ज्ञान का सही मार्ग
 

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यह ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने का सरलतम दार्शनिक मार्ग है जो कुछ बौद्धिक भूमिकाओं से बना हुआ है



और इसे किसी अन्य भूमिका अर्थात प्रयोगात्मक भूमिका की आवश्यकता नहीं है किंतु चूँकि इस तर्क में दार्शनिक तर्कों व सिद्धांतों का प्रयोग किया गया है



इस लिए इन दार्शनिक नियमों और सूत्रों को स्पष्ट करने के लिए कुछ भूमिकाओं की आवश्यकता है।



कोई बात चाहे जितनी सरल हो, कम से कम दो मूल विषयों पर आधारित होती हैः विषय और विशेषता। उदाहरण स्वरूप यह वाक्य कि सूर्य प्रकाश देता है,



इस वाक्य में सूर्य के लिए प्रकाश को सिद्ध किया गया है यहाँ सूर्य विषय है और प्रकाश देना विशेषता है।



विषय के लिए विशेषता सिद्ध करना केवल तीन दशाओं में सीमित है। या विषय के लिए वह विशेषता असंभव होगी। उदारहण स्वरूप यह कहा जाए कि तीन की संख्या चार से बड़ी है।



या विषय के लिए वह विशेषता अनिवार्य होगी, जैसे यह कहा जाए कि दो की संख्या चार की आधी है। या फिर न असंभव हो और न अनिवार्य हो,



जैसे यह कहा जाए कि सूर्य हमारे सिर के ऊपर है।



तर्कशास्त्र के नियमों के अनुसार पहली दशा में विषय व विशेषता का संबंध असंभव है और दूसरी दशा में यह संबंध आवश्यक या अनिवार्य है और तीसरी दशा में संभव है



अलबत्ता संभव के विशेष अर्थ के साथ।



इस बात के दृष्टिगत कि दर्शनशास्त्र में अस्तित्व के बारे में चर्चा की जाती है और जिस वस्तु का अस्तित्व असंभव हो उसका स्वाभाविक रूप से कोई अस्तित्व नहीं होता इस



लिए दर्शनशास्त्रियों ने अस्तित्व को बौद्धिक रूप से वाजिबुल वुजूद अर्थात अनिवार्य अस्तित्व और मुमकेनुल वुजूद अर्थात संभव अस्तित्व जैसे दो प्रकारों में बाँटा है।



वाजिबुल वुजूद या आवश्यक अस्तित्व उस अस्तित्व को कहते हैं जो स्वयं ही अस्तित्व में आया हो और उसे किसी अन्य अस्तित्व की आवश्यकता न हो।



स्वाभाविक है कि इस प्रकार का अस्तित्व अनंत व निरंतर होगा क्योंकि किसी काम विशेष में किसी वस्तु का नष्ट हो जाना इस बात का चिन्ह होता है कि



उसका अस्तित्व स्वयं उससे नहीं है। उसे अस्तित्व में आने के लिए किसी दूसरे अस्तित्व की आवश्यकता होती है जो उसका कारक होता है



और उस विशेष कारक के अस्तित्व पर उसका अस्तित्व और कारक के न होने पर उसका न होना निर्भर होता है।