ज्ञान का सही मार्ग
 

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अब इतनी सारी भूमिकाओं के बाद एक बार फिर हम ईश्वर के अनिवार्य अस्तित्व के लिए अपने तर्क पर विचार करेंगे।



जिस वस्तु को भी अस्तित्व का नाम दिया जा सकता हो, उसके लिए दो ही दशाओं की कल्पना की जा सकती है।



या अस्तित्व उसके लिए आवश्यक व अनिवार्य नहीं होगा अर्थात वह हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता। ऐसे अस्तित्व को संभव व निर्भर अस्तित्व कहा जाता है।



विदित है कि किसी वस्तु का होना असंभव हो तो फिर उसके अस्तित्व का प्रश्न ही नहीं उठता और उसे किसी भी स्थिति में अस्तित्व का नाम नहीं दिया जा सकता।



इस लिए हर उपस्थित वस्तु या तो अनिवार्य अस्तित्व है, या फिर संभव अस्तित्व। संभव व निर्भर अस्तित्व के अर्थ पर थोड़ा सा विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि



जिस वस्तु पर भी यह शब्द चरितार्थ होता है उसके लिए निश्चित रूप से किसी कारक की आवश्यकता होगी क्योंकि यदि कोई



अस्तित्व स्वतः उपस्थित होने में सक्षम न हो तो फिर अनिवार्य रूप से उसे किसी कारक की आवश्यकता होगी। कारक व परिणाम के सिद्धांत का मूल अर्थ भी यही है कि



हर संभव अस्तित्व अर्थात जो स्वयं अस्तित्व में आने में सक्षम न हो उसे किसी कारक की आवश्यकता होती है न कि हर अस्तित्व को कारक की आवश्यकता होती है।



या फिर यह भी कहना सही नहीं होगा कि ईश्वर पर विश्वास कारक व परिणाम के सिद्धांत को तोड़ने के समान है।



दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि यदि प्रत्येक अस्तित्व संभव अस्तित्व का स्वामी हो और सब को किसी कारक की आवश्यकता हो तो किसी भी अस्तित्व को सिद्ध करना संभव नहीं होगा।



ठीक उसी प्रकार जैसे कुछ लोगों का एक समूह हो और उस समूह का हर व्यक्ति कुछ करने के लिए दूसरे की प्रतीक्षा करे तो निश्चित रूप से सारे के सारे लोग प्रतीक्षा ही करते रह जाएंगे।



इस प्रकार इतने सारे अस्तित्वों की उपस्थिति इस बात को सिद्ध करती है कि एक ऐसा अस्तित्व भी है जिसे अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य कारक की आवश्यकता नहीं है



और उसका अस्तित्व अनिवार्य है, अर्थात वह वाजिबुल वुजूद है।