ज्ञान का सही मार्ग
 

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तर्कसंगत दलीलों और दार्शनिक विचारों के बाद प्रत्यक्ष रूप से जो वस्तु प्राप्त होती है उसे प्राप्त की जाने वाली पहचान व ज्ञान का नाम दिया जाता है



और जब इस प्रकार की पहचान प्राप्त हो जाए तो फिर उसके बाद मनुष्य स्वाभाविक व आध्यात्मिक पहचान प्राप्त करने का भी प्रयास कर सकता है।



हम प्रायः यह सुनते रहते हैं कि ईश्वर की पहचान मनुष्य की प्रवृत्ति में है और मनुष्य स्वाभाविक रूप से ईश्वर की पहचान रखता है।



इस प्रकार के वाक्यों के अर्थ को अधिक समझने के लिए प्रवृत्ति और स्वभाव के बारे में जानना आवश्यक है।



प्रवृत्ति व स्वभाव से आशय वह दशा व स्वभाव है जो किसी भी प्राणी के जन्म के साथ ही उसमें पाया जाता है और उस प्रकार के सभी प्राणियों में वह विशेषता व स्वभाव मौजूद होता है।



इस प्रकार से प्रवृत्ति व स्वभाव के लिए तीन विशेषताओं पर ध्यान दिया जा सकता है।



पहली बात तो यह कि प्रवृत्ति हर प्राणी में उसके जैसे अन्य प्राणियों की भांति होती है भले ही किसी में प्रबल और किसी में क्षीण हो।



दूसरे यह कि प्रवृत्ति सदैव एक समान होती है और इतिहास से भी यह सिद्ध होता है कि प्रवृत्ति में कभी भी परिवर्तन नहीं आता, आज मनुष्य की जो प्रवृत्ति है



वह हज़ार वर्ष पहले भी थी। तीसरे यह कि प्रवृत्ति से संबंधित विशेषताओं को सीखने-सिखाने की आवश्यकता नहीं होती



अलबत्ता उसे सजाया-संवारा जा सकता है और इसके लिए प्रशिक्षण व सीखने की आवश्यकता हो सकती है।



बहुत से बुद्धिजीवी ईश्वर व धर्म की ओर मनुष्य के रुझान को स्वाभाविक व मनोवैज्ञानिक विषय मानते हैं और उसे धर्म बोध या धर्म भावना का नाम देते हैं।



यहाँ पर यह बात उल्लेखनीय है कि ईश्वर की पहचान भी मनुष्य के लिए स्वाभाविक बताई गई है किंतु जिस प्रकार ईश्वर की उपासना की प्रवृत्ति जाना-बूझा रुझान नहीं है



उसी प्रकार ईश्वर की पहचान की प्रवृत्ति भी जाना-बूझा रुझान नहीं होता कि साधारण लोगों को इस संदर्भ में चिंतन व विचार की



आवश्यकता ही न पड़े अर्थात इस बात का कि ईश्वर की पहचान हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होती है,



यह अर्थ नहीं होगा कि मनुष्य को ईश्वर की पहचान प्राप्त करने की दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है



क्योंकि उसमें यह पहचान स्वाभाविक रूप से मौजूद होती है किंतु इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि हर व्यक्ति जिसे कम ही सही



किंतु ईश्वर की आध्यात्मिक पहचान होती है वह थोड़ा सा चिंतन और विचार करके ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर सकता है



और धीरे-2 अपने बोध, ज्ञान और पहचान में वृद्धि करके चेतना व ज्ञान के चरण में पहुँच सकता है।