ज्ञान का सही मार्ग
 

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पिछले तर्क से यह समझ में आता है कि अनिवार्य अस्तित्व को, कारक की आवश्यकता नहीं होती और वह समस्त ब्रह्मांड का मूल कारक है।



दूसरे शब्दों में, दो गुण अनिवार्य अस्तित्व के लिए सिद्ध हुए। प्रथम, उसका दूसरे समस्त अस्तित्वों से आवश्यकता मुक्त होना,



क्योंकि यदि उसे किसी अन्य अस्तित्व की थोड़ी सी भी आवश्यकता होगी तो वह अन्य अस्तित्व उसका कारक हो जाएगा।



अब हम इन दोनों निष्कर्षों को दृष्टि में रखते हए उनके लिए आवश्यक वस्तुओं पर चर्चा करेंगे और ईश्वर के कुछ विशेष गुणों की



उपस्थिति और कुछ अवगुणों से उसकी दूरी के बारे में चर्चा करेंगे।



यदि कोई अस्तित्व किसी दूसरे अस्तित्व का परिणाम हो और उसे किसी अन्य अस्तित्व की आवश्यकता हो तो उसका अस्तित्व उस दूसरे



अस्तित्व पर निर्भर होगा और उसके कारक के न होने की स्थिति में उसका अस्तित्व नहीं हो सकता और किसी भी कालखंड में किसी अस्तित्व का न होना होना इस बात का चिन्ह है कि



उस अस्तित्व को दूसरे की आवश्यकता है और उसका अस्तित्व संभव व निर्भर अस्तित्व के दायरे में आता है। चूंकि अनिवार्य एवं स्वयंभू अस्तित्व स्वतः अस्तित्व में आता है



और उसे किसी अन्य कारक व अस्तित्व की आवश्यकता भी नहीं होती इसलिए वह सदैव रहेगा।



इस प्रकार अनिवार्य अस्तित्व के लिए दो अन्य गुण सिद्ध हुए। एक उसका अनन्त होना अर्थात अतीत में कभी भी ऐसा कोई क्षण नहीं था



जब अनिवार्य अस्तित्व अर्थात ईश्वर उपस्थित नहीं था और दूसरा यह गुण कि वह सदैव रहेगा अर्थात भविष्य में कोई भी क्षण ऐसा नहीं आएगा जब वह न रहे।



इन दोनों गुणों को मिलाकर ईश्वर को सदा से सदा तक रहने वाला अस्तित्व कहा जाता है और इस सृष्टि में ऐसा केवल ईश्वर ही हो सकता है।



इस आधार पर जो भी अस्तित्व अतीत में न रहा हो या जिसके बारे में भविष्य में कभी विलुप्त हो जाना संभव हो



वह अनिवार्य अस्तित्व कदापि नहीं हो सकता और इस प्रकार के समस्त भौतिक अस्तित्वों का अनिवार्य अस्तित्व न होना सिद्ध होता है।



अनिवार्य अस्तित्व में जिस प्रकार कुछ विशेषताओं का होना आवश्यक है उसी प्रकार कुछ ऐसे अवगुण हैं जिनका ईश्वर में न होना आवश्यक है।



अनिवार्य अस्तित्व के लिए एक अन्य आवश्यक विशेषता यह है कि वह मिश्रण विलेयन नहीं हो सकता।



क्योंकि प्रत्येक मिश्रण को अपने अंशों की आवश्यकता होती है और अनिवार्य अस्तित्व अर्थात ईश्वर हर प्रकार की आवश्यकता से मुक्त है।



इस विषय का और विवरण अगली चर्चा में पढ़ेंगे।



इस चर्चा के मुख्य बिंदु थेः



ईश्वर का अनिवार्य अस्तित्व होना ही उसकी पहचान के लिए पर्याप्त नहीं है बल्कि एक ओर ईश्वर में कुछ अवगुणों का न होना भी सिद्ध करना आवश्यक है ताकि



यह पता चल जाए कि सृष्टि का रचयिता अपनी सृष्टि में पाई जाने वाली कमियों से पवित्र है और वह अपनी बनाम हुई किसी भी वस्तु के समान नहीं है



और दूसरी ओर उसमें कुछ गुणों की उपस्थिति भी सिद्ध की जानी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि वह उपासना योग्य है।