अक़ायदे नूर
 


फ़ेहरिस्त


मुक़द्दमा ......................................................................................

पहला सबक़: दीन की ज़रुरत और इस्लाम की हक़्क़ानीयत......................

दूसरा सबक़: दीन की हक़ीक़त...........................................................

तीसरा सबक़: उसूले दीन में तक़लीद करना सही नही है..........................

चौथा सबक़: ख़ुदा की मारेफ़त फ़ितरी है.............................................

पाँचवा सबक़: दुनिया का हैरत अंगेज़ निज़ाम और ख़ुदा की मारेफ़त...............

छटा सबक़: तौहीद और उस की दलीलें................................................

सातवाँ सबक़: तौहीद की क़िस्में.........................................................

आठवाँ सबक़: तौहीद के फ़ायदे...........................................................

नवाँ सबक़: सिफ़ाते सुबूतिया..............................................................

दसवाँ सबक़: सिफ़ाते सल्बिया............................................................

गयारहवाँ सबक़: अद्ल......................................................................

बारहवाँ सबक़: नबुव्वत......................................................................

तेरहवाँ सबक़: नबियों का मासूम होना...................................................

चौदहवाँ सबक़: नबी को पहचानने के रास्ते.............................................

पन्दरहवाँ सबक़: पैग़म्बरे इस्लाम (स) का सबसे बड़ा मोजिज़ा....................

सोलहवाँ सबक़: पैग़म्बरे इस्लाम (स) आख़िरी नबी..............

सतरहवाँ सबक़: इमामत और इमाम की ज़रुरत

अठ्ठारवाँ सबक़: इमाम की सिफ़ात

उन्नीसवाँ सबक़: हमारे इमाम

बीसवाँ सबक़: क़यामत

इक्कीसवाँ सबक़: क़यामत जिस्मानी है या रुहानी

बाईसवाँ सबक़: रजअत (पुर्नजन्म)

तेईसवाँ सबक़: बरज़ख़

चौबीसवाँ सबक़: जन्नत

पच्चीसवाँ सबक़: जहन्नम



मुक़द्दमा




अल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस सलातो वस सलामो अला ख़ैरे ख़लक़िहि मुहम्मद व आलिहित ताहेरीन ला सिय्यमा बक़िय्यतिल्लाहि फ़िल अरज़ीन अल्लाहुम्मज अलना मिन आवानिहि व अंसारिहि

इंसान तीन चीज़ों का मजमूआ है: अफ़कार, सिफ़ात और किरदार। अगर यह तीनों चीज़ें सही जेहत और सही रास्ते पर हों तो इँसान अपने हदफ़ यानी मंज़िल कमाल तक पहुचता है अब अगर कोई दीन इंसान को ख़ुशबख़्त बनाना चाहता है तो उसे ऊपर बयान की गई तीनों चीज़ों का अहल होना ज़रूरी है। दीने इस्लाम तन्हा वह दीन है जिसने तीनों जिहात पर ख़ुसूसी तवज्जो दी है और इस सिलसिले में अहकाम व दस्तूरात बयान कियह हैं, उन तीनों में से इल्मे अख़लाक़ इंसानी सिफ़ात को सँवारता है, फ़ुरु ए दीन उस के रफ़तार व किरदार को बनाते हैं, उसूले दीन इंसान के अफ़कार व नज़रियात को जेहत देते हैं।

नूर इस्लामिक मिशन, तबलीग़े दीन के हवाले से हकी़क़ी इस्लाम को पहचनवाने और अफ़राद की सही इस्लामी तरबीयत के लियह तीनों जिहात पर काम कर रहा है। इसी सिलसिले की एक कड़ी “अक़ायदे नूर” बाज़ अहम और ज़रूरी मौज़ूआत पर पाठ (सबक़) की सूरत में आप के हाथों में है।

इस मजमूए की बाज़ ख़ुसूसियात

1. मतालिब को कम और आसान ज़बान में पेश किया गया है ता कि उस्ताद की मदद के बग़ैर भी समझा जा सके।
2. आम फ़हम बनाने के लियह सख़्त इस्तेलाहों और पेचीदा दलीलों वग़ैरह से परहेज़ किया गया है।
3. हर सबक़ के आख़िर में ख़ुलासा और सवालात भी पेश किये गये हैं ता कि पढ़ने वाला नतीजे की तरफ़ भी मुतवज्जे हो सके और सबक़ की मश्क़ भी हो जाये।

