तीसरा पेज
 

और फिर मिट्टी पर सजदा करना और पेशानी को ज़मीन पर रखना यही ख़ुदा के सामने सजदा करने का सबसे मुनासिब तरीक़ा है, क्योकि मअबूद के सामने यही ख़ुशू और ख़ुज़ू का सब से अच्छा तरीक़ा है, इसी तरह ख़ाक पर सजदा करना इंसान को उसकी असल्म हक़ीक़त की याद दिलाता है कि वह उसी से पैदा हुआ है, क्या ख़ुदा वंदे आलम ने नही फ़रमाया:



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(सूरए ताहा आयत 55)
< इसी ज़मीन से हमने तुम्हे पैदा किया है और इसी में पलटा कर ले जायेगें और फिर दोबारा उसी में से निकालेगें।
बेशक सजदा ख़ुज़ू की आख़िरी हद का नाम है और ख़ुशू की आख़िरी मंज़िल मुसल्ले (जानमाज़) फ़र्श, कपड़े और क़ीमती जवाहर पर सजदा करके हासिल नही होती, बल्कि बदल की अशरफ़ तरीन जगह यानी पेशानी को पस्त तरीन जगह यानी मिट्टी पर रखे।[7]

अलबत्ता उस मिट्टी को पाक होना चाहिये, उसी तहारत की ताकीद की बेना पर शिया लोग अपने साथ मिट्टी का ढेला (यानी सजदा गाह वग़ैरह) रखते हैं और बाज़ अवका़त यह मिट्टी तबर्रुक के तौर पर मुक़द्दस तरीन जगह से लेते हैं जैसे ज़मीने कर्बला, जिस में फ़रज़ंदे रसूल हजरत इमाम हुसैन (अ) शहीद कर दिये गये, जैसा कि बाज़ सहाबा मक्के के कंकड़ और पत्थर वग़ैरह को सफ़र में सजदे के लिये अपने साथ रखते थे।[8]

अलबत्ता शिया इस पर इसरार नही करते हैं और न ही इस चीज़ पर हमेशा ज़रुरी समझते हैं बल्कि वह हर पाक मिट्टी और पत्थर के ऊपर बिना किसी इशकाल और तरद्दुद के सजदा करते हैं, जैसे मस्जिदे नबवी और मस्जिदुल हराम के फ़र्श और वहाँ पर लगे हुए पत्थर।

इसी तरह शिया नमाज़ में अपने दाहिने हाथ को बाये हाथ पर नही रखते। (हाथ नही बाँधते) क्योकि रसूले इस्लाम (स) ने नमाज़ में यह काम अंजाम नही दिया और यह बात क़तई नस्से सरीह से साबित नही है, यही वजह है कि सुन्नी मालिकी हज़रात भी यह फ़ेल अंजाम नही देते।[9]

25. शिया फ़िरक़ा वुज़ू में दोनो हाथों को ऊपर की तरफ़ से कोहनियों से उँगलियों के सिरे तक धोते हैं और उसके बर ख़िलाफ़ नही करते क्योकि यह तरीक़ा उन्होने अपने इमामों से लिया है और उन्होने उसको अल्लाह के रसूल (स) से लिया है और अहले बैत (अ) अपने जद की बातों को दूसरों से ज़्यादा और बेहतर तरीक़े से जानते हैं कि उनके जद यह काम कैसे किया करते थे, जैसा कि रसूले ख़ुदा (स) भी इसी तरह अंजाम देते थे और उन्होने आयते वुज़ू की यह तफ़सीर की है कि इला आयते वुज़ू में (सूर ए मायदा आयत 6)[10] मअ के मायने में आया है जैसा कि शाफ़ेई सग़ीर ने अपनी किताब निहायतुल मोहताज में यही ज़िक्र किया है इसी तरह यह लोग अपने पैरों और सर को धोने के बजाए उनका मस्ह करते हैं, जिसका सबब हमने ऊपर ज़िक्र किया है और यही तरीक़ा इब्ने अब्बास का था जैसा कि उन्होने कहा है

