ज्ञान का सही मार्ग
 

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इस आधार पर वैज्ञानिक व भौतिक विचारधारा के जो अर्थ हमने बताए हैं उन अर्थों में केवल एक धोखा है और उसे वास्तव में विचारधारा नहीं कहा जा सकता



क्योंकि वह भौतिक वस्तुओं व अर्थों तक ही सीमित होता है। अधिक से अधिक उसे भौतिक संसार के ज्ञान का नाम दिया जा सकता है



और यह ज्ञान विचारधारा के मूल विषयों पर बहस करने में सक्षम नहीं है।



वो ज्ञान जो अनुसरण द्वारा प्राप्त होता है वह दूसरी श्रेणी का ज्ञान होता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुक हैं, इस प्रकार का ज्ञान जिसे अनुसरण द्वारा प्राप्त किया जा सकता है,



उसकी प्राप्ति से पहले आवश्यक है कि जिसका अनुसरण किया जा रहा है उस पर पूर्ण विश्वास हो। अर्थात पहले किसी ईश्वरीय दूत अथवा पैग़म्बर की पैग़म्बरी



और ईश्वरीय दूत होना सिद्ध हो ताकि उसके संदेश पर विश्वास किया जा सके। इससे पहले संदेश देने वाले अर्थात ईश्वर का अस्तित्व प्रमाणित होना आवश्यक है।



स्पष्ट सी बात है कि ईश्वर के अस्तित्व को उसके भेजे हुए पैग़म्बरों और दूतों के कथनों से सिद्ध नहीं किया जा सकता।



उदाहरण स्वरूप यह नहीं कहा जा सकता कि चूंकि क़ुरआन कहता है कि ईश्वर है इस लिए ईश्वर का अस्तित्व है बल्कि यह प्रक्रिया इसके विपरीत होगी।



अर्थात सबसे पहले ईश्वर के अस्तित्व को तर्क व बुद्धि के आधार पर सिद्ध करना होगा फिर पैग़म्बरों के अस्तित्व को तथा क़ुरआन के अस्तित्व को



सिद्ध करना होगा और जब यह सारी बातें सिद्ध हो जाएं तो पैग़म्बरों कथनों और क़ुरआन की शिक्षाओं का अनुसरण किया जा सकता है



तथा इस मामले में सच्चे स्रोत के रूप में उस पर विश्वास करके उनका पालन किया जा सकता है किंतु मूल विषयों को दूसरे मार्गों से सिद्ध करना आवश्यक होगा।



अर्थात ईश्वर है, इसके प्रमाण में यह नहीं कहा जा सकता कि चूंकि क़ुरआन में कहा गया है



और चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा है कि ईश्वर एक है इस लिए ईश्वर एक है बल्कि पहले उसके होने और फिर उसके अनन्य होने का ऐसा तर्क होना चाहिए जो क़ुरआन



और ईश्वरीय दूतों के कथनों के अतिरिक्त हो।



इस प्रकार यह बात स्पष्ट हो गई कि अनुकरणीय अर्थात विश्वस्त सूत्र की बात मानकर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता वह सृष्टि की वास्तविकता को





समझने के लिए उपयोगी नहीं होगा और उसके द्वारा सृष्टि के बारे में विचारधारा नहीं बनाई जा सकती।