अक़ायदे नूर
 
पंदरहवाँ सबक़

पैग़म्बरे इस्लाम (स) आख़िरी नबी
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रते मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) आख़िरी नबी हैं यानी आप पर सिलसिले नबूवत ख़त्म हो गया । इसी लिये आपको (स) ख़ातिमुल अम्बिया कहा जाता है । यह बात दीने इस्लाम की ज़रूरियात में से है यानी हर मुसलमान के लिये ज़रूरी है कि जिस तरह वह तौहीद का इक़रार करता है उसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम (स) की ख़ातेमीयत का भी इक़रार करे ।

दर हक़ीक़त पैग़म्बरे इस्लाम (स) के मबऊस होने के बाद क़ाफ़िले बशरीयत ने एक के बाद एक (आहिस्ता आहिस्ता) आपने कमाल की राहें तय कीं और इस मक़ाम पर पहुच गया कि अब वह अपने रुश्द व नुमू की राहों को इस्लामी तालीमात के सहारे ख़ुद तय कर सकता था यानी इस्लाम एक ऐसा क़ानून बनकर सामने आया जो ऐतेक़ादात के लिहाज़ से भी कामिल था और अमल के लिहाज़ से भी इस तरह मुनज़्ज़म किया गया था कि हर ज़माने के इंसान की ज़रूरतों को पूरा कर सके।



पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ख़ातिमुल अंबिया होने की दलीलें

1. हुज़ूरे अकरम (स) की ख़ातेमियत पर बहुत सी क़ुरआनी आयात गवाह हैं मिसाल के तौर पर इरशाद होता है:

ما کان محمدا ابا احد من رجالکم ولکن رسول الله و خاتم النبین (सूर ए अहज़ाब आयत 40)

‘’हज़रते मोहम्मद (स) मर्दों में से किसी के बाप नही हैं बल्कि वह सिर्फ़ रसूले ख़ुदा और ख़ातिमुल अम्बिया हैं।’’

मज़कूरह आयत से मालूम होता है कि जिस तरह लोगों के लिये पैग़म्बरे इस्लाम (स) की रिसालत वाज़िह व ज़ाहिर थी उसी तरह आप (स) की ख़ातेमीयत भी साबित व उस्तुवार थी ।

2. बहुत सी रिवायतें मौजूद हैं जो आप (स) की ख़ातेमीयत पर वाज़िह दलील हैं । यहाँ सिर्फ़ चंद रिवायात ज़िक्र की जा रही हैं :

) जाबिर बिन अब्दुलाहे अंसारी ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से एक मोतबर हदीस नक़ल की है कि आपने (स) फ़रमाया: ‘’मैं पैग़म्बरों के दरमियान उसी तरह हूँ जैसे कोई ख़ूबसूरत घर बना डाले, उसे कामिल कर दे लेकिन उसमें सिर्फ़ एक ईट की जगह छोड़ दे, अब जो भी इस घर में दाख़िल होगा तो कहेगा कि कितना ख़ूबसूरत घर है लेकिन इसमें एक कमी है कि यह जगह ख़ाली ह , मैं भी इमारते नबूवत की वहू आख़िरी ईट हूँ और नबूवत मुझ पर ख़त्म होती है’’।

) इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं:

حلال محمد حلال الی یوم القیامة وحرامه حرام ابدا الی یوم القیامة [1]

‘’हलाले मोहम्मद ता क़यामत हलाल और हरामे मोहम्मद ता क़यामत हराम है’’।

स) शिया व सुन्नी किताबों में एक मारूफ़ और मोतबर हदीस मौजूद है जिसमें नबी अकरम (स) हज़रत अमीरुल मोमीनीन (अ) को ख़िताब करते हुए फ़रमाते हैं:

انت منی بمنزلة هارون من موسی الا انه لا نبی بعدی

’ऐ अली (अ) तुमको मुझसे वही निस्बत है जो हीरून (अ) को मूसा (अ) से थी बस फ़र्क़ यह है कि मेरे बाद कोई नबी न होगा।‘’[2]


ख़ुलासा

- पैग़म्बरे इस्लाम हज़रते मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) आख़िरी नबी हैं इसी लिये आपको (स) ख़ातिमुल अम्बिया कहा जाता है । ख़तिमीयते रसूले इस्लाम (स) पर ईमान रखना ज़रूरियाते दीन में से है।

-इस्लाम ऐतेक़ादात और आमल के लिहाज़ से इस तरह मुनज़्ज़म किया गया है कि हर ज़माने के इंसान की ज़रूरतों को पूरा कर सकता है । इसी लिया इस्लाम आख़िरी दीन और नबी अकरम (स) आख़िरी रसूल हैं ।

- पैग़म्बरे इस्लाम (स) की ख़ातेमीयत पर बहुत सी आयात व रिवायात दलील के तौर पर मौजूद हैं।



सवालात

1. पैग़म्बरे इस्लाम (स) को ख़ातिमुल अम्बिया क्यों कहा जाता है?

2. क्या पैग़म्बरे इस्लाम (स) की ख़तिमीयत पर ईमान रखना ज़रूरीयाते दीन में से है?

3. दीने इस्लाम के आख़िरी दीन और नबी अकरम (स) के आख़िरी रसूल होने का क्या सबब है ?

4. नबी अकरम (स) की ख़तिमीयत पर दलालत करने वाली वह हदीस लिखें जो आपने हज़रत अली (अ) को ख़िताब करके बयान फ़रमाई थी।

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[1]. उसूले काफ़ी जिल्द 1 पेज 58

[2]. सही बुख़ारी बाब 14 पेज 387, सही मुस्लिम जिल्द 3 पेज 278