ज्ञान का सही मार्ग
 

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स्पष्ट है कि मानव ज्ञान जितना बढ़ता जाएगा, प्रकृति के रहस्यों से उतना ही अधिक पर्दा उठता जाएगा और इस सृष्टि के राज़ उतने ही उजागर होते जाएंगे किंतु



अब तक जिन रहस्यों से पर्दा उठ चुका है, उन्हीं पर चिंतन और विचार, पवित्र व स्वच्छ मन रखने वालों को इस संसार के रचयिता तक पहुँचा देगा और सभी का कर्तव्य है



कि अपने रचयिता के बारे में सोचें। (जारी है)



सृष्टि ईश्वर और धर्म-11 एवं 12 सरल तर्क



पिछली चर्चा में बताया गया कि ईश्वरीय दर्शनशास्त्रियों और धर्मगुरुओं ने ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए बहुत से तर्क और प्रमाण पेश किए हैं



जिन्हें इस विषय से संबंधित पुस्तकों में देखा जा सकता है। हमने यहाँ पर एक ऐसे तर्क और प्रमाण को आप के लिए चुना है जिसके लिए अपेक्षाकृत कम भूमिकाओं की आवश्यकता है।



इसके साथ ही उसे समझना भी सरल है किंतु यह याद रखना चाहिए कि यह तर्क ईश्वर को एक अनिवार्य अस्तित्व के रूप में प्रमाणित करता है।



अर्थात ऐसे अस्तित्व के रूप में जिसका होना आवश्यक है और जिसे किसी जन्मदाता की आवश्यकता नहीं है और उस अनिवार्य अस्तित्व अर्थात ईश्वर के अन्य अपरिहार्य गुणों,



जैसे ज्ञान, शक्ति तथा निराकार होने आदि को अन्य तर्कों से प्रमाणित करेंगे।



बुद्धि के नियम के अनुसार प्रत्येक अस्तित्व या तो अनिवार्य होगा या फिर संभव। कोई भी अस्तित्व इन दो बौद्धिक



दशाओं से हटकर नहीं हो सकता किंतु सारे अस्तित्व संभव व निर्भर की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते क्योंकि संभव व निर्भर



अस्तित्व को अपने अस्तित्व के लिए किसी जन्मदाता की आवश्यकता होती है और यदि सारे जन्म दाताओं के अस्तित्व संभव व निर्भर



अस्तित्व की श्रेणी में आते हों तो फिर हर एक को एक कारक की आवश्यकता होगी और इस प्रकार यह क्रम न समाप्त होने वाला हो जाएगा।



दूसरे शब्दों में कारकों का एक दूसरे पर निर्भर होना बुद्धि के अनुसार संभव नहीं है इस लिए इस प्रकार के सभी अस्तित्वों के लिए किसी एक ऐसे कारक और जन्मदाता की आवश्यकता है



जो स्वयं किसी कारक या जन्मदाता पर निर्भर न हो और उसे अपने अस्तित्व के लिए किसी अन्य कारक की आवश्यकता न हो। अर्थात उसका अस्तित्व अनिवार्य हो।