ख़ुदा से दुआ है कि हमें हक़ीक़ी दीन को समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये।



पहला सबक़


दीन की ज़रुरत और इस्लाम की हक़्क़ानीयत

दीन

दीन लुग़त में इताअत और जज़ा वग़ैरह के मअना में है और इस्तेलाह में ऐसे अमली और अख़लाक़ी अहकाम व अक़ायद के मजमूए को कहते हैं जिसे ख़ुदा ने नबियों के ज़रिये इंसान की दुनियावी और आख़िरत की हिदायत व सआदत के लियह नाज़िल फ़रमाया है, उन अक़ायद को जान कर और उन अहकाम पर अमल करके इंसान दुनिया व आख़िरत में सआदत मंदी हासिल कर सकता है। जो इल्मे वुजूदे खु़दा, सिफ़ाते सुबूतिया व सल्बिया, अद्ल, नबुव्वत, इमामत और क़यामत के बारे में बहस करता है उसे उसूले दीन कहते हैं।

दीन की ज़रुरत

दीन हर इंसान के लियह ज़रुरी है इस लियह कि इँसान को फ़ुज़ूल पैदा नही किया गया है बल्कि उस की ज़िन्दगी के कुछ उसूल होते है जिन पर अमल करके वह अपनी ज़िन्दगी में कमाल पैदा कर सकता है और सआदत की मंज़िलों तक पहुच सकता है लेकिन सवाल यह है कि उन उसूल व क़वानीन को कौन मुअय्यन करे? इस सवाल के जवाब में तीन राहें मौजूद हैं जिन में से सिर्फ़ एक राह सही है:

पहला रास्ता

हर इंसान अपनी ख़्वाहिश के मुताबिक़ अपने लिये क़ानून बनाए, यह रास्ता ग़लत है इस लिये कि इंसान का इल्म महदूद है जिसके नतीजे में वह हमेशा ग़लतियाँ करता रहता है और उस की नफ़सानी ख़्वाहिशात का तूफ़ान किसी वक़्त भी उस को ग़र्क़ कर सकता है लिहाज़ा आप ख़ुद सोचें कि क्या इंसान अपनी नाक़िस और महदूद फ़िक्र के ज़रिये अपने लियह उसूल व क़वानीन बना सकता है।

दूसरा रास्ता

इंसान लोगों की फ़िक्रों और सलीक़ों के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी के लियह क़ानून मुअय्यन करे, यह रास्ता भी ग़लत है इस लिये कि लोगों की तादाद भी ज़्यादा है और उन की ख़्वाहिशें, फ़िक्रें और सलीक़ें भी मुख़्तलिफ़ हैं तो इंसान किस किस की बातों पर अमल करेगा और दूसरी बात यह है कि दूसरे लोग भी तो इंसान ही हैं इस लिये उन में भी ग़लतियों का बहुत ज़्यादा इम्कान पाया जाता है लिहाज़ा जब लोग अपने लिये भी क़ानून नही बना सकते तो फिर किसी दूसरे के लिये किस तरह क़ानून बना सकते है?

तीसरा रास्ता

इंसान ख़ुद को किसी ऐसी ज़ात के हवाले कर दे जिस ने उसको बनाया है और जो उसके माज़ी, हाल और मुस्तक़िबल से आगाह है यानी इंसान अपनी ज़िन्दगी की तरीक़ा और जीने का सलीक़ा उसी से हासिल करे जिसने उसे पैदा किया है।

यह तीसरा रास्ता ही सही है इस लिये कि जिस तरह हम अपनी गाड़ी को मैकेनिक और अपने जिस्म को बीमारी के वक़्त डाक्टर के हवाले कर देते हैं क्योकि वह इस सिलसिले में हम से ज़्यादा आगाह है उसी तरह हमें अपनी ज़िन्दगी के उसूल व क़वानीन को मुअय्यन करने के लियह अपने आप को उस ज़ात के हवाले कर देना चाहिये जो हर चीज़ का जानने वाला है। वह ज़ात सिर्फ़ ख़ुदा वंदे आलम की ज़ात है जिसने इस्लाम की शक्ल में इंसान की इंफ़ेरादी और समाजी ज़िन्दगी के लियह उसूल व क़वानीन नाज़िल फ़रमाए हैं।

