अक़ायदे नूर
 

पाँचवा सबक़

दुनिया का हैरत अंगेज़ निज़ाम और ख़ुदा की मारेफ़त
हमारी निगाह जब किसी मुनज़्ज़म और सजी हुई चीज़ पर पड़ती है तो फ़ौरन हमारे ज़ेहन में यह ख़्याल आता है कि ज़रुर कोई न कोई इस का नज़्म देने वाला है जिसने इस चीज़ को नज़्म दिया है। इसलिये कि हम यह जानते हैं कि ख़ुद ब ख़ुद या किसी हादसे (blast) के ज़रिये वुजूद में आने वाली चीज़ सजी हुई नही होती बल्कि वह हर तरह के नज़्म से दूर और बिखरी हुई होती है।

जब हम कूलर, टी वी, रेडियों, गाड़ी, फ़ोन, इंटरनेट और दीगर मशीनों के नज़्म पर नज़र डालते हैं तो क्या इस बात के क़ायल होते हैं कि यह तमाम चीज़ें और उनका नज़्म ख़ुद ब ख़ुद वुजूद में आ गया है? नही, हरगिज़ नही बल्कि अगर कोई ऐसा कह भी दे तो दूसरे उसका मज़ाक़ उड़ायेगें, तो जब आप उन छोटी छोटी चीज़ों के बारे में यक़ीन नही कर सकते कि उन का नज़्म बग़ैर किसी नज़्म देने वाले के वुजूद में आया है तो क्या आप इस बात पर यक़ीन कर सकते हैं कि यह हैरत अँगेज़ दुनिया और उसका अजीब व ग़रीब निज़ाम बिना किसी नज़्म देने वाले के ख़ुद ब ख़ुद वुजूद में आ गया है?।

दानिशवर हज़रात इसी नज़्म में ग़ौर व फ़िक्र करने के बाद हैरत अंगेज़ चीज़ों को ईजाद करते हैं, किसान भी इसी नज़्म की वजह से खेती की हरियाली का इंतेज़ार करता है, इसी नज़्म की बुनियाद पर बारिश के बारे में भविष्यवाणी की जाती है, न्यूटरोन, प्रोटोन और इलेक्टरोन भी इसी नज़्म की वजह से अपनी धूरी पर धूम रहे हैं, दिन व रात इसी नज़्म की नतीजा हैं, चमकते तारे, हरे भरे पेड़, चाँद, सूरज, दरिया....... सब के सब इसी नज़्म की वजह से मौजूद हैं, गोया दुनिया का पूरा निज़ाम एक ख़ास नज़्म के तहत है और अगर यह नज़्म न हो तो फिर कुछ न हो।

यही वजह है कि काफ़िर और नास्तिक दानिशवर भी जैसे जैसे दुनिया के नज़्म के सिलसिले में तहक़ीक़ात करते जाते हैं उनके दिल में ईमान की किरण फूटती रहती है और वह लोग वुजूदे ख़ुदा के क़ायल होते जाते हैं।

लापस नुजूमी (astronomer) कहता है कि मुम्किन नही है कि मंज़ूम ए शम्सी के बारे में यह कहा जाये कि यह ख़ुद ब ख़ुद blast के ज़रिये वुजूद में आया है, बल्कि ऐतेराफ़ करना पड़ेगा कि एक ज़ात (ख़ुदा) है जिसने यह नज़्म पैदा किया है।[1]

न्यूटन कहता है कि कान की बनावट से हमें समझ में आता है कि उसका बनाने वाला आवाज़ के तमाम क़वानीन से आशना था और आँख को देख कर मालूम होता है कि उसे पैदा करने वाला नूर और रौशनी के पेचीदा और मुश्किल क़ानूनों को जानता था।[2]

दुनिया के इस हैरत अंगेज़ नज़्म के सिलसिले में क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

.... وخلق کل شی فقدره تقدیرا

(ख़ुदा वंदे आलम) ने हर चीज़ को पैदा किया और उस के लिये एक ख़ास नज़्म और अंदाज़ा बनाया है। (सूरह फ़ुरक़ान आयत 2)

ख़ुलासा

- जब हम किसी सजी हुई चीज़ को देखते हैं तो फ़ौरन समझ जाते हैं कि ज़रुर कोई न कोई है जिसने उसे सजाया है। लिहाज़ा यह पूरी दुनिया और उसका निज़ाम हैरत अंगेज़ नज़्म बग़ैर किसी नज़्म देने वाले या सजाने वाले के वुजूद में नही आ सकता और वह नज़्म देने वाला ख़ुदा वंदे आलम है।

- बड़े बड़े दानिशवरों ने भी अपनी तहक़ीक़ात के बाद ख़ुदा के वुजूद का ऐतेराफ़ किया है। न्यूटन कहता है कि कान की बनावट से समझ में आता है कि उस का बनाने वाला आवाज़ के तमाम क़वानीन से आशना था और आँख को देख कर मालूम होता है कि उसे पैदा करने वाला नूर और रौशनी के पेचीदा और मुश्किल क़वानीन से वाकि़फ़ था।
सवालात
1. यह दुनिया और उसका हैरत अंगेज़ निज़ाम ख़ुद ब ख़ुद वुजूद में क्यों नही आ सकता?
2. लापस नुजूमी (astronomer) ने इस दुनिया के नज़्म के बारे में क्या कहा है?
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[1]. सुख़नी दर बारए ख़ुदा पेज 54

[2]. आफ़रिदगारे जहान पेज 225