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वुज़ू सिर्फ़ दो चीज़ों के धोने और दो चीज़ों के मस्ह करने का नाम है।
(देखिये, सुन्न, मसानीद, तफ़सीरे फ़खरे राज़ी आयते वुज़ू के ज़ैल में)
26. शिया कहते है कि मुतआ (वक़्ती शादी) करना नस्से क़ुरआनी की बेना पर जायज़ है क्योकि ख़ुदा वंदे आलम का इरशाद है
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(सूर ए निसा आयत 24)
पस जो भी उन औरतों से लज़्ज़त हासिल करे उसकी उजरत उन्हे बौतौरे फ़रीज़ा अदा करे।
यही वजह है कि तमाम मुसलमान रसूल (स) के ज़माने में मुतआ करते थे और तमाम सहाबा अहदे ख़िलाफ़ते उमर के निस्फ़ दौर तक मुतआ करते थे।
क्योकि मुतआ भी शरई शादी है जो दायमी शादी में नीचे बयान किये जाने वाले अहकाम में मुश्तरक है:
1. मुतआ में भी औरत शौहर वाली नही होनी चाहिये और सिग़ों को उसी तरह से पढ़ना ज़रुरी है कि ईजाब औरत की तरफ़ से और क़बूल मर्द की तरफ़ से हो।
2. दायमी शादी की तरह मुतआ में भी औरत को कुछ माल देना ज़रूरी है जिसे दायमी शादी में मेहर कहते हैं और मुतआ में अज्र कहते हैं जैसा कि क़ुरआनी नस्स के मुताबिक़ हमने ऊपर ज़िक्र किया है।

3. दायमी शादी की तरह मुतआ में भी मर्द से जुदा होने की सूरत में औरत पर इद्दा गुज़ारना ज़रुरी है।
4. मुतआ में भी मुफ़ारेक़त के बाद औरत पर दायमी निकाह की तरह इद्दा ज़रुरी है। इसी तरह मुतआ से पैदा होने वाली औलाद भी दायमी शादी की तरह मुतआ करने वाले शख़्स की औलाद होगी और मुतआ में भी दायमी निकाह की तरह औरत एक मर्द से ज़्यादा से एक वक़्त में मुतआ नही कर सकती।



5. मुतआ में दायमी निकाह की तरह बाप और औलाद और औलाद और माँ को एक दूसरे की मीरास मिलेगी।
मुतआ और शादी का फ़र्क़ नीचे बयान किया जा रहा है:
1. मुतआ में मुद्दत होती है, जबकि शादी में मुद्दत नही होती।
2. मुतआ वाली औरत का नफ़क़ा मर्द पर वाजिब नही है और औरत मर्द की मीरास नही पायेगी।
3. मुतआ करने वाले मर्द और औरत के दरमियान मीरास नही होती।
4. मुतआ में तलाक़ की ज़रूरत नही होती बल्कि मुद्दत ख़त्म हो जाने के बाद या दोनो के इत्तेफ़ाक़ से मुद्दत बख़शने के बाद ख़ुद व ख़ुद जुदाई हो जाती है।
इस तरह की शादी का क़ानून होने की चंद हिकमतें हैं:
1. जायज़ और मशरुत तरीक़े से औरत व मर्द की जिन्सी ज़रुरत का रास्ता फ़राहम करना है ताकि जो लोग बाज़ असबाब की बेना पर दायमी शादी नही कर सकते या जो लोग बीवी के मरने के बाद या किसी और सबब की बेना पर औरत से महरुम हो चुके हैं या औरत उन असबाब की बेना पर मर्द से महरुम हो गई हो और यह लोग ज़िन्दगी को शराफ़त और राहत के साथ गुज़ारना चाहते हों तो मुतआ उन के लिये आसान रास्ता है।

