ज्ञान का सही मार्ग
 

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ईश्वर को पहचानने का सबसे सरल मार्ग पृथ्वी पर मौजूद उसके चिन्हों के बारे में चिंतन करना है अर्थात ब्रह्मांड की सभी वस्तुएं चाहे वे पृथ्वी पर हों या आकाश पर या फिर मनुष्य के शरीर में,



एक जाने पहचाने अस्तित्व को दर्शाती हैं और दिल की सूइयों को सृष्टि के रचयिता की ओर घुमाती हैं जो हर समय हर स्थान पर उपस्थित रहता है।



कोई भी उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था, उद्देश्य रखने वाले व्यवस्थापक का चिन्ह होती है और पूरी सृष्टि में इस प्रकार की सूक्ष्म व्यवस्थाएं बड़ी संख्या में दिखाई पड़ती हैं



जो मिल कर एक परिपूर्ण व्यवस्था की रचना करती हैं जिसे एक बुद्धिमान रचयिता ने जन्म दिया है और वही उसे सही रूप से चला रहा है।



बाग़ में मिट्टी और खाद व पानी की सहायता से उगने वाले फूल, अपने विभिन्न आकर्षक रंगों और सुगंधों के साथ और सेब का पेड़ जो एक छोटे से बीज से बढ़ कर इतना बड़ा होता है



और हर वर्ष ढेरों फल देता है, इसी प्रकार सारे पेड़-पौधे सब कुछ किसी का पता बताते हैं। इसी प्रकार फूलों की डालियों पर बैठी बुलबुल है जो मीठी आवाज़ में बोलती है,



उसके अंडों से बच्चे बाहर आते हैं और अपनी चोंच ज़मीन पर मारते हैं। इसी प्रकार जन्म लेते ही अपनी माँ का दूध पीने वाला बछड़ा और गाय के थन में दूध का होना,



यह सब कुछ उसी के चिन्ह ही तो हैं। यदि सोचा जाए तो स्तनों में दूध का होना कितनी आश्चर्य की बात है जो बच्चे के जन्म देते ही माता के स्तन में आ जाता है।



वह मछलियाँ जो हर वर्ष अंडे देने के लिए सैंकड़ों किलो मीटर यात्रा करती हैं और समुद्री पक्षी जिन्हें आस-पास मौजूद हज़ारों अन्य पंछियों के घोंसलों में से अपने घोंसले का सही पता होता है



और वे एक बार भी दूसरे के घोंसले में नहीं जाते और मधु मक्खियाँ, जो प्रतिदिन प्रातः अपने छत्ते से बाहर निकलती हैं और दूर-दूर जाकर फूलों का रस चूसती हैं



और शाम होते ही पुनः अपने छत्तों में लौट जाती हैं, यह सब कुछ उसी का तो चिन्ह है।



इन सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि मधु मक्खियाँ और गाएं अपनी आवश्यकता से कई गुना अधिक मधु और दूध देती हैं ताकि मनुष्य उनसे लाभ उठाए।



इसी प्रकार मानव शरीर में ईश्वर की महान व सूक्ष्म रचनाओं के अनेक उदाहरण मिलते हैं।



शरीर के विभिन्न अंगों में सामंजस्य, प्रत्येक अंग की विशेष प्रकार की करोड़ों जीवित कोशिकाओं से रचना, यद्यपि सारी कोशिकाएं एक ही कोशिका से अस्तित्व में आई होती हैं,



किंतु प्रत्येक कोशिका आवश्यक पदार्थों की निर्धारित मात्रा के साथ होती है। इसके अतिरिक्त शरीर का प्रत्येक अंग अपने सही स्थान पर रहता है और



विभिन्न अंगों के उद्देश्यपूर्ण व संतुलित काम, उदाहरण स्वरूप फेफड़ों द्वारा ऑक्सीजन शरीर के भीतर जाती है



और फिर लाल रक्त कणों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचती है।



यकृत, आवश्यक मात्रा में शर्करा बनाता है, घाव या कटने की स्थिति में नई कोशिकाएं स्वतः जन्म लेती हैं, सफ़ेद ग्लोब्यूल अथवा कणों द्वारा रोगाणुओं के विरुद्ध लड़ाई



और इसी प्रकार शरीर के एक-एक अंग और एक-एक कोशिका की क्रियाएं सबकी सब उसी ईश्वर के चिन्ह ही तो हैं। प्रत्येक कोशिका एक सूक्ष्म व उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था है



और कोशिकाओं का एक समूह अंग बनाता है जो एक बड़ी उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था होती है और इस प्रकार की जटिल व उद्देश्यपूर्ण व्यवस्थाओं के समूह को शरीर कहा जाता है



किंतु बात यहीं पर समाप्त नहीं होती बल्कि इस ब्रह्मांड के कोने-कोने में प्राणधारी और बिना प्राण की ऐसी लाखों-करोड़ों व्यवस्थाएं मौजूद हैं जो मिल कर इस ब्रह्मांड की रचना करती हैं



जिसका कोई छोर नहीं है और जो एक तत्वदर्शी व सूझ-बूझ वाले व्यवस्थापक की देख-रेख में संतुलित रूप से चल रहा है।