ज्ञान का सही मार्ग
 

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ईश्वर इस ब्रह्मांड का कारक है, इस बात का अर्थ यह है कि वही इसका रचयिता और विशेष कारक है।



इस विषय को समझने के लिए कारकों के प्रकारों का उल्लेख आवश्यक है जो अगली चर्चा में किया जाएगा। (जारी है)



सृष्टि ईश्वर और धर्म-१५ एक वस्तु के कई कारक



हमें अच्छी तरह से पता है कि पेड़ पौधों को उगने के लिए बीज और अनुकूल मिट्टी तथा जलवायु की आवश्यकता होती है किंतु



इन सब वस्तुओं के साथ ही एक भौतिक कारक जैसे मनुष्य की भी आवश्यकता होती है जो इस बीज को बोए और पौधा उगने के बाद उसकी सींचाई इत्यादि करे यह सारी चीज़े मिलकर



एक पौधे के लिए कारक समझी जाती हैं। तो स्पष्ट हो गया कि एक प्रक्रिया अथवा वस्तु के कई कारक हो सकते हैं और इन कारकों को विभिन्न आयामों से कई प्रकारों में बांटा जा सकता है।



उदाहरण स्वरूप वह कारक जो परिणाम के अस्तित्व के लिए अनिवार्य होते हैं उन्हें वास्तविक कारक कहा जा सकता है जैसे बीज बोना या अनुकूल मिट्टी



इत्यादि और वह कारक जो परिणाम को बाक़ी रखने के लिए होते हैं उन्हें रखवाले कारक का नाम दिया जा सकता है



जैसे उचित जलवायु आदि और इसी प्रकार वैकल्पिक कारकों और अन्य कारकों को सीमित कारकों का नाम दिया जा सकता है किंतु



कारक का एक अन्य प्रकार भी है जो पेड़ और पौधों के उगने लिए हम ने जिन कारकों का वर्णन किया हैं उन सब से भिन्न होता है और



यदि हम कारक के इस प्रकार का उदाहरण देना चाहिए तो उस का उदाहरण आत्मा और उसकी कुछ दशाओं में पाया जाता है ।



उदाहरण स्वरूप कोई मनुष्य अपने मन में एक काल्पनिक चित्र बनाए या फिर कोई काम करने का इरादा करे और उसके लिए योजना बनाए तो यह चित्र ,



इरादा और योजना सब कुछ उसके मन की कल्पना होती है और उस का अस्तित्व आत्मा व मन के अस्तित्व पर निर्भर होता है



अर्थात यदि मन व मस्तिष्क नहीं होगा तो कल्पना की कल्पना भी संभव नहीं है न ही योजना बनाई जा सकती है और न ही कुछ सोचा जा सकता है।



तो इस प्रकार से काल्पनिक चित्रों , योनजाओं और इरादों का कारक मन व मस्तिष्क होता है और इरादे व योजनाएं परिणाम होती हैं किंतु यह परिणाम एसे होते हैं



जो अपने कारक अर्थात मन व मस्तिष्क से किसी भी दशा में अलग नहीं हो सकते अर्थात मन व आत्मा के बिना किसी संकल्प, योजना और कल्पना का अस्तित्व संभव नहीं है।



अब प्रश्न यह उठता है कि संकल्प और इरादे का कारक जिस प्रकार मन व आत्मा होती है क्या ईश्वर भी उसी प्रकार इस सृष्टि का कारक है



इस प्रश्न का उत्तर है नहीं ईश्वर का कारक होना , कल्पना व इरादे के कारक अर्थात मन व मस्तिष्क से भिन्न बल्कि उन की तुलना में अत्याधिक परिपूर्ण और श्रेष्ठ है



और इसका उदाहरण किसी अन्य कारक में नहीं मिल सकता क्योंकि ईश्वर ऐसा कारक है जो आवश्यकता मुक्त है



और उसने इस सृष्टि की रचना अपनी किसी आवश्यकता के लिए नहीं की है बल्कि यह सृष्टि ऐसी रचना है जिसका लाभ रचनाकार को नहीं स्वंय रचना को पहुंचता है।