2. मुतआ दर अस्ल समाजी मुश्किलात को हल करने के लिये तशरीअ किया गया है ता कि इस्लामी समाज अख़लाक़ी बुराईयों में मुबतला न हो पाये।
कभी इस मुतआ के ज़रिये इंसान शादी से पहले जायज़ तरीक़े से एक दूसरे को अच्छी तरह से पहचान सकता है, (जो मुमकिन है आईन्दा के लिये मुफ़ीद और नतीजा बख़्श हो) और उसके बाद इंसान फ़ेअले हराम में मुबतला होने से महफ़ूज़ रहता है, इसी तरह ज़ेना, जिन्सी दबाव और रुसवाई या दूसरे हराम उमूर में मुबतला न हो। जैसा मुश्त ज़नी, क्योकि जो एक बीवी पर सब्र नही कर सकता या इक़्तेसादी और माली मुश्किल की बेना पर या एक से ज़्यादा औरतों का ख़र्चा नही चला सकता वग़ैरह वग़ैरह और वह हराम काम भी नही करना चाहता हो तो उसके लिये यह रास्ता आसान है।

बहरहाल यह शादी भी क़ुरआन और हदीस से मुसतनद है और सहाबा ने एक दूसरे पर एक ज़माने तक अमल किया है, चुनाचे अगर यह शादी ज़ेना शुमार की जाये तो उसका मतलब यह हुआ कि ख़ुदा, रसूल और सहाबा ने ज़ेना को हलाल समझा और उसके अंजाम देने वाले एक ज़माने तक ज़ेना करते रहे। अल अयाज़ो बिल्लाह।

मज़ीद यह कि इस हुक़्म का नख़्स होना भी मालूम नही है, क्योकि इस का नस्ख़ होना किताब व सुन्नत से साबित नही है और न कोई क़तई व सरीह दलील इस पर मौजूद है।[11]

बहरहाल शिया इमामिया इस शादी को नस्से क़ुरआन और सुन्नते रसूल (स) की बेना पर हलाल समझते हैं लेकिन दायमी शादी और घर आबाद करने को तरजीह देते हैं, क्योकि ऐसी शादी क़वी और सालिम समाज की बुनियाद और असास है और वक़्ती शादी की तरफ़ ज़्यादा रग़बत नही रखते जिसे शरीयत में मुतआ कहते हैं, अगरचे (जैसा कि हमने पहले कहा कि) यह हलाल और जायज़ हैं।

और इस मक़ाम पर यह ज़िक्र कर देना भी मुनासिब है कि शिया इमामिया (किताब व सुन्नत और तालीम आईम्म ए अहले बैत (अ) पर अमल पैरा होने की बेना पर) औरत के हुक़ूक़ का ऐहतेराम करते हैं और उन्हे बड़ी अहमियत देते हैं और औरत के मक़ाम व मर्तबा, उनके हुक़ूक़ बिल ख़ुलूस उन के साथ ख़ुश अख़लाक़ी से पेश आने पर मिल्कियत, निकाह, तलाक़, गोद लेने और परवरिश करने, दूध पिलाने जैसे मसायल के साथ साथ, इबादात व मामलात के लिये निहायत आला अहकाम, जो उन के आईम्मा से नक़्ल हुए वह सब उन की फ़िक़ह में पाये जाते हैं।

27. शिया जाफ़री फ़िरक़े ज़ेना, लवात, सूद ख़ोरी, नफ़्से मोहतरमा का क़त्ल, शराब नोशी, जुवा, बलवा व बग़ावत, मक्र व फ़रेब बाज़ी, धोखाधड़ी, ज़खीरा अंदोज़ी, नाप तोल में कमी करना, ग़स्ब, चोरी, ख़ियानत, कीनह व खोट, रक़्स व ग़ेना, इत्तेहाम, बोहतान, चुग़लख़ोरी, फ़साद फ़ैलाना, मोमिन को अज़ीयत देना, ग़ीबत करना, गाली गलौज, झूठ व इल्ज़ाम और उनके अलावा तमाम गुनाहाने कबीरा व सग़ीरा को हराम जानते हैं और हमेशा उन गुनाहों से दूर रहते हैं और हत्तल इमकान उन से इजतेनाब करने की कोशिश करते हैं और उनको फैलने से रोकने के लिये हर मुमकिन वसायल बरुये कार लाते हैं जैसे तसनीफ़ व तालीफ़, किताबों की नश्र व इशाअत करना, अख़लाक़ी और तरबीयती रिसाले, मजालिस, इजतेमा और जलसे वग़ैरह क़ायम करना या नमाज़े जुमा के ख़ुतबे और दूसरी चीज़ें वग़ैरह......।

