अक़ायदे नूर
 

इक्कीसवाँ सबक़

मआद जिस्मानी है या रूहानी
जब मआद की बात आती है तो हमारे ज़हन में एक सवाल पैदा होता है कि क्या मौत के बाद की ज़िन्दगी सिर्फ़ रुहानी ज़िन्दगी है? क्या जिस्म ख़त्म हो जायेगा? क्या आख़िरत की ज़िन्दगी सिर्फ़ रूह से मुतअल्लिक़ है?

इन तमाम सवालों का जवाब सिर्फ़ एक जुमला है और वह यह कि मआद या आख़िरत की ज़िन्दगी न सिर्फ़ यह कि रूहानी है बल्कि जिस्मानी भी है। इस नज़रिये पर बहुत सी दलीलें मौजूद हैं जिन में से बाज़ यह है:

1. एक दिन उबई बिन ख़लफ़ पैग़म्बरे इस्लाम (स) की ख़िदमत में एक पुरानी हडडी ले कर आया और मआद यानी मौत के बाद ज़िन्दा होने का इंकार करने की ग़रज़ से उसने हड्डियों को मसल दिया और उस के बुरादे को हवा में बिखेर दिया फिर सवाल किया कि कैसे मुम्किन है कि यह फ़ज़ा में बिखरी हुई हड्डी दोबारा अपनी पुरानी सूरत में आ जाये? तो यह आयत नाज़िल हुई: (........................) कह दो कि उसे वही ज़ात दोबारा ज़िन्दा करेगी जिसने उस पहली बार वुजूद बख़्शा। (सूर ए यासीन आयत 79)
2. क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

قل یحییها الذی انشاها اول مرة

(क़यामत के दिन तुम क़ब्रों से निकलोगे।)(सूर ए क़मर आयत 7)

हम जानते हैं कि क़ब्र बदन की जगह है, रूह का मक़ाम नही है लिहाज़ा साबित हो जाता है कि क़ब्र से लोगों के जिस्म निकलेगें।

3. क़ुरआने मजीद में एक आयत है जिस में बयान हुआ है कि एक अरबी शख्स लोगों से पैग़म्बरे इस्लाम (स) के बारे में कहता था: क्या यह इंसान तुम से इस बात का वादा कर रहा है कि तुम मर कर ख़ाक और हड्डी हो जाओगे और उस के बाद फिर ज़िन्दगी हासिल कर लोगे?।

इस आयत से भी मालूम होता है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) लोगों से यह फ़रमाते थे कि यही जिस्म ख़ाक होने के बाद दोबारा ज़िन्दा किया जायेगा।

इस तरह की बहुत सी आयतें क़ुरआने मजीद में मौजूद हैं जिस का मुतालआ करने के बाद वाज़ेह हो जाता है कि मआद सिर्फ़ रूहानी नही है बल्कि जिस्मानी भी है।



ख़ुलासा

-मआद सिर्फ़ रूहानी नही बल्कि जिस्मानी भी है।

-मआद के जिस्मानी होने पर उबई बिन ख़लफ़ का वाक़ेया और क़ुरआन की आयते मोहकम और मज़बूत दलीलें हैं। सवालात

1. मआद जिस्मानी है या रूहानी?
2. उबई बिन ख़लफ़ के वाक़ेया के ज़रिये साबित करें कि मआद जिस्मानी भी है?