चौथा पेज
 
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सादिक़ न आता हो।

33.शिया जाफ़री फ़िरक़ा ऐसी किताबों से इस्तेफ़ादा करता है जो नबी ए अकरम (स) और अहले बैत इस्मत व तहारत (अ) की हदीसों पर मुश्तमिल है जैसे अल काफ़ी तालीफ़ सिक़तुल इस्लाम शेख़ कुलैनी, मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह तालीफ़ शेख सदूक़ और अल इस्तिबसार व तहज़ीब तालीफ़ शेख़ तूसी, उनके यहाँ यह हदीस की अहम किताबें हैं।


यह किताबें अगरचे सही हदीसों पर मुश्तमिल हैं लेकिन न उनके मुवल्लेफ़ीन व मुसन्नेफ़ीन और न ही शिया फ़िरक़ा उन तमाम हदीसों को सही क़रार देता है। यही वजह है कि शिया फ़ोक़हा उनकी तमाम हदीसों को सही नही जानते बल्कि वह सिर्फ़ उन्ही हदीसों को क़बूल करते हैं जो उनके नज़दीक शरायते सेहत पर खरी उतरती हों, जो इल्मे दिराया, रेजाल और क़वानीने हदीस पर पूरी नही उतरती हैं उन को तर्क कर देते हैं।


34. इसी तरीक़े से शिया (अक़ायद, फ़िक़ह और दुआ व अख़लाक़ के मैदान में) दूसरी किताबों से इस्तेफ़ादा करते हैं। जिन में आईम्मा (अ) से मुख़्तलिफ़ क़िस्म की हदीसें नक़्ल की गई हैं जैसे नहजुल बलाग़ा जिसे सैयद रज़ी ने तालीफ़ किया है और उसमें इमाम अली (अ) के ख़ुतबे, ख़ुतूत और हिकमत आमेज़ मुख़्तसर कलेमात मौजूद हैं और इसी तरह इमाम ज़ैनुल आबेदीन अली बिन हुसैन का रिसाल ए हुक़ूक़ और सहीफ़ ए सज्जादिया या इमाम अली (अ) का सहीफ़ ए अलविया और दीगर किताबें जैसे उयूने अख़बारे रज़ा, अत तौहीद, एललुश शरायेअ और मआनिल अख़बार तालीफ़ शेख़ सदूक़ वग़ैरह।


35.शिया जाफ़री फ़िरक़ा बाज़ अवक़ात पैग़म्बरे इस्लाम (स) की उन सही हदीसों से भी बिना किसी तास्सुब व कीनह व नख़वत व तकब्बुर के इसतेनाद करता है जो अहले सुन्नत वल जमाअत[14] भाईयों की किताबों में मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर नक़्ल की गई हैं, जिसकी गवाह शियों की वह क़दीम व जदीद किताबें हैं, जिनमें सहाब ए केराम, नबी (स) की बीवियाँ, रसूल के मशहूर सहाबा और अकाबिर रावियों से नक़्ल हुई हैं जैसे अबू हुरैरा, अनस वग़ैरह, अलबत्ता एक शर्त के साथ वह यह कि क़ुरआने मजीद और दीगर सही हदीस से मुतआरिज़ न हो और न ही अक़्ले मोहकम (सालिम) और इजामा ए उलामा के ख़िलाफ़ न हो।


36.शिया अक़ीदा रखते हैं कि मुसलमानों को दौरे क़दीम व जदीद में जिन मुश्किलात, जानी या माली नुक़सान का सामना करना पड़ा है, वह सिर्फ़ दो चीज़ों का नतीजा है:

1. अहले बैत (अ) को भूला देना जब कि वह दर हक़ीक़त क़यादत की लियाक़त और सलाहियत रखते थे, इसी तरह उनके इरशादात व तालीमात को भूला देना, बिल ख़ुसूस क़ुरआने मजीद की तफ़सीर उन से हट कर बयान करना।


