने मजीद में सूरते हाल यूँ बयान की गई है: ذلک یوم مجموع له الناس

(उस दिन जब सब लोग जमा किये जायेगें।) (सूर ए हूद आयत 103) इस आयत से वाज़ेह है कि क़यामत के दिन तमाम इंसान ज़िन्दा किये जायेगें और यह बात किसी ख़ास गिरोह से मख़सूस नही है।

3. सूर ए नम्ल की 83 वी आयत में एक ख़ास गिरोह के ज़िन्दा किये जाने के बारे में बात कही गई है और यह आयत तमाम इंसानों के उठाये जाने का इंकार कर रही है इस आयत में इरशाद हुआ है: و یوم نحشر من کل امة فوجا ممن یکذب بآیاتنا فهم یوزعون

(और उस दिन हम हर उम्मत से एक एक गिरोह को इकठ्ठा करेगें जो हमारी आयतों को झुटलाया करते थे।)

यह आयत इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि तमाम इंसान ज़िन्दा नही किये जायेगें।

नतीजा: इन तीनों बातों से यह बात वाज़ेह हो जाती है कि इंसानों के एक ख़ास गिरोह के ज़िन्दा किये जाने की जो बात इस आयत में ज़िक्र हुई है वह क़यामत से पहले वाक़े होगी। इसलिये कि क़यामत में सिर्फ़ कोई ख़ास गिरोह नही उठाया जायेगा बल्कि तमाम इंसान उठाये जायेगें लिहाज़ा मानना पड़ेगा कि यह ज़िन्दा किया जाना क़यामत के दिन के ज़िन्दा किये जाने से बिल्कुल अलग होगा और यही रजअत है।

इसी लिये अहले बैत (अ) से इस सिलसिले में बहुत सी हदीसें नक़्ल हुई हैं। यहाँ सिर्फ़ दो रिवायतों को बयान किया जा रहा है। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) इरशाद फ़रमाते हैं: तीन दिन ख़ुदा के हैं: ज़हूर इमाम ज़माना, रजअत और क़यामत।

आप एक और मक़ाम पर इरशाद फ़रमाते हैं: दो शख़्स हमारे दोबारा पलटने (रजअत) पर ईमान न रखे वह से नही है।



रजअत का फ़लसफ़ा

अक़ीद ए रजअत को जानने के बाद ज़हन में यह सवाल पैदा होता है कि आख़िर रजअत क्यों वाक़े होगी और बाज़ लोगों को दोबारा इस दुनिया में पलटाए जाने का फ़लसफ़ा क्या है?

इस सिलसिले में ग़ौर व फ़िक्र करने से रजअत के दो अहम मक़सद सामने आते हैं:

1. बाज़ काफ़िरों को इस दुनिया में वापस भेज कर उन्हे हक़ीक़ी इस्लाम की अज़मत व सर बुलंदी और कुफ़्र की पस्ती को दिखाना।
2. नेक और सालेह लोगों को ईनाम और ज़ालिमों और काफ़िरों को सज़ा देना।



ख़ुलासा
-अरबी ज़बान में ‘’रजअत’’ पलटने के मअना में है और इस्तेलाह में मौत के बाद और क़यामत से पहले लोगों के दोबारा दुनिया में वापस आने के मअना में है।

-इमामे ज़माना के ज़हूर के साथ ही रजअत होगी, यह एक ऐसी हक़ीक़त है जो न अक़्ल के मुख़ालिफ़ हैं और न ही वहयी ए ख़ुदा के बर ख़िलाफ़। इस लिये कि ख़ुदा ला महदूद क़ुदरत का हामिल है लिहाज़ा वह इस बात पर भी क़ादिर है कि इंसान को दोबारा इस दुनिया में पलटा दे।

-क़ुरआने मजीद में भी ऐसी आयतें मौजूद हैं जिनसे वाज़ेह तौर पर अक़ीद ए रजअत साबित होता है। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) फ़रमाते है कि जो शख़्स दुनिया में हमारे दोबारा पलटने पर यक़ीन न रखे वह हम से नही है।

रजअत के दो अहम फ़लसफ़े:

1. बाज़ काफ़िरों को दोबारा इस दुनिया में पलटा कर उन्हे इस्लाम की हक़ीक़ी अज़मत और कुफ़्र की ज़िल्लत दिखाना।
2. मोमिन और नेक लोगों को ईनाम और ज़ालिमों और काफ़िरों को सज़ा देना।



सवालात:
1. लुग़त और इस्तेलाह में रजअत के क्या मअना हैं?
2. रजअत कब वाक़े होगी?
3. रजअत को अक़्ली ऐतेबार से साबित करें?
4. रजअत के बारे में इमाम सादिक़ (अ) ने क्या फ़रमाया है?
5. रजअत के दो फ़लसफ़े बयान करें?



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[1]. तफ़सीरे दुर्रुल मंसूर जिल्द 5 पेज 77, सूर ए नम्ल आयत 82 की तफ़सीर में