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12. शियों का अक़ीदा है कि चूँकि रसूले अकरम (स) के बाद इमाम की ज़िम्मेदारी वही है जो नबी की होती है जैसे उम्मत की क़यादत व हिदायत, तालीम व तरबीयत, तबयीने अहकाम और उनकी मुश्किलात का हल करना, नीज़ समाजी अहम उमूर का हल करना, लिहाज़ा यह ज़रुरी है कि इमाम और ख़लीफ़ा ऐसा होना चाहिये कि लोग उस पर भरोसा और ऐतेबार करते हों ताकि वह उम्मत तो अम्न व अमान के साहिल तक पहुचा सके, पस इमाम तमाम सलाहियतों और सिफ़ात में नबी जैसा होना चाहिये। जैसे (इस्मत और वसीअ इल्म) क्योकि इमाम के फ़रायज़ भी नबी की तरह होते हैं। अलबत्ता वही और नबुव्वत के अलावा, क्योकि नबुव्वते हज़रते मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह पर ख़त्म हो गई, आप ही ख़ातिमुल अँबिया ए वल मुरसेलीन हैं, नीज़ आपका दीन ख़ातिमुल अदयान और आपकी शरीयत ख़ातिमुश शरीया और किताब ख़ातिमुल कुतुब है, न आपके बाद कोई नबी और न आपके दीन के बाद कोई दीन और इसी तरह न आपकी शरीयत के बाद कोई शरीयत आयेगी। (शियों के पास इस मैदान में भी मुतअद्दिद और मुख़्तलिफ़ ज़ख़ीम, फ़िक्री और इस्तिदलाली किताबों मौजूद हैं।)

> 13. शियों का अक़ीदा है कि उम्मत को सीधी राह पर चलाने वाले मासूम क़ायद और वली की ज़रुरत इस बात की मुक़तज़ी और तलबगार है कि रसूल के बाद इमामत और ख़िलाफ़त का मंसब सिर्फ़ अली पर ही न ठहर जाये बल्कि क़यादत के इस सिलसिले को तवाल मुद्दत तक क़ायम रहना ज़रुरी है ता कि इस्लाम की जड़ें मज़बूत और उसकी बुनियादें महफ़ूज़ हो जायें और जो ख़तरात उसके उसूल और क़वायद ही को नही बल्कि हर इलाही अक़ीदे और ख़ुदाई निज़ाम के सामने मुँह खोले खड़े हैं उनसे उसको बचाया जा सके और उसके लिये तमाम आईम्मा (मुख़्तलिफ़ और मुतद्दिद दौर में उम्मत की रहबरी करके अपनी सीरत, तजुरबात और महारत का) ऐसा अमली नमूना और प्रोग्राम पेश कर सकें जिस की मदद से तमाम हालात में बाद में चलती रही।
14. शिया अक़ीदा रखते हैं कि नबी ए अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) ने इसी सबब और इसी बुलंद पाया हिकमत की बेना पर अल्लाह के हुक्म की ख़ातिर अली (अ) के बाद गयारह इमाम मुअय्यन फ़रमाये। लिहाज़ा हज़रत अली (अ) को मिला कर कुल बारह इमाम है। जैसा कि उनकी तादाद के बारे में नबी ए अकरम (स) की हदीसों में वज़ाहत के अलावा तज़किरा भी है कि उन सब का ताल्लुक़ क़बील ए क़ुरैश से होगा। जैसा कि सही बुख़ारी व सही मुस्लिम में मुख़्तलिफ़ अल्फ़ाज़ के साथ इस मतलब की तरफ़ इशारा किया गया है। अलबत्ता उन के असमा और ख़ुसूसियात का तज़किरा नही है:

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बुख़ारी और मुस्लिम दोनो ने रसूले ख़ुदा (स) रिवायत नक़्ल की है कि आपने फ़रमाया: बेशक दीने इस्लाम उस वक़्त तक ग़ालिब, क़ायम और मज़बूत रहेगा जब तक इस में बारह अमीर या बारह ख़लीफ़ा रहेगें, यह सब क़ुरैश से होगें।