28. अख़लाक़ी फ़ज़ायल और मकारिमे अख़लाक़ को निहायत अहमियत देते हैं और मौएज़ा वग़ैरह से इश्क़ करते हैं और उनके सुनने के लिये दिलचस्बी से हाज़िर होते हैं और उसके लिये अपने घरों, मस्जिदों, पार्कों और मैदानों में जलसे, मजालिस और इजतेमाआत मुनासेबत या ग़ैर मुनासेबत से मुनअक़िद करते हैं. इसी बेना पर अज़ीम फ़वायद व मतालिब पर मुश्तमिल वह दुआएं पढ़ते हैं जो इस सिलसिले में रसूले इस्लाम (स) और अहले बैत इस्मत व तहारत (अ) से नक़्ल हुई है जैसे दुआए कुमैल, दुआए अबू हमज़ा, दुआएं सेमात, दुआएं जौशने कबीर, दुआएं मकारिमे अख़लाक़, दुआएं इफ़तेताह (जो रमज़ान में पढ़ी जाती है) वह उन दुआओं और बुलंद मज़ामीन पर मुश्तमिल मुनाजात को निहायत ख़ुशू व ख़ुज़ू और एक ख़ास गिरया व ज़ारी के साथ पढ़ते हैं, क्योकि यह दुआएँ नफ़्स को पाकीज़ा बनाती है और उन के ज़रिये इंसान अल्लाह से क़रीब होता है।

यह तमाम दुआएँ मौसूअतुल अदईया (मोअजमे अदईया) में जमा की गई हैं, इसी तरह यह कुतुब अदईया में भी मौजूद हैं जो उन के दरमियान रायज हैं।

29. और शिया नबी ए अकरम (स), अहले बैत (अ) और आपकी पाक नस्ल जो जन्नतुल बक़ीअ और मदीन ए मुनलव्वरा में दफ़्न हैं उनकी क़ब्रों का ऐहतेराम करते हैं, जिन में इमाम हसने मुजतबा (अ), इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ), इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) और इमाम जाफ़र (अ) हैं।

और नजफ़े अशरफ़ में इमामे अली (अ) का मज़ार है और करबला में इमाम हुसैन (अ) और आपके भाई, आपकी औलाद और आपके चचा की औलाद और आपके असहाब व अंसार (जो आप के साथ यौमे आशूरा शहीद हुए थे) के क़ब्रें हैं।

और सामर्रा में इमाम अली नक़ी (अ) और माम हसन असकरी (अ) के रौज़े हैं और काज़मैन में इमाम मुहम्मद तक़ी (अ) और इमाम मूसा काज़िम के रौज़े हैं जो सबके सब इराक़ में हैं और ईरान के शहर मशहद में इमाम अली रज़ा (अ) का रौज़ा है और क़ुम व शीराज़ (ईरान) में उन इमामों के बेटों और बेटियों के रौज़े हैं और दमिश्क़ (सीरिया) में करबला की शेर दिल ख़ातून जनाब सैय्यद ए ज़ैनब (अ) का रौज़ा है और क़ाहिरा (मिस्र) में सैय्यदा नफ़ीसा का रौज़ा है। (यह भी करीम ए अहले बैत (अ) हैं।)

