ज्ञान का सही मार्ग
 

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यहाँ तक तो आप कारक और परिणाम के आशय से परिचित हुए। अब यहाँ से आगे हमें इस बात को स्पष्ट करना है कि प्रत्येक संभव अस्तित्व के लिए एक कारक की आवश्यकता होती है।



इस बात के दृष्टिगत कि संभव अस्तित्व स्वतः अस्तित्व में नहीं आता बल्कि उसका अस्तित्व किसी एक अस्तित्व या कई अस्तित्वों पर निर्भर होता है



क्योंकि यह बात स्पष्ट है कि जो भी गुण किसी विषय के लिए दृष्टि में रखा जाएगा तो उसका प्रमाण या तो वह स्वयं होगा या फिर किसी अन्य के द्वारा प्रमाणित किया जाएगा।



उदाहरण स्वरूप प्रत्येक वस्तु या तो स्वयं प्रकाशमय है या किसी अन्य के प्रकाश से प्रकाशमय हुई है,



हर वस्तु या तो स्वयं तैलीय होती है या उसे दूसरी वस्तु अर्थात तेल द्वारा तैलीय किया जाता है।



इस लिए यह संभव नहीं है कि कोई वस्तु न तो स्वयं प्रकाश व चिकनाई रखती हो और न ही किसी अन्य वस्तु ने उसे प्रकाश व चिकनाई प्रदान की हो किंतु फिर भी वह प्रकाशमय व चिकनी हो!



अतः किसी वस्तु का अस्तित्व या तो स्वयं उस पर निर्भर होता है और या फिर उसे अस्तित्व देने वाला कोई दूसरा होता है।



इस आधार पर हर संभव अस्तित्व जो स्वतः अस्तित्व में नहीं आया होता है वह किसी दूसरे अस्तित्व द्वारा अस्तित्व में आता है और उस कारक का परिणाम होता है।



वास्तव में यह वही सिद्धांत है कि हर संभव अस्तित्व के लिए एक कारक की आवश्यकता होती है।



कुछ लोगों ने यह समझ लिया है कि कारक के सिद्धांत का अर्थ यह है कि हर अस्तित्व को कारक की आवश्यकता होती है।



अतः इस आधार पर उनका कहना है कि ईश्वर भी एक अस्तित्व है इस लिए उसका भी कोई कारक होना चाहिए!



उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि कारक सिद्धांत में अस्तित्व के सभी प्रकारों की बात नहीं की गई है



बल्कि इस सिद्धांत के अंतर्गत संभव व निर्भर अस्तित्व ही आते हैं जिन्हें किसी कारक की आवश्यकता होती है बल्कि दूसरे शब्दों में हर निर्भर व आवश्यकता रखने वाले



अस्तित्व को कारक की आवश्यकता होती है न कि हर अस्तित्व को।



इस विषय का भी स्पष्ट होना आवश्यक है कि कारकों की श्रंखला को एक ऐसे अस्तित्व पर जाकर समाप्त होना चाहिए जो किसी



कारक का परिणाम न हो अर्थात अनंत तक कारकों की श्रंखला बौद्धिक रूप से संभव नहीं है।



इस प्रकार अनिवार्य अस्तित्व की उपस्थिति जो स्वतः अस्तित्व में आया हो और जिसे किसी कारक की आवश्यकता न हो सिद्ध हो जाती है।



दार्शनिकों ने कारकों में चक्रबद्ध निर्भरता को ग़लत सिद्ध करने के लिए बहुत से तर्क दिए हैं किंतु वास्तविकता यह है कि



कारकों के संदर्भ में चक्रबद्ध निर्भरता का ग़लत होना लगभग एक स्पष्ट विषय है और थोड़े से विचार के बाद यह विषय स्पष्ट हो जाता है।



अर्थात इस बात के दृष्टिगत कि परिणाम का अस्तित्व कारक की उपस्थिति पर निर्भर होता है, यदि हम यह मान लें कि यह स्थिति सारे अस्तित्वों के लिए है तो



फिर कभी भी किसी अस्तित्व को सिद्ध करना संभव नहीं होगा क्योंकि ऐसे परिणामों के एक समूह की कल्पना, जो एक दूसरे के लिए कारक भी हों, बौद्धिक दृष्टि से संभव नहीं है।



उदाहरण स्वरूप धावकों की एक टीम दौड़ने के लिए तैयार खड़ी है किंतु हर एक ने यह सोच रखा है कि



जब तक दूसरा नहीं दौड़ेगा वह दौड़ना आरंभ नहीं करेगा तो यदि सारे धावक ऐसा ही सोच लें तो फिर उनमें से कोई भी दौड़ना आरंभ नहीं करेगा।



इसी प्रकार यदि हर अस्तित्व की उपस्थिति किसी दूसरे अस्तित्व की उपस्थिति पर निर्भर हो तो कोई भी अस्तित्व होगा ही नहीं जबकि हम अपनी आँखों से इतने सारे अस्तित्वों को देख रहे हैं।



अतः सिद्ध हुआ कि कोई एक ऐसा अस्तित्व है जो अन्य सभी अस्तित्वों से भिन्न है और उसे अपनी उपस्थिति के लिए किसी अन्य अस्तित्व की आवश्यकता नहीं है।