ज्ञान का सही मार्ग
 


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तीसरे प्रकार का ज्ञान है अनुकरणीय ज्ञान। अर्थात कुछ सूत्रों और स्रोतों पर पूर्ण विश्वास के कारण मनुष्य उनकी बातों को सच मानता है और इस माध्यम से ज्ञान प्राप्त करता है।



ईश्वरीय धर्म के मानने वाले ईश्वरीय दूतों की बातों पर इसी प्रकार के ज्ञान के अंतर्गत विश्वास करते हैं और कभी कभी तो उनका विश्वास पहले की दो प्रकार के ज्ञानों से अधिक दृढ़ व ठोस होता है।



ज्ञान की चौथी क़िस्म अंतर-दृष्टि के माध्यम से प्राप्त होती है। यह ज्ञान सबसे विश्वस्त ज्ञान है। इसमें किसी प्रकार की शंका और संदेह की गुंजाइश नहीं होती।



किंतु यह बात जानना भी उचित होगा कि यह ज्ञान उसी को प्राप्त हो सकता है जिसकी आत्मा और मन पूर्ण रूप से पवित्र हो।



अब हमें यह देखना है कि धर्म और आयडियालोजी के जो मूल विषय हैं उन्हें ज्ञान के इन चारों प्रकारों में से किसके माध्यम से समझा जा सकता है?



और कौन सा ज्ञान इस मामले में दूसरे ज्ञानों से अच्छा है?



प्रायोगिक गतिविधियों और क्रियाओं से प्राप्त होने वाला ज्ञान चूंकि सीमित होता है इसलिए इसके माध्यम से केवल भौतिक और सांसारिक वस्तुओं का ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है



और विज्ञान द्वारा विचारधारा के सिद्धान्तों की पहचान संभव नहीं है क्योंकि इस प्रकार के विषय भौतिक ज्ञान से परे हैं और कोई भी भौतिक ज्ञान इस संदर्भ में कुछ नहीं कह सकता।



उदाहरण स्वरूप ईश्वर के अस्तित्व को किसी भी प्रकार से वैज्ञानिक मार्गों या प्रयोगशालाओं में परीक्षणों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता।



क्योंकि विज्ञान चाहे जितना विकास कर ले, सीमित ही रहेगा और वह किसी भी प्रकार से इस संसार से हटकर अर्थात भौतिकता से दूर किसी विषय के बारे में कुछ नहीं कह सकता।