2. इस्लामी फ़िरक़ों और मज़हिब के दरमियान इख़्तिलाफ़, तफ़रक़ा और लड़ाई झगड़े।
यही वजह है कि शिया फ़िरक़ा हमेशा मिल्लते इस्लामिया की सफ़ों के दरमियान इत्तेहाद क़ायम करने की दावत देता है और तमाम लोगों की तरफ़ प्यार व दोस्ती और भाई चारगी का हाथ बढ़ाता है और उसके साथ साथ उन फ़िरक़ों व मज़ाहिब के अहकाम और उनके नज़रियात और उनके उलामा के इज्तेहाद का भी ऐहतेराम करता है।

चुनाँचे इस रास्ते में शिया जाफ़री फ़ोक़हा इब्तेदाई सदियों से ही अपनी फ़िक़ही, तफ़सीरी और कलामी किताबों में ग़ैर शिया फ़ोक़हा के नज़रियात का ज़िक्र करते आये हैं जैसे शेख तूसी किताब फ़िक़ह में अल ख़िलाफ़, शेख़ तबरसी की किताब तफ़सीर में मजमउल बयान जिनकी तारीफ़ अल अज़हर युनिवर्सिटी के बुज़ुर्ग उलामा ने की है।


या इल्मे कलाम नसीरुद्दीन तूसी की किताब तजरीदुल ऐतेक़ाद, जिस की तशरीह आलिमे अहले सुन्नत अलाउद्दीन क़ौशजी अशअरी ने की है।
37.शिया जाफ़री फ़िरक़े के बुज़ुर्ग उलामा तमाम इस्लामी मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब के उलामा के दरमियान फ़िक़ह, अक़ायद और तारीख़ी मौज़ूआत में गुफ़तुगू और तबादल ए ख़्याल की ज़रुरत पर ज़ोर देते हैं और दौरे हाज़िर के मुसलमानों के मसायल के दरमियान तफ़ाहुम की ताकीद करते हैं और तोहमत व इत्तेहाम के तीरों और दुश्नाम बाज़ी से फ़ज़ा को ज़हर आलूद करने से हत्तल इमकान इज्तेनाब करते हैं ता कि इस्लामी मिल्लत के दरमियान जो फ़ासला मौजूद है और उसकी वजह से वह मुतअद्दिद हिस्सों में बटी हुई है, उसमें एक मंतिक़ी क़ुरबत की फ़ज़ा हमवार हो, ताकि इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मनों का रास्ता बंद हो जाये, जो हमारे दरमियान ऐसी दरारों की खोज में रहते जिनके ज़रिये वह बग़ैर किसी इस्तिसना के तमाम मुसलमानों को नुक़सान पहुचा सकें।

और इसी वजह से शिया फ़िरक़ा किसी भी अहले क़िबला (मुसलमान) को काफ़िर नही कहता। क्योकि शियों का फ़िक़ही मज़हब और उनका अक़ीदा यह है कि काफ़िर वह होता है जिसके कुफ्र पर तमाम मुसलमानों का इजमा हो। शिया अहले क़िबला से दुश्मनी नही करते और न उन क़हर व ग़लबा और ज़ब्र व इकराह पसंद करते हैं और शिया तमाम इस्लामी फ़िरक़ों और मज़ाहिब के उलामा के इज्तेहाद का ऐहतेराम करते हैं और जो शख़्स किसी दूसरे मज़हब से शिया मज़हब में आया है उसके तमाम आमाल को मुस्किते तकलीफ़ और उसे बरीउज़ ज़िम्मा समझते हैं, क्योकि जब उसने अपने मज़हब के मुताबिक़ नमाज़, रोज़े, हज्ज, ज़कात, निकाह, तलाक़ और ख़रीद व फ़रोख़्त जैसे उमूर अंजाम दिये लिहाज़ा गुज़श्ता फ़रायज़ की क़ज़ा वाजिब नही है। इसी तरह उसके लिये तजदीदे निकाह व तलाक़ वाजिब नही है अलबत्ता शर्त यह है कि मज़हब के मुताबिक़ जारी हुए हों।