इस्लाम की हक़्क़ानीयत

दीने इस्लाम चूँकि आख़िरी दीन है इसी लियह उसे ख़ुदा ने कामिल बनाया है और उसी मुक़द्दस दीन के आने के बाद दूसरे आसमानी दीन ख़त्म कर दियह गयह क्योकि जब कामिल आ जाये तो नाक़िस की कोई ज़रूरत बाक़ी नही रह जाती, दीने इस्लाम को ख़ुदा वंदे आलम ने हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वा आलिहि वसल्लम के ज़रिये इंसान की हिदायत के लियह नाज़िल फ़रमाया है, सआदत का यह चिराग़ दुनिया वालों के लियह उस वक़्त रौशन हुआ जब इँसान और इंसानियत को बुराईयों और ख़राबियों के अँधेरों ने घेर रखा था।

खु़दा की तरफ़ से भेजा गया यह मुक़द्दस दीन ऐसा है कि हर फ़र्द और हर तबक़ा उस के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार कर दुनिया व आख़िरत की बेहतरीन ख़ुशियाँ हासिल कर सकता है।

बुढ़े व बच्चे, पढ़े लिखे व अनपढ़, मर्द व औरत, अमीर व ग़रीब सब के सब मसावी तौर पर दीने इस्लाम से फ़ायदा उठा सकते हैं इस लिये कि इस्लाम दीने फ़ितरत है और फ़ितरत इँसानों के तमाम तर इख़्तिलाफ़ात के बावजूद सब के अंदर एक जैसी होती है।

नतीजा यह हुआ कि इस्लाम एक ऐसा दीन है जो इँसानों की बुनियादी और फ़ितरी मुश्किलों को हल करता है लिहाज़ा यह हमेशा ज़िन्दा रहने वाला दीन है। यह बात भी वाज़ेह है कि इस्लाम आसान दीन है और इँसान पर सख़्ती नही करता, ख़ुदा वंदे आलम ने इस दीन के बुनियादी उसूल व क़वायद अपनी किताब क़ुरआने मजीद में बयान फ़रमाया है जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) पर नाज़िल हुई है।

ख़ुलासा

-लुग़त में दीन, इताअत और जज़ा के मअना में है और इस्तेलाह में उन अमली व अख़लाक़ी अहकाम को दीन कहते हैं जिसे ख़ुदा वंद ने नबियों के ज़रिये नाज़िल फ़रमाया है।

-हर इँसान के लियह दीन ज़रुरी है क्योकि वह दीन के बग़ैर अपनी ज़िन्दगी में सआदत हासिल नही कर सकता।

-सिर्फ़ ख़ुदा, इँसान की ज़िन्दगी के लियह क़ानून बना सकता है क्योकि वह हर चीज़ का जानने वाला है।

-दीने इस्लाम, आख़िरी और कामिल आसमानी दीन है जिसे हमारे नबी हज़रत मुहम्मद (स) ले कर आयह हैं और उस के बुनियादी क़वानीन क़ुरआने मजीद में मौजूद हैं।

-इस्लाम दीने फ़ितरत है लिहाज़ा यह दीन बड़े छोटे, पढ़े लिखे, ज़ाहिल, मर्द व औरत, गोरे काले, अमीर व ग़रीब सब के लियह सआदत बख़्श है।

सवालात
1. इस्तेलाह में दीन के क्या मअना है?
2. दीन का होना क्यों ज़रुरी है?
3. इंसान अपनी ज़िन्दगी के लियह क़ानून क्यो नही बना सकता है?
4. क्यो सिर्फ़ ख़ुदा ही इँसान की ज़िन्दगी के लिये उसूल व क़वानीन बना सकता है?
5. क्या इस्लाम हर फ़र्द और तबक़े के लियह सआदत बख़्श है? क्यों?