अक़ायदे नूर
 

सातवाँ सबक़

तौहीद की क़िस्में
हमारे उलामा ने तौहीद की चार क़िस्में बयान की हैं:

1. तौहीदे ज़ात
2. तौहीदे सिफ़ात
3. तौहीदे अफ़आल
4. तौहीद इबादत

1. तौहीदे ज़ात: अभी तक जो हमने तौहीद के बारे में पढ़ा है वह तौहीदे ज़ात ही है। तौहीदे ज़ात का मतलब यह है कि ख़ुदा की ज़ात एक है और उस का कोई शरीक नही है, न उस को किसी ने पैदा किया है और न ही वह किसी का बाप या माँ है, न वह किसी दूसरे का जुज है और न कोई दूसरा उस की जुज़ है यानी वह किसी चीज़ से मिल कर नही बना है।
2. तौहीद सिफ़ात: तौहीद सिफ़ात का मतलब यह है कि ख़ुदा की सिफ़ात ऐने ज़ात हैं यानी उस की सिफ़ात और उसकी ज़ात जो अलग अलग चीज़ें नही हैं, ऐसा नही है कि ख़ुदा की ज़ात अलग है और उस की क़ुदरत अलग है या ख़ुदा की ज़ात अलग है और उसका इल्म अलग है बल्कि सही तो यह है कि ख़ुदा ही इल्म है और ख़ुदा ही क़ुदरत है।
3. तौहीद अफ़आल: तौहीदे अफ़आल का मतलब यह है कि दुनिया में जितने भी काम अंजाम पाते हैं वह ख़ुदा वंदे आलम से मुतअल्लिक़ होते हैं। इंसानों का खाना पीना, उनकी साँसों का आना जाना, सूरज का निकलना और डूबना, चाँद का चमकना, जानवरों का चलना फिरना, नदियों का बहना, तारों का चमकना, यह सब कुछ हक़ीक़त में अल्लाह के काम हैं, इंसान भी अपने कामों में ख़ुदा का मोहताज है। मिसाल के तौर पर जब हम एक बल्ब को चलता हुआ देखते हैं तो समझते हैं कि यह उस की अपनी बिजली है लेकिन ग़ौर करने के बाद मालूम होता है कि उस बल्ब की निस्बत बिजली घर से है उसी वजह से यह रौशनी दे रहा है यानी अगर बिजली घर न होता तो बल्ल बिजली देने की सलाहियत नही के बावजूद रौशनी न दे पाता। इसी तरह अगर इंसान या दूसरे जानदारों को ख़ुदा की तरफ़ से ताक़त (power) न मिलती तो वह अपने काम को अंजाम नही दे सकते थे। लेकिन चुँकि ख़ुदा ने क़ुदरत व ताक़त के साथ इंसान को इख़्तियार भी दिया है लिहाज़ा यह नही कहा जा सकता कि अगर इंसान ने गुनाह अंजाम दिया है तो वह ख़ुदा ने अँजाम दिया है और वह गुनाह करने वाला सज़ा का हक़दार नही है। इसलिये कि जब ख़ुदा ने उसे इख़्तियार दिया है तो सज़ा देने का हक़ भी रखता है और वह हम से यह सवाल कर सकता है कि जब तुम गुनाह पर मजबूर न थे तो तुमने उसे क्यों अंजाम दिया?
4. तौहीदे इबादत: तौहीदे इबादत का मतलब यह है कि इबादत सिर्फ़ हक़ीक़ी ख़ुदा यानी अल्लाह की करनी चाहिये क्योकि सिर्फ़ वही इबादत के लायक़ है और सिर्फ़ वह ही ऐसी सिफ़ात व कमालात का हामिल है जिन की वजह से उस की इबादत की जा सकती है।

ख़ुलासा

-तौहीद की चार क़िस्में हैं:

1. तौहीदे ज़ात: यानी ख़ुदा एक है और कोई उस का शरीक नही है।
2. तौहीदे सिफ़ात: यानी ख़ुदा की ज़ात उस की सिफ़ात से जुदा नही हैं।
3. तौहीद अफ़आल: यानी दुनिया में जो भी काम होता है सब की निस्बत ख़ुदा की तरफ़ है लेकिन यहाँ यह नही कहा जा सकता कि अगर इंसान गुनाह कर रहा है तो वह ख़ुदा का काम है। इस लिये कि ख़ुदा ने इंसान को इख़्तियार दो कर भेजा है।
4. तौहीदे इबादत: यानी इबादत के लायक़ सिर्फ़ ख़ुदा वंदे आलम है।
सवालात
1. तौहीद की क़िस्मों को मुख़्तसर वज़ाहत के साथ बयान करें?
2. तौहीदे अफ़आल की वजह से यह कहना सही है कि अगर इंसान कोई गुनाह करे तो वह ख़ुदा ने किया है? क्यो?