इसी तरह अपने मुसलमान भाईयों के साथ बिल्कुल उसी तरह रहते हैं जैसे कि अगर वह उनके भाई या रिश्तेदार होते तो उस वक़्त भी उन के साथ ऐसे ही रहते।
लेकिन शिया इस्तेमारी फ़िरक़ों की ताईद व तसदीक़ नही करते हैं जैसे बहाईयत, बाबीईयत और क़ादयानी या इसके मानिन्द दूसरे फ़िरक़े बल्कि शिया उनकी मुख़ालेफ़त करते हैं और उनसे मुहारेबा करते हैं और उन से हर क़िस्म के राब्ते को हराम क़रार देते हैं।

शिया (बाज़ अवक़ात न कि हमेशा) तक़य्या करते हैं जिसका मतलब यह है कि अपने मज़हब और अक़ीदे को (किसी सबब की बेना पर) पोशिदा किया जाये और यह तक़य्या नस्से क़ुरआनी के मुताबिक़ एक जायज़ अम्र है और इस पर तमाम इस्लामी मज़ाहब अमल करते हैं अलबत्ता जब किसी दुश्मन के दरमियान फ़ँस जायें। (और इज़हारे अक़ीदे की सूरत में यक़ीनी तौर पर ख़तरा मौजूद हो) तो तक़य्या किया जा सकता है और यह दो सबब की बेना पर होता है:
1. अपनी जान की हिफ़ाज़त की ख़ातिक ता कि उस का ख़ून बेकार न बह जाये।

2.मुसलमानों का इत्तेहाद बाक़ी रहे और उन के दरमियान इख़्तिलाफ़ व इफ़्तेराक़ पैदा न हो।
38.शिया फ़िरक़ा समझता है कि आज मुसलमानो के पीछे रह जाने का सबब फ़िक्री, सक़ाफ़ती, इल्मी और टेकनाँलाजी के मैदान में उनका आपस में इख़्तिलाफ़ व तफ़रक़ा है और इसका इलाज यह है कि ख़ुद मुसलमान मर्दों और औरतों के शऊर को बुलंद किया जाये और उनकी फ़िक्री, सक़ाफ़ती और इल्मी सतह की तरक़्क़ी के लिये इल्मी मराकिज़ बनाये जाएँ। जैसे युनिवर्सिटियाँ, मदरसे, इदारे और जदीद उलूम के नतायज व तजरुबात से इक़्तेसादी आबाद कारी, सनअत व हिरफ़त की मुश्किलात को दूर किया और मुसलमानों को मैदाने अमल और ख़ुशहाल ज़िन्दगी की सरगर्मियों में लाने कि लिये उनके दरमियान इतमिनान व ऐतेमाद की फ़ज़ा क़ायम की जाये ता कि उनमें इस्तिक़लाल और ख़ुद ऐतेमादी पैदा हो सके और दूसरों की ख़ुशामद और उनकी इत्तेबा से महफ़ूज़ रहें। इसी लिये शिया हज़रात जहाँ से भी गुज़रे और जिस तरह भी रहे वहाँ उन्होने इल्मी व तालीमी मरकज़ों की बुनियाद रखी और मुख़्तलिफ़ इल्मी मैदानों में उनके माहिरीन की तरबीयत के लिये इदारे क़ायम किये। इसी तरह उन्होने मुल्क और शहर की युनिवर्सिटियों और दीनी मदरसों में दाख़िले लिये। जिसके नतीजे में वहाँ से ज़िन्दगी के हर शोअबे में आला दर्जे के उलामा और अहले फ़न तालीम से फ़ारिग़ हुए और जिसके बाद उन्होने बा क़ायदा इल्मी मरकज़ों तक रसाई हासिल की और क़ाबिले क़द्र ख़दमात छोड़ीं।