(बाज़ नुस्खों में बनी हाशिम भी आया है और कुतुबे सिहाहे सित्ता के अलावा दूसरी क़ुतुबे फ़ज़ायल व मनाक़िब व शेयर व अदब में उन हज़रात के असमा भी मज़कूर है।)

यह हदीसें अगरचे आईम्म ए इसना अशर (जो कि इमाम अली (अ) और औलादे अली (अ) हैं) के बारे में नस्स नही हैं लेकिन यह तादाद उसी पर मुनतबिक़ होती है जो शिया अक़ीदा रखते हैं और उसकी कोई तफ़सीर नही हो सकती मगर सिर्फ़ वही जो शिया कहते हैं।[4]

15. शियों का जाफ़री फ़िरक़ा यह अक़ीदा रखता है कि आईम्म ए इसना अशर (बारह इमामों) से मुराद हज़रत अली बिन अबी तालिब जो रसूल (स) के चचा ज़ाद भाई और अपकी बेटी फ़ातेमा ज़हरा (स) के शौहर हैं।

और हसन व हुसैन हैं (जो अली व फ़ातेमा के बेटे और रसूले इस्लाम (स) के नवासे हैं।)
ज़ैनुल आबेदीन अली बिन हुसैन (अस सज्जाद)
उसके बाद:
इमाम मुहम्मद बिन अली (अल बाक़िर)
इमाम जाफ़िर बिन मुहम्मद (अस सादिक़)
इमाम मूसा बिन जाफ़र (अल काज़िम)
इमाम अली बिन मूसा (अर रिज़ा)
इमाम मुहम्मद बिन अली (अल जवाद अत तक़ी)
इमाम अली बिन मुहम्मद (अल हादी)
इमाम हसन बिन अली (अल असकरी)
इमाम मुहम्मद बिन हसन (अल महदी अल मौऊद अल मुन्तज़र (अ))[5]
यही वह अहले बैत (अ) है जिन्हे रसूले ख़ुदा (स) ने अल्लाह के हुक्म से इस्लामी उम्मत का क़ायद क़रार दिया, क्योकि यह तमाम ख़ताओं और गुनाहों से पाक और मासूम हैं, यही हज़रात अपने जद के वसीअ इल्म के वारिस हैं, उनकी मवद्दत और पैरवी की हुक्म दिया गया है जैसा कि ख़ुदा ने इरशाद फ़रमाया है:

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(सूर ए शूरा आयत 23)
ऐ रसूल, आप कह दीजिये कि मैं तुम से इस तबलीग़े रिसालत का कोई अज्र नही चाहता अलावा इस के कि मेरे अक़रबा से मुहब्बत करो।
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(सूर ए तौबा आयत 119)
ऐ ईमानदारों, तक़वा इख़्तियार करो और सच्चों के साथ हो जाओ।
देखिये कुतबे हदीस व तफ़सीर और फ़ज़ायल में फ़रीक़ैन के नज़दीक जो सहीह और दूसरी किताबें हैं।
16. शिया जाफ़री फ़िरक़ा अक़ीदा रखता है कि यह आईम्म ए अतहार वह हैं जिनके दामन पर तारीख़ न कोई ख़ता लिख सकी और न किसी ग़लती को साबित कर सकी, न क़ौल में न अमल में, उन्होने अपने ढेरों उलूम के ज़रिये उम्मते मुस्लिमा की ख़िदमत की है, और अपनी अमीक़ मारेफ़त, सालिम फ़िक्र के ज़रिये अक़ीदा व शरीयत, अख़लाक़ व आदाब, तफ़सीर व तारीख़ और मुस्तक़बिल के लायेह ए अमल को सही जेहत अता की है और हर मैदान में इस्लामी सक़ाफ़त को महफ़ूज़ कर दिया है जैसे उन्होने अपने कौ़ल और अमल के ज़रिये चंद ऐसे मुनफ़रिद और मुमता़ज़, नेक सीरत और पाक किरदार मर्दों और औरतों की तरबीयत की है, जिनके फ़ज़्ल व इल्म और हुस्ने सीरत के सब लोग क़ायल हैं।

