अक़ायदे नूर
 

चौथा सबक़

ख़ुदा की मारेफ़त फितरी है
ख़ुदा की मारेफ़त हासिल करना एक फ़ितरी अम्र है जो हर इंसान के अंदर पाया जाता है। फ़ितरी होने का मतलब यह है कि इंसान को यह सिखाया नही जाता कि कोई ख़ुदा है जिसने इस दुनिया को बनाया है बल्कि अपने जम़ीर और फ़ितरत की तरफ़ मुतवज्जे होते ही वह यह जान लेता है कि किसी आलिम व क़ादिर ज़ात ने इस दुनिया को पैदा किया है, उस का दिल ख़ुदा से आशना होता है और उस की रूह की गहराईयों से मारेफ़ते ख़ुदा की आवाज़ें सुनाई देती हैं।

उलामा और दानिशवरों ने अपने इल्मी तजरुबों से यह साबित किया है कि अगर किसी बच्चे को पैदा होने के बाद किसी ऐसे दूर दराज़ इलाक़े में छोड़ दिया जाये जहाँ इंसानों का साया भी न पाया जाता हो, किसी तरह का कोई दीन या मज़हब मौजूद न हो तो जब यह बच्चा समझदार होगा तो ख़ुद ब ख़ुद वह उस ज़ात की तरफ़ मायल हो जायेगा जिसने इस दुनिया को पैदा किया है, हाँ यह मुमकिन है कि वह पहचान में ग़लती करते हुए किसी जानवर या पेड़ पौधे या दूसरी चीज़ों को ख़ुदा समझ बैठे लेकिन उस के इस काम से यह बात ज़रुर साबित हो जाता है कि ख़ुदा की मारेफ़त हासिल करना फ़ितरी है। इंसान की यह पाक फ़ितरत और वक़्त और ज़्यादा जलवा नुमा होती है जब वह किसी बला या मुसीबत में फंस जाता है और निजात के सारे रास्ते बंद पाता है, ऐसी सूरत में उसे अपने अंदर एक आवाज़ सुनाई देती है कि अब भी एक ज़ात ऐसी है जो उसे इस मुसीबत से निजात दे सकती है। मिसाल के तौर पर कोई ऐसा शख़्स जिस के बहुत से क़वी और ख़तरनाक जानी दुश्मन हैं जो उसे क़त्ल करना चाहते हैं उन्होने अपने हथियारों को इस लिये तैयार कर रखा है कि उस के बदन को टुकड़े टुकड़े कर डालें। वह नही जानता कि वह दुश्मनों के हाथ लग जाये और वह उसे क़त्ल कर दें, ख़ौफ़ से न रातों को नींद आती है न दिन का चैन हासिल है और निजात की उम्मीदें हर तरफ़ से ख़त्म हो गई हैं, ऐसी सूरत में अगर कोई उस से सवाल करे कि क्या कोई निजात का रास्ता है? तो वह जवाब देगा कि अब ख़ुदा ही बचा सकता है।

एक शख़्स ने इमाम जाफ़र सादिक (अ) से ख़ुदा के वुजूद के बारे में सवाल किया तो आप ने फ़रमाया: कभी कश्ती का सफ़र किया है। उसने जवाब दिया जी हाँ, फ़रमाया: क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुम्हारी नाव डूबने लगी हो, तुम्हे तैरना न आता हो और बचने का कोई रास्ता न हो? जवाब दिया: जी हाँ। फ़रमाया क्या तुम्हारा दिल उस वक़्त किसी ऐसी चीज़ की तरफ़ मुतवज्जे था जो उस वक़्त भी तुम्हे उस ख़ौफ़नाक मन्ज़र से निजात दे सके? जवाब दिया जी हाँ फ़रमाया: वह वही ख़ुदा है जो उस वक़्त भी निजात दे सकता है जब कोई निजात देने वाला न हो और वही है जो उस वक़्त भी मदद कर सकता है जब कोई मददगार न हो।[1] उसी पाक फ़ितरत की तरफ़ इशारा करते हुए ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में फ़रमाता है:

فطرة الله التی فطر الناس علیها لا تبدیل لخلق الله

यह दीन वह फ़ितरते इलाही है जिस पर उसने इंसानो को पैदा किया है, ख़िलक़ते ख़ुदा में कोई तब्दीली नही आ सकती। (सूरए रूम आयत 30)

ख़ुलासा

-ख़ुदा की मारेफ़त के फ़ितरी होने के मतलब यह है कि इंसानों को यह सिखाया नही जा सकता कि इस दुनिया का कोई पैदा करने वाला मौजूद है बल्कि उस की रूह की गहराईयों से मारेफ़ते ख़ुदा की आवाज़ सुनाई देती है।

-इंसान की यह पाक फ़ितरत उस वक़्त और जलवा नुमा होती है जब वह किसी बला मुसीबत में फंस जाता है और अपने लिये निजात के सारे रास्ते बंद पाता है, ऐसी सूरत में उस की ज़मीर कहता है कि अब भी कोई ज़ात है जो उसे बचा सकती है और वह ख़ुदा है।
सवालात

1. मारेफ़ते ख़ुदा के फ़ितरी होने का क्या मतलब है?
2. इंसान की यह पाक फ़ितरत किस वक़्त ज़्यादा जलवा नुमा होती है?
3. वुजूदे ख़ुदा के बारे में सवाल करने वाले शख़्स के जवाब में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) ने क्या फ़रमाया वाक़ेया नक़्ल कीजिये?
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[1].हक़्क़ुल यक़ीन, शुब्बर, पेज 8