39.शिया फ़िरक़े अपने उलामा और फ़ोकहा से तक़लीद के ज़रिये हमेशा राब्ते में रहता है, इस लिये कि वह अपने फ़िक़ही मुश्किलात में उन उलामा की तरफ़ रूजू करते हैं और अपनी ज़िन्दगी के तमाम मसायल में उन उलामा की राय पर अमल करते हैं, क्योकि फ़ोक़हा (उनके अक़ीदे के मुताबिक़) आख़िरी इमाम के वकील हैं और उसके आम नायब हैं। यही वजह है कि हमारे उलामा अपने उमूर मआश व इक़्तेसाद में सरकारी हुकूमतों पर अपना दारोमदार नही रखते, इसी तरह उनके उलामा हज़रात इस अज़ीम फ़िरक़े के अफ़राद के दरमियान वसाक़त और ऐतेमाद के अज़ीम और आली मर्तबा पर फ़ायज़ होते हैं।


और इस फ़िरक़े के दीनी इल्मी मदारिस (जो उलामा साज़ी के मराकिज़ हैं) ख़ुम्स व ज़कात के अमवाल से अपनी इक़्तेसादी हाजात को पूरा करते हैं, जिन्हे लोग अपने दिली मैल व रग़बत के साथ फ़ोक़हा के हवाले करते हैं और उसे नमाज़, रोज़े की तरह एक शरई वज़ीफ़ा समझते हैं।


और शिया इमामिया के नज़दीक अपनी दर आमद के मुनाफ़े (बजट) से ख़ुम्स निकालना वाजिब है, जिस पर वाज़ेह दलीलें मौजूद हैं और इस बारे में कुछ रिवायात सेहाह और सोनन में भी नक़्ल हुई हैं।[15]


40.शिया इमामिया फ़िरक़ा अक़ीदा रखता है कि मुसलमानों का हक़ है कि उन इस्लामी हुकूमतों से फ़ायदा उठायें, जो किताब व सुन्नत के मुताबिक़ अमल करती है और मुसलमानों के हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त करती है और दूसरी हुकूमतों से मुनासिब और मुसालेमत आमेज़ में राब्ता क़ायम करती हैं और अपनी सरहदों की हिफ़ाज़त करती हैं और मुसलमानों के सक़ाफ़ती, इक़्तेसादी और सियासी इस्तिक़लाल के लिये कोशिश करती रहती हैं ता कि मुसलमान बा ईज़्ज़त रह सकें। जैसा कि अल्लाह तआला ने चाहा है:

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और ईज़्ज़त सिर्फ़ ख़ुदा और उसके रसूल और मोमिनीन के लिये हैं।
(सूर ए मुनाफ़ेक़ून आयत 8)
और ख़ुदा ने फ़रमाया:
..................................
ख़बरदार सुस्ती न करना और मुसीबत पर ग़मगीन न होना अगर तुम साहिबाने ईमान हो।

(सूर ए आले इमरान आयत 139)
और शिया अक़ीदा रखते हैं कि इस्लाम (क्योकि वह कामिल और जामेअ दीन है इस लिये) के पास हुकूमती निज़ाम से मुतअल्लिक़ एक दक़ीक़ राह व रविश और दस्तुरुल अमल मौजूद है, लिहाज़ा अज़ीम इस्लामी मिल्लत के उलामा पर लाज़िम है कि वह इस कामिल निज़ाम को अमली जामा पहनाने के लिये एक साथ बैठ कर बात चीत और गुफ़्तुगू करें ता कि इस उम्मत को परेशान हाली और सरगरदानी और कभी न तमाम होने वाली मुश्किलात से बाहर निकालें और अल्लाह ही नासिर व मददगार है।

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अगर तुम ने ख़ुदा की मदद की तो ख़ुदा तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हे साबित क़दम रखेगा।
(सूर ए मुहम्मद आयत 7)
यह शिया इमामिया (जिसे जाफ़री फ़िरक़ा भी कहा जाता है) के हक़ीक़ी और वाक़ई अक़ायद और उनकी शरीयत के अहम ख़द्द व ख़ाल थे जिन्हे मैने आपक सामने बिल्कुल वाज़ेह और रौशन इबारत में पेश कर दिया है।


इस फ़िरक़े के लोग इस वक़्त अपने दीगर मुसलमान भाईयों और बहनों के साथ तमाम इस्लामी मुल्कों में ज़िन्दगी बसर करते हैं और मुसलमानों की ईज़्ज़त व आबरु और उनके समाज व मुआशरे की हिफ़ाज़त के लिये हरीस हैं और इस राह में अपनी जान व माल और शख़्सियत तक को क़ुर्बान करने क लिये तैयार रहते हैं।

