ज्ञान का सही मार्ग
 

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परिणाम यह निकला कि ईश्वर की पहचान व बोध के स्वाभाविक होने का यह अर्थ है कि मनुष्य का हृदय ईश्वर को पहचानता है



और उसकी आत्मा की गहराइयों में ईश्वरीय पहचान का प्रकाश मौजूद होता है जिसे बढ़ाया भी जा सकता है



किंतु साधारण लोगों में यह स्थिति ऐसी नहीं होती कि उन्हें चिंतन व विचार की आवश्यकता ही न रहे।



ईश्वर को पहचानने के लिए असंख्य और विभिन्न मार्ग हैं जिनका बुद्धिजीवियों की किताबों में, धर्मगुरुओं द्वारा और ग्रंथों में उल्लेख किया गया है।



ईश्वर की पहचान के लिए जो प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं वे कई पहलुओं से एक दूसरे से अलग हैं।



उदाहरण स्वरूप कुछ दलीलों व प्रमाणों में अनुभव, प्रयोग और बोध से संबंधित तथ्यों का सहारा लिया गया है जबकि कुछ अन्य में केवल बौद्धिक तर्कों का ही प्रयोग किया गया है।



कुछ दलीलों में सीधे रूप से ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित किया गया है जबकि कुछ अन्य में बौद्धिक तर्कों का सहारा लेकर किसी ऐसे अस्तित्व को प्रमाणित किया गया है



जिसकी उपस्थिति के लिए अन्य अस्तित्व की आवश्यकता नहीं होती और जिसको पहचानने के लिए दूसरे प्रकार के तर्क प्रस्तुत करने पड़ते हैं।



एक आयाम से ईश्वर को पहचानने के तर्कों को ऐसे मार्गों के समान बताया जा सकता है जो नदी को पार करने के लिए होते हैं।



नदी पार करने के लिए कभी साधारण लकड़ी के पुल होते हैं जो नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बनाए जाते हैं



और जिस पर चल कर पथिक दूसरी ओर पहुँच जाता है जबकि कुछ पुल पत्थर के बने होते हैं जो अधिक मज़बूत होते हैं किंतु इससे मार्ग लम्बा हो जाता है



(जबकि नदी में से रेल की पटरी भी बिछाई जाती है जिस पर से भारी भरकम रेल गाड़ियाँ गुज़रती हैं।)



जो लोग सरलता से तथ्यों को स्वीकार कर लेते हैं वे बड़े ही साधारण मार्ग से अपने ईश्वर को पहचान कर उसकी उपासना कर सकते हैं



किंतु जिनके मस्तिष्क पर शंकाओं का बोझ होता है उन्हें पत्थरों से बने हुए पुल का मार्ग अपनाना चाहिए और जो लोग सदैव ही शंकाओं तथा



संदेहों के भंवर में फंसे रहते हैं उन्हें ऐसे मार्ग का चयन करना होगा जो अधिक मज़बूत हो भले ही उसमें मोड़ व जटिलता भी अधिक ही क्यों न हो।