अक़ायदे नूर
 
आठवाँ सबक़
तौहीद के फ़ायदे

यह बात मुसल्लम है कि अक़ीदा इंसान पर अपना असर छोड़ता है, अगर अक़ीदा बुरा है तो असर भी बुरा होगा और अगर अक़ीदा अच्छा है तो असर भी अच्छा होगा। तौहीद भी एक ऐसा अक़ीदा है जो मुख़्तलिफ़ जेहतों से हमारी ज़िन्दगी पर नेक और अच्छे असरात ज़ाहिर करता है। किताबों में ख़ुदा पर ईमान रखने के बहुत से फ़ायदे बयान किये गये है जिन में से बाज़ यहाँ ज़िक्र किये जा रहे हैं:

1. गुनाहों से बचना

जो शख़्स अल्लाह पर ईमान रखता है वह तमाम हालात में अल्लाह को हाज़िर व नाज़िर जानता है जिस की वजह से वह ख़ुदा वंदे आलम से शर्म करता है और गुनाह करने से बचता है नतीजे में उस की इंफ़ेरादी और समाजी ज़िन्दगी भी बेहतरीन, सालिम और ख़ुदा पसंद हो जाती है।

2. तंहाई का अहसास न करना

इंसान एक समाजी मख़लूक़ है जो दूसरों के बग़ैर ज़िन्दगी नही गुज़ार सकता और समाज से दूर रह कर तंहाई को इख़्तियार कर लेना उस की फ़ितरत के ख़िलाफ़ है। यक़ीनन उसे कोई अपना चाहिये जो उस का हमदम और हमेशा साथ रहने वाला हो। ख़ुदा से बढ़ कर कौन अपना और हमेशा साथ रहने वाला हो सकता है इस लिये कि क़रीब से करीब तरीन शख़्स भी हर वक़्त इंसान के साथ नही रह सकता लेकिन ख़ुदा सिर्फ़ ज़िन्दगी ही में नही बल्कि मौत के बाद भी उस के साथ है। लिहाज़ा अगर कोई ख़ुदा पर ईमान रखे तो उसे किसी तरह की तंहाई का अहसास नही सतायेगा और वह हमेशा यह कहता हुआ नज़र आयेगा कि कोई नही तो ख़ुदा तो है।

3. ज़िन्दगी के मक़सद से वाक़िफ़ होना

ख़ुदा पर ईमान के ज़रिये इंसान अपने मक़सद की पहचान हासिल कर लेता है, जब वह जान लेता है कि ख़ुदा ने हमें पैदा किया है और ख़ुदा कोई काम बे मक़सद अंजाम नही देता लिहाज़ा उसने हमें भी बे मक़सद पैदा नही किया है बल्कि ज़रुर किया हदफ़ व मक़सद के लियह पैदा किया है और वह हदफ़ व मक़सद उस की इताअत व बंदगी है तो वह अपनी ज़िम्मेदारी को भी पहचान लेता है, हर काम ख़ुदा से करीब होने के लिये अंजाम देता है, उस की इताअत करता है और यही उस की ज़िन्दगी का मक़सद है जिस को वह ख़ुदा पर ईमान के ज़रिये पहचान लेता है।

4. नेक कामों से न थकना

अगर सिर्फ़ लोगों को ख़ुश करने के लिये नेक काम किया जाये तो अकसर देखने में आता है कि लोग उस की क़द्र नही करते, जब तक फ़ायदा होता रहता है लोग उस के पीछे पीछे रहते हैं और जब फ़ायदा ख़त्म हो जाता है तो उस की नेकियों को भूल कर उस के दुश्मन हो जाते हैं नतीजे में वह शख़्स मायूस हो कर नेक काम करना भूल जाता है। इसी लिये यह मुहावरा बन गया है कि ‘’नेक कर दरिया में डाल’’ लेकिन अगर कोई शख़्स ख़ुदा पर ईमान रखे और सिर्फ़ उस को ख़ुश करने के लियह काम अंजाम दे तो लोगों की बुराईयों और उन की दुश्मनी से कभी मायूस नही होगा और नेक काम करने से कभी नही थकेगा। इसलियह कि उसे यक़ीन है कि मेरा अमल का असली ईनाम तो आदिल ख़ुदा देगा जिस के यहाँ ज़र्रा बराबर अमल भी बर्बाद नही जाता। कु़रआने मजीद में इरशाद होता है:

فمن یعمل مثقال ذرة خیرا یره

जो ज़र्रा बराबर भी नेकी करेगा उस की जज़ा पायेगा। (सूर ए ज़िलज़ाल आयत 10)

ख़ुदा पर ईमान रखने वाले कभी नही कहते कि ‘’नेकी कर दरिया में डाल’’ बल्कि वह यह कहते हुए नज़र आते हैं कि नेकी करो और आख़िरत के पूँजी जमा करो।

ख़ुलासा

-अक़ीदा इंसान पर अपना असर छोड़ता है, अक़ीद ए तौहीद के भी बहुत से फ़ायदे हैं जो इंसानी ज़िन्दगी में पायह जाते हैं जिन में कुछ यह हैं:

1. गुनाहों से बचना।
2. तंहाई का अहसास न करना।
3. ज़िन्दगी के मक़सद से वाक़िफ़ होना।
4. नेक कामों से न थकना।

सवालात

1. इंसान ख़ुदा पर ईमान के ज़रिये किस तरह गुनाहों से बच सकता है?
2. ख़ुदा पर ईमान रखने वाला नेक कामों से क्यो नही थकता?