[1]. देखिये मुहम्मद सद्र की किताब तासीसुश शिया लेउलूमिल इस्लाम, अज़ ज़रिया एला तसानिफ़िश शिया जिल्द 29 तालीफ़ आग़ा बुज़ुर्ग तेहरानी, कशफ़ुज़ ज़ुनुन तालीफ़ आफ़ंदी, मोजमुल मुअल्लेफ़ीन तालीफ़ उमर रज़ा कुहाला, आयानुश शिया तालीफ़ मोहसिन अमीन आमुली वग़ैरह।


[2]. तारीख़े क़ुरआन, अत तमहीद फ़ी उलूमिल क़ुरआन, तालीफ़ मुहम्मद हादी मारेफ़त वग़ैरह।

[3]. (................) (सूर ए मायदा आयत 67), यह आयत भी इस सिलसिले में नाज़िल हुई। (............) (सूरए मायदा आयत 3), (.....................) (सूर ए मायदा आयत 3) (......................) (सूर ए मआरिज आयत 2)

[4]. ख़ुलाफ़ाउन नबी, तालीफ़ हायरी बहरानी।

[5]. बित तहक़ीक़ अरब व अजम के (ग़ैर शिया) मुमताज़ शायरों ने ऐसे मुफ़स्सल क़सीदे कहे हैं जिन में बारह इमामों के मुकम्मल नाम मज़कूर हैं जैसे उन शायरों में हसकफ़ी, इब्ने तूलून, फ़ज़्ल बिन रोज़बहान, जामी, अत्तार नैशापुरी, मौलवी के क़सीदे, यह सब मज़हबे इमाम अबू हनीफ़ा और इमाम शाफ़ेई वग़ैरह के पैरों हैं, हम यहाँ पर नमूने के तौर पर उन में से दो क़सीदे ज़िक्र कर रहे हैं।

पहला क़सीदा जनाब हसकफ़ी हनफ़ी का है जिनका शुमार छटी सदी हिजरी के उलामा में से होता है कहते हैं

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अव्वल (इमाम अली) हैदर और उनके बाद उनके बेटे इमाम हसन और इमाम हुसैन हैं।
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उसके बाद जाफ़र सादिक़ और उनके बेटे इमाम मूसा काज़िम हैं और उनके बाद सैयद व सरदार अली है।
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जिन्हे इमाम रज़ा के नाम से जाना जाता है, आपके बाद आपके बेटे मुहम्मद (तक़ी) फिर अली, और उनके सच्चे बेटे
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यानी हसन (असकरी) हैं और उनके फ़ौरन बाद आपके बेटे इमाम मुहम्मद (महदी आख़िरुज़ ज़मान) है, उन्ही हज़रात के बारे में अक़ीदा रखती है
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एक क़ौम यही मेरे इमाम और सरदार हैं जिन के असमा बाहम ऐसे मिले हुए हैं जिन में से किसी एक को भी छोड़ा नह जा सकता।
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वह अल्लाह के बंदों पर उसकी हुज्जत हैं और वह उस तक पहुचने का रास्ता और मक़सद हैं।
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वह दिनों में अपने रब के लिये रोज़े रखते हैं, रात की तारिकियों में रुकू व सजदे में मशग़ूल रहते हैं।
दूसरी क़सीदा जनाब शमसुद्दीन मुहम्मद बिन तूलून का है जिनका शुमार दसवी सदी हिजरी के उलामा में होता है वह कहते हैं:
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तुम बारह इमामों से वाबस्ता रहो जो कि मुस्तफ़ा ख़ैरुल बशर की आल हैं।
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अबू तुराब (अली) हसन, हुसैन और ज़ैनुल आबेदीन का बुग़्ज़ बुरा है।
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मुहम्मद बाक़िर जिन्होने इल्म के कितने ही बाब खोले और सादिक़ हैं जिन्हे जाफ़र के नाम से दुनिया में पुकारो।
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मूसा जो कि काज़िम हैं और उनके बेटे अली जिन का लक़ब रज़ा है और उनकी क़द्र व मंज़िलत बुलंद हैं।
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मुहम्मद तक़ी हैं जिनका दिल असरारे इलाही से मामूर है और अली नक़ी हैं जिनकी ख़ूबियाँ चारों तरफ़ फैली हुई हैं।
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और हसन असकरी पाक व पाकीज़ा हैं और इमाम मुहम्मद मेहदी हैं जो जल्दी ही ज़ाहिर होगें।
देखिये किताब अल आईम्मतो इसना अशर मुअल्लिफ़ मुवर्रिख़े दमिश्क़ शमसुद्दीन मुहम्मद बिन तूलून वफ़ात (953 हिजरी क़मरी)
तहक़ीक़ डाक्टर सलाहुद्दीन अल मुन्जिद, मतबूआ बैरुत लेबनान।
[6]. आम्मा की सिहाहे सित्ता और उनके अलावा दूसरी किताबों में मौजूद है नबी ए अकरम (स) ने फ़रमाया ............................
आख़िरी ज़माने में मेरी नस्ल में एक शख़्स ज़ाहिर होगा जिसका नाम मेरा नाम होगा और उसकी कुनियत मेंरी कुनियत होगी, वह ज़मीन को अदल व इंसाफ़ से उसी तरह से भर देगा जैसे वह ज़ुल्म व जौर से भरी होगी।