बहरहाल उन तमाम रौज़ों और मज़ारों का ऐहतेराम करना रसूल (स) के पास व लिहाज़ की बेना पर है, क्योकि हर शख़्स अपनी औलाद में बाक़ी और महफ़ूज़ रहता है और किसी की औलाद का ऐहतेराम करना ख़ुद उसका ऐहतेराम करने के बराबर है जैसा कि क़ुरआने करीम ने आले इमरान, आले यासीन, आले इब्राहीम और आले याक़ूब की मदह फ़रमाई है और उनकी क़द्र व मंज़िलत की बुलंद क़रार दिया है हालाँकि उन में से बाज़ नबी भी नही थे।

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यह एक नस़्ल है जिस में एक का सिलसिला एक से है।
(सूर ए आले इमरान आयत 34)
इसी लिये क़ुरआने मजीद ने उन पर ऐतेराज़ नही किया, जिन लोगों ने यह कहा था:
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(सूर ए कहफ़ आयत 21)


उन्होने कहा कि हम उन पर मस्जिद बनायेगें।
यानी हम असहाबे कहफ़ के रौज़ों पर मस्जिद बनायेगें ता कि उनके पास ख़ुदा की इबादत की जाये और अल्लाह ने उनके अमल को शिर्क नही कहा, क्योकि मुसलमान मोमिन सिर्फ़ अल्लाह ही के लिये रुकू, सजदा और इबादत करता है और वह उन पाक व मुतहहर अवलिया की ज़रीह के क़रीब सिर्फ़ इस लिये जाता है क्योकि उन अवलिया की वजह से वह मकान मुक़द्दस हो गया है जैसे इब्राहीम (अ) की बेना पर मक़ामे इब्राहीम की क़दासत व करामत हासिल है, जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम फ़रमाता है:

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और हुक्म दे दिया कि मक़ामे इब्राहीम को मुसल्ला बनाओ।
(सूर ए बक़रह आयत 125)
पस जो शख़्स मक़ामे इब्राहीम के पीछे नमाज़ पढ़े तो वह ऐसा नही है कि वह मक़ामे इब्राहीम की इबादत करता है या जो सफ़ा व मरवा के दरमियान सई करता है वह उन्हे अल्लाह समझ कर नही आया है कि वह उन दोनो पहाड़ों की इबादत कर रहा हो बल्कि यह इस लिये है कि अल्लाह ने उनके अपनी इबादत के लिये मुबारक व मुक़द्दस जगह क़रार दिया है, नतीजतन वह भी आख़िर में अल्लाह की तरफ़ मंसूब हैं बेशक मुअय्यन दिन और जगहें मुक़द्दस हैं जैसे अरफ़े का दिन, मेना व अरफ़ात का मैदान और उनका क़दासत की वजह उनका अल्लाह की तरफ़ मंसूब होना है।

30. इसी सबब की बेना पर शिया भी (दीगर मुसलमानों की तरह) शाने रसूले अकरम (स) व आले रसूल के मुहाफ़िज़ और उसका इदराक करने वाले हैं। अहले बैत (अ) के मुबारक रौज़ों की बड़े ऐहतेमाम से ज़ियारत करते हैं ता कि उससे उन की तकरीम हो और उन से इबरत हासिल करें और उनके साथ अहद को ताज़ा करें और उस अक़दार की मज़ीद पाबंदी करें जिस के लिये उन्होने जिहाद किया और उसी की हिफ़ाज़त के लिये शहीद हो गये, क्योकि उन मशाहिदे मुक़द्देसा की ज़ियारत करने वाले अपने ज़ियारतों में अहले क़ब्र के फ़ज़ायल और उनके जिहाद ही का ज़िक्र करते हैं या उन्होने जो नमाज़ें क़ायम कीं और ज़कात अदा की उसका तज़किरा करते हैं, नीज़ उन्होने उस राह में जो परेशानियाँ और मुसीबतें उठाईं हैं उन को बयान करते हैं जैसा कि रसूले इस्लाम (स) को अपनी मज़लूम नस्ल से जो दिसचस्बी थी उसकी वजह से आपने भी उन का ग़म मनाया है जैसा कि

