ज्ञान का सही मार्ग
 

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अनिवार्य अस्तित्व या ईश्वर के सदा से और सदा तक होने पर विश्वास आवश्यक है।



अर्थात अतीत में कभी भी ऐसा कोई क्षण नहीं था जब अनिवार्य अस्तित्व अर्थात ईश्वर उपस्थित नहीं था और दूसरे यह कि वह सदैव रहेगा अर्थात भविष्य में भी कोई ऐसा क्षण नहीं आएगा



जब वह न रहे। (जारी है)



सृष्टि ईश्वर और धर्म-14 निर्भर और आत्म निर्भर कारक



यदि यह सोच लिया जाए कि अनिवार्य अस्तित्व या आत्मभू अस्तित्व के सभी अंश हर काल में उपस्थित नहीं होते तो यह सोचना सही नहीं होगा क्योंकि जिस वस्तु का कल्पना



के स्तर पर ही सही विभाजन किया जा सके वो विभाज्य होती है भले ही व्यवहारिक रूप से ऐसा करना संभव न हो। जिसका विभाजन संभव है उसका अंत व विलुप्ति भी संभव है।



जैसे एक मीटर लम्बी रेखा को आधे-आधे मीटर की दो रेखाओं में काल्पनिक रूप से विभाजित कर दिया जाए तो एक मीटर की रेखा का अस्तित्व ही शेष नहीं रह जाएगा और हम पहले ही



कह चुके हैं कि अनिवार्य अस्तित्व का कोई अंत नहीं होता।



जो भी वस्तु अंशों से मिलकर बनी है वह पदार्थ है, उसके यह अंश चाहे एक साथ उपस्थित हों या उनमें कुछ भविष्य में अस्तित्व में आने वाले हों।



इससे यह पता चलता है कि पदार्थ एवं भौतिकता के दायरे में आने वाला कोई भी अस्तित्व आत्मभू या अनिवार्य अस्तित्व नहीं हो सकता।



दूसरे शब्दों में, ईश्वर का पदार्थ व आकार जैसी सीमितताओं से श्रेष्ठ होना सिद्ध होता है।



इससे यह भी स्पष्ट होता है कि महान ईश्वर आंखों से देखे जाने योग्य और इंद्रियों से महसूस किए जाने योग्य नहीं है क्योंकि महसूस किया जाना पदार्थ और शरीर की विशेषता है।