[7]. देखिये, अल मुसन्नफ़, सनआनी।
[8]. देखिये, अल यवाक़ीत वल जवाहर, शअरानी अंसारी मिस्री, जो दसवीं सदी हिजरी के उलामा में से हैं।

[9]. देखिये, सही बुख़ारी, सही मुस्लिम, सोनने बहीक़ी।

[10]. मालिकियों की राय जानने के लिये देखिये, बिदायतुल मुजतहिद तालीफ़, इब्ने रुश्दे क़ुरतुबी।
[11]. इस सिलसिले में उन तमाम हदीसों की तरफ़ रूजू किया जाये जो मुख़्तलिफ़ इस्लामी मज़ाहिब की कुतुबे सेहाह, सोनन और मोतबर मसानीद में नक़्ल की गई हैं।
[12]. सबकी शाफ़ेई की किताब शिफ़ाउ सेक़ाम पेज 107 पर और इसी की तरह सोनन इब्ने माजा में जिल्द 1 पेज 117 में नक़्ल हुआ है।

[13]. ग़ुलू का मतलब यह है कि किसी इंसान को उलूहियत या रुबूबियत का दर्जा दे दें या यह अक़ीदा रखे कि यह किसी काम के अंजाम देने में मशीयते इलाही या इज़्ने ख़ुदा के बग़ैर उसे अंजाम देता है जैसा कि यहूद व नसारा अंबिया के बारे में ऐसा अक़ीदा रखते हैं।न
[14]. यहाँ पर इस बात पर तवज्जो करना ज़रुरी है कि शिआ इमामिया भी अहले सुन्नत हैं क्योकि शिया ही जो कुछ सुन्नते नबवी (स0 में वारिद हुआ है उसे क़ौलन व अमलन तसलीम करते हैं और उन में वह वसीयतें हैं जो रसूल (स) ने अहले बैत (अ) के हक़ में कीं और शिया उन पर कमा हक्क़हू अमल पैरा हैं और इस बात की गवाही शिया के अक़ायद, उनकी फ़िक़ह और उनकी हदीसों की किताबें इस बात की बेहतरीन गवाह हैं और इस सिलसिले में अभी जल्दी ही एक मुफ़स्सल इनसाईक्लो पीडिया (मोअजम) भी दस जिल्दों में छपी है जिस में रसूले इस्लाम (स) की शिया किताबों से रिवायतों को जमा किया गया है। जिसका नाम सोननुन नबी (स) है।
[15]. बहसे ख़ुम्स से मुतअल्लिक़ शिया फ़ोक़हा की इस्तिदलाली और इस्तिमबाती किताबें मुलाहिज़ा करें।