जनाबे हमज़ा की शहादत पर आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया:
हाय हमज़ा पर कोई रोने वाला नही? जैसा कि तारीख़ और सीरत की किताबों में नक़्ल किया गया है।
क्या रसूले ख़ुदा (स) ने अपने अज़ीज़ बेटे इब्राहीम की मौत पर गिरया नही किया? क्या आप बक़ीअ में क़ब्रों की ज़ियारत करने नही जाते थे? क्या आपने यह नही फ़रमाया:
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क़ब्रों की ज़ियारत करो क्योकि उनकी ज़ियारत तुम्हे आख़िरत की याद दिलाती है।
बेशक आईम्म ए अहले बैत (अ) की क़ब्रो की ज़ियारत और उनकी सीरते तय्यबा और राहे ख़ुदा में उनके जिहादी कारनामे आईन्दा नस्ल को उन अज़ीम क़ुरबानियों की याद दिलाता है जो उन ज़वाते मुकद्दसा ने इस्लाम व मुसलेमीन के रास्ते में पेश की हैं, उससे उनके अंदर राहे ख़ुदा में शहादत, शुजाअत व जवाँ मर्दी और ईसार व क़ुर्बानी की रुह बेदार होती है।

बेशक यह अमल इंसानियत, तहज़ीब व तमद्दुन और अक़्ल के ऐन मुताबिक़ अमल है, क्योकि उम्मतें अपने बुज़ुर्गों और तहज़ीब व तमद्दुन के बानियों को हमेशा ज़िन्दा रखती हैं और उनसे मरबूत तारीख़ों को बहर सूरत और हर हाल में बाक़ी रखने की कोशिश करती हैं, क्योकि यह उनकी इज़्ज़त और इफ़्तेख़ार का बाइस होती हैं और उनके ज़रिये उम्मतों का रुजहान उनकी अक़दार के बारे में और उनकी अहमियत के बारे में और ज़्यादा होता है।

यही वह चीज़ है जिसे क़ुरआने मजीद ने चाहा है जब उसने अपनी आयात में अंबिया, अवलिया, सालेहीन और उनके हालात का बड़े ऐबतेमाम से साथ तज़किरा किया है।

31. शिया रसूले अकरम (स) औऱ उनकी पाक आल से शिफ़ाअत तलब करते हैं और उनको ख़ुदा की बारगाह में अपने गुनाहों की बख़्शिश, तलबे हाजात और मरीज़ों की शिफ़ायाबी के लिये वसीला क़रार देते हैं क्योकि क़ुरआने मजीद ने इस बात को न सिर्फ़ यह कि बेहतर क़रार दिया है बल्कि उसने इसकी तरफ़ वाज़ेह अंदाज़ में दावत दी है:

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(सूर ए निसा आयत 64)

और काश जब उन लोगों ने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया था तो आपके पास आते और ख़ुद भी गुनाहों के लिये इस्तिफ़ार करते और रसूल (स) भी उनके हक़ में इस्तिग़फ़ार करते तो यह ख़ुदा को बड़ा ही तौबा करने वाला और मेहरबान पाते।

या यह फ़रमाया:
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(सूर ए ज़ुहा आयत 5)
और अनक़रीब तुम्हारा परवर दिगार तुम्हे इस क़दर अता करेगा कि तुम ख़ुश हो जाओ।

और इससे मुराद मक़ामे शिफ़ाअत है।

यह बात कैसे माक़ूल है कि एक जानिब रसूले अकरम (स) को ख़ुदा गुनाहगारों की शिफ़ाअत के लिये मक़ामे शिफ़ाअत और साहिबाने हाजात के लिये मक़ामे वसीला इनायत फ़रमा दे और दूसरी तरफ़ लोगों को मना फ़रमाएं कि उनसे शिफ़ाअत तलब न करें? या नबी ए अकरम (स) पर हराम क़रार दे दिया कि आप इस मक़ाम से कोई इस्तेफ़ादा न करें।

क्या ख़ुदा ने औलादे याक़ूब का यह क़िस्सा ज़िक्र नही फ़रमाया है कि जब उन्होने अपने वालिद से शिफ़ाअत तलब की और इस तरह कहा:
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(सूर ए युसुफ़ आयत 97)
बाबा जान अब आप हमारे गुनाहों के लिये इस्तिग़फ़ार करें हम यक़ीनन ख़ताकार थे।
तो मासूम और करीम नबी (स) ने उन पर कोई ऐतेराज़ नही किया बल्कि उन से यह फ़रमाया:
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(सूर ए युसुफ़ आयत 98)



यह दावा कोई नही कर सकता कि नबी (स) और आईंम्मा (अ) मर गये हैं लिहाज़ा उन से दुआ तलब करना मुफ़ीद नही? क्योकि अंबिया ख़ासाने ख़ुदा ज़िन्दा रहते हैं ख़ास तौर पर हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा (स) जिन के बारे में ख़ुदा ने इरशाद फ़रमाया:

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(सूर ए बक़रह आयत 143)
और और हमने तुम को दरमियानी उम्मत क़रार दिया है ता कि तुम लोगों के आमाल के गवाह हो और पैग़म्बर तुम्हारे आमाल के गवाह रहें।
इस आयत में शहीदन के मअना शाहिद के हैं।
और दूसरी जगह फ़रमाया:
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(सूर ए तौबा आयत 105)
और ऐ पैग़म्बर कह दीजिये कि तुम लोग अमल करते रहो कि तुम्हारे अमल को अल्लाह, रसूल और साहिबाने ईमान सब देख रहे हैं।

यह आयतें रोज़े क़यामत तक चाँद, सूरज, और रात व दिन जारी व सारी रहेंगी, लिहाज़ा रसूले इस्लाम (स) और आपकी पाक आल (अ) लोगों पर गवाह हैं और शोहदा ज़िन्दा हैं जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम ने अपनी अज़ीज़ किताब में एक बार नही कई बार ज़िक्र किया है।

32. शिया जाफ़री फ़िरक़ा नबी (स) और आईम्मा (अ) की विलादत पर महफ़िल और ख़ुशी के प्रोग्राम करते हैं और उनकी वफ़ात पर मातम व अज़ा करते हैं और उन प्रोग्रामों में उन के फ़ज़ायल और मनाक़िब और उनकी हिदायत बख़्श सीरत व किरदार का ज़िक्र करते हैं, जो सही नक़्ल के ज़रिये उन तक पहुची है और यह सब क़ुरआन की इत्तेबाअ में करते हैं क्योकि क़ुरआने करीम ने बार बार नबी ए अकरम (स) और दूसरे नबियों के मनाक़िब ज़िक्र किये हैं और उन्हे सराहा है और तमाम लोगों के ज़हनों को तास्सी, इक़्तेदा, इबरत और हिदायत हासिल करने की ख़ातिर उसकी तरफ़ मुतवज्जे किया है।

शिया उन महफ़िलों में हराम अफ़आल अंजाम देने से परहेज़ करते हैं जैसे औरत और मर्दों का एक जगह जमा होना, हराम चीजों का उन महफ़िलों में खाना पीना और मदह व सना में हद से आगे बढ़ जाना।[13]

या इसी क़िस्म के दूसरे नामुनासिब अफ़आल अंजाम देना जो रूहे शरीयत के ख़िलाफ़ हैं और उन में शरई मुसल्लम हुदुद का ख़्याल न रखा जाये या ऐसी चीज़ जिसके लिये क़ुरआन और सही हदीस की ताईद न हो या किताब व सुन्नत से इस्तिम्बात किया हुआ कोई कुल्ली क़ायदा