और शिया ऐतेक़ाद रखते हैं कि अगर चे (यह बहुत अफ़सोस का मक़ाम है) उम्मते इस्लामिया ने उनको सियासी क़यादत से दूर रखा लेकिन उन्होने फिर भी अक़ायद के उसूलों और शरीयत के क़वायद व अहकाम की हिफ़ाज़त करके अपनी फ़िक्री और समाजी ज़िम्मेदारी को बेहतरीन तरीक़े से अदा किया है।

चुनाँचे मिल्लेत मुस्लिमा अगर उन्हे सियासी क़यादत का मौक़ा देती जिसे रसूले इस्लाम (स) ने ख़ुदा के हुक्म से उन्हे सौपा था तो यक़ीनन इस्लामी उम्मत सआदत व इज़्ज़त और अज़मते कामिला हासिल करती और यह उम्मत मुत्तहिद व मुत्तफ़िक़ व मुतवह्हिद रहती और किसी तरह का शिक़ाक़, इख़्तिलाफ़, नज़ाअ, लड़ाई, झगड़ा, क़ुश्त व कुश्तार और ज़िल्लत व रुसवाई का न देखना पड़ती।

इस सिलसिले में किताब अल इमाम सादिक़ वल मज़ाहिबिल अरबआ की तीन जिल्दें और दूसरी किताबें देखी जा सकती हैं।
17. शिया अक़ीदा रखते हैं कि मज़कूरा वजह और अक़ायद की किताबों में पाई जाने वाली नक़्ली व अक़ली कसीर दलीलों की बेना पर अहले बैत (अ) की पैरवी वाजिब है और उनके रास्ते और तरीक़े को अपनाना ज़रुरी है क्योकि उन्ही का तरीक़ा वह तरीक़ा है जिसे उम्मते के लिये रसूल (स) ने मुअय्यन फ़रमाया और उन से तमस्सुक का हदीसे सक़लैन (जो मुतवातिर है) हुक्म देती है जैसा कि रसूले ख़ुदा (स) ने इरशाद फ़रमाया है:

………… जिसे सही मुस्लिम और दीगर दसियों मुस्लिम उलामा व मुहद्देसीन ने हर सदी में नक़्ल किया है। देखिये, रिसाल ए हदीसे सक़लैन (मुवल्लेफ़ा वशनवी) जिसकी तसदीक़ अज़हर शरीफ़ ने तीस साल पहले की थी।

और गुज़श्ता अंबिया की हयात में भी ख़लीफ़ा और वसी बनाने का यही तरीक़ा था।
देखिये, इसबातुल वसीया, मुवल्लेफ़ा मसऊदी और फ़रीक़ैन की दीगर कुतुबे हदीस व तफ़सीर व तारीख़।
18. जाफ़री शिया अक़ीदा रखते हैं कि उम्मते इस्लामिया (अल्लाह उसको अज़ीज़ रखे) पर यह वाजिब है कि वह उन उमूर में तहक़ीक़ और बहस व मुबाहिसा करे लेकिन किसी पर सब्ब व शत्म, इल्ज़ाम व तोहमत और किसी को डराये और धमकाये बिना और तमाम इस्लामी फ़िरक़ों के उलामा व मुफ़क्केरीन पर लाज़िम है कि वह इल्मी इजतेमा शिरकत करें और सफ़ा व इख़लास के साथ गुफ़तुगू करें और अपने शिया मुसलमान भाईयों के उन नज़रियात पर ग़ौर व ख़ौज़ करे जिन पर वह क़ुरआन, सही मुतवातिर सुन्नत, तारीख़ी मुहासिबा (दलीलों) और रसूल और आँ हज़रत (स) के बाद के सियासी व समाजी के मुताबिक़ इस्तिदलाल पेश करते हैं।v
19. और शिया अक़ीदा रखते हैं कि सहाबा और जो लोग रसूल (स) के साथ थे चाहे वह औरत हों या मर्द, उन्होने इस्लाम की बड़ी ख़िदमत की है, नशरे इस्लाम की राह में अपनी जान व माल की क़ुर्बानी दी है लिहाज़ा तमाम मुसलमानों पर वाजिब है कि