ज्ञान का सही मार्ग
 

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इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया कि ईश्वर को अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य कारक अस्तित्व की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आवश्यकता पड़ी तो वह आवश्यकता



मुक्त नहीं रह जाएगा जबकि ईश्वर आवश्यकता मुक्त है।



चर्चा के मूल बिंदु संक्षेप में इस प्रकार हैं कि अस्तित्व तीन प्रकार के होते हैं, अनिवार्य, संभव और असंभव। अनिवार्य अस्तिव को अपने के लिए किसी कारक की आवश्यकता नहीं होती



जबकि संभव अर्थात निर्भर अस्तित्व को होती है।



इस बात के दृष्टिगत कि परिणाम का अस्तित्व कारक के अस्तित्व पर निर्भर होता है, यदि हम यह मान लें कि यह स्थिति सारे अस्तित्वों के



लिए हो तो फिर कभी भी किसी भी अस्तित्व को सिद्ध करना संभव नहीं होगा क्योंकि ऐसे परिणामों के एक समूह की कल्पना जो एक दूसरे के कारक ही हों बौद्धिक दृष्टि से संभव ही नहीं है।



ब्रह्मांड में इतने सारे अस्तित्वों की उपस्थिति इस बात को सिद्ध करती है कि एक ऐसा अस्तित्व भी है जिसे अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य कारक अस्तित्व की आवश्यकता नहीं है। (जारी है)



सृष्टि ईश्वर और धर्म-13 ईश्वरीय गुण



पिछली चर्चा में यह बताया गया कि बहुत से दार्शनिक तर्कों का उद्देश्य अनिवार्य अस्तित्व को सिद्ध करना है



और कुछ अन्य तर्कों द्वारा उस अनिवार्य अस्तित्व के लिए कुछ गुण आवश्यक और कुछ त्रुटियों से उसकी पवित्रता को सिद्ध किया जाता है जिसके



बाद ईश्वर अपने विशेष गुणों के साथ पहचाना जाता है। क्योंकि केवल उसका अनिवार्य अस्तित्व होना ही ईश्वर की पहचान के लिए पर्याप्त नहीं है।



इसलिए कि यह भी संभव है कि कोई यह सोचे कि पदार्थ और ऊर्जा भी अनिवार्य अस्तित्व हो सकते हैं।



इस लिए ईश्वर में एक ओर तो कुछ अवगुणों का न होना सिद्ध करना आवश्यक है ताकि यह पता चले कि अनिवार्य अस्तित्व अथवा सृष्टि का रचयिता



अपनी सृष्टि में पाई जाने वाली कमियों से दूर है और वह अपनी बनाई हुई किसी भी वस्तु के समान नहीं है



और दूसरी ओर उसमें कुछ गुणों की उपस्थिति का सिद्ध होना भी आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि वह उपासना योगय है



और इसके साथ ही ईश्वरीय दूत प्रलय आदि जैसी दूसरी आस्थाओं की भूमिका भी प्रशस्त हो सके।