अक़ायदे नूर
 

तेरहवाँ सबक़

नबियों का मासूम होना
हम पिछले सबक़ में पढ़ चुके हैं कि नबियों के आने का मक़सद लोगों की हिदायत व रहबरी है और यह बात भी अपनी जगह मुसल्लम है कि अगर ख़ुद रहबर और हादी गुनाहों में फंसे हों तो वह अपनी क़ौम की हिदायत नही कर सकते और उन्हे नेकी और पाक दामनी की तरफ़ दावत नही दे सकते। हर नबी के लिये ज़रुरी है कि वह सब से पहले इस तरह लोगों का ऐतेमाद हासिल करे कि उसके क़ौल व अमल में ख़ता और ग़लती का ऐहतेमाल भी न दिया जाये, अगर नबी मासूम न हो तो दुश्मन उन की ख़ता और ग़लती को बुनियाज बना कर और दोस्त उन की दावत को बे बुनियाद समझ कर दीन को क़बूल नही करेगें। लिहाज़ा ज़रुरी है कि अल्लाह के नबी मासूम हों यानी हर तरह की ख़ता, ग़लती और भूल चूक से पाक हों ता कि लोग उन की पैरवी करते हुए सआदत व ख़ुशियों की मंज़िलों तक पहुचें।

यह कैसे मुम्किन है कि ख़ुदा बिला क़ैद व शर्त किसी इंसान की इताअत का हुक्म दे दे जबकि उसके अंदर ख़ता का इम्कान व ऐहतेमाल भी पाया जाता हो? ऐसी सूरत में क्या लोगों को उस की इताअत व पैरवी करना चाहिये? अगर पैरवी करें तो गोया उन्होने एक ख़ता कार की पैरवी की है और अगर न करें तो नबियों की रहबरी बे मक़सद हो जायेगी।

यही वजह है कि मुफ़स्सेरीन जब आयत

اطیعوا الله واطیعوا الرسول و اولی الامر منکم

इताअत करो ख़ुदा की और इताअत करो रसूल और उलिल अम्र की, (सूर ए निसा आयत 59) पर पहुचते हैं तो कहते हैं कि ख़ुदा ने बिला क़ैद व शर्त रसूल की इताअत का हुक्म दिया है और यह इस बात की दलील है कि रसूल भी मासूम हैं और उलिल अम्र यानी आइम्म ए मासूमीन (अ) भी वर्ना ख़ुदा हरगिज़ उन की बिला क़ैद व शर्त पैरवी करने का हुक्म नही देता। नबियों की इस्मत को साबित करने का एक रास्ता यह है कि हम ख़ुद को देखें, जब हम अपने अंदर ग़ौर व फ़िक्र करेंगे तो देखेंगे कि हम भी बाज़ गुनाहों या गंदे और बुरे कामों में मासूम हैं जैसे क्या कोई अक़्लमंद इंसान बैतुल ख़ला की गंदगी या कूढ़ा करकट खा सकता है? क्या कोई समझदार इंसान बिजली के नंगे तार को छू सकता है? क्या कोई समझदार और मतीन इंसान नंगा हो कर सड़क व बाज़ार में आ सकता है? ऐसे बहुत से दूसरे सवाल जिनका जवाब क़तई तौर पर नही में होगा यानी ऐसे काम समझदार लोग कभी नही करेंगे और अगर कोई शख़्स ऐसे काम अंजाम दे तो यक़ीनन या तो वह दीवाना होगा या फ़िर किसी मजबूरी में वह अफ़आल अंजाम दे रहा होगा।

जब हम ऐसे कामों का तवज्जो करते हैं तो मालूम होता है कि इन कामों की बुराई हमारे लिये इस क़द्र वाज़ेह व ज़ाहिर है कि हम उसे अंजाम नही दे सकते।

इस मक़ाम पर पहुँचने के बाद हम यह कह सकते हैं कि हर अक़्ल मंद व समझदार इंसान बाज़ गंदे और बुरे कामों से महफ़ूज़ है यानी एक तरह की इस्मत का हामिल है ।

इस मरहले से गुज़रने के बाद हम देखते है कि बाज़ लोग बहुत से दूसरे कामों को भी अंजाम नही देते हैं जबकि आम लोगों के लियह वह मामूली सी बात होती है जैसे एक माहिर और जानकार डाँक्टर जो हर तरह के जरासीम के बारे में जानता है, हरगिज़ इस बात पर राज़ी नही होगा कि सड़क पर लगे नल का गंदा पानी पिये जब कि मुम्किन है कि एक आम इंसान उस पानी को हमेशा पिये और उस में किसी तरह की कराहत का अहसास भी न करे।

इससे मालूम होता है कि इंसान का इल्म जितना ज़्यादा होगा वह उतना ही बुरे और गंदे कामों से अमान में रहेगा लिहाज़ा अगर किसी का इल्म और उसका ईमान इतना ज़्यादा बुलंद हो जाये और ख़ुदा पर उसका यक़ीन इस क़द्र ज़्यादा हो जाये कि वह हर जगह उसको हाज़िर व नाज़िर जानता हो तो यक़ीनन ऐसा शख़्स महफ़ूज़ होगा, अब उसके सामने हर बुरा काम और हर गुनाह बैतुल ख़ला की गंदगी, कूड़ा करकट खाने, बिजली के नंगे तार को छूने या कूचे व बाज़ार में बिल्कुल बरहना होने के मानिन्द होगा ।

इन तमाम बातों का नतीजा यह हुआ कि हमारे अंबिया अपने बे पनाह इल्म और बे नज़ीर ईमान की वजह से गुनाहों और हर तरह की भूल चूक से महफ़ूज़ हैं और कभी भी गुनाहों के असबाब उन पर ग़लबा हासिल नही कर सकते और यही अंबिया की इस्मत का मफ़हूम है।

ख़ुलासा

-अंबिया ए इलाही (अ) का मासूम होना लाज़मी है इस लिये कि :

1.जो शख़्स ख़ुद गुनाह अंजाम देता हो उसमें ख़ता का इम्कान हो वह दूसरों की हिदायत नही कर सकता।

2.ख़ुदा ऐसे शख़्स की बिला क़ैद व शर्त पैरवी करने का हुक्म नही दे सकता जिसमें गुनाह अंजाम देने का इम्कान हो।

-अंबिया ए इलाही (अ) अपने बे पनाह इल्म और बे नज़ीर ईमान की वजह से गुनाह अंजाम नही देते।

सवालात

1. हादी व रहबर को ख़ता व ग़लतियों से क्यों महफ़ूज़ होना चाहिये?

2. ख़ुदा ख़ताकार शख़्स की बिला क़ैद व शर्त पैरवी करने का हुक्म क्यों नही दे सकता?

3. किस तरह आक़िल और बाशऊर इंसान बाज़ गंदे और बुरे कामों को अंजाम देने में मासूम होता है? चंद मिसालों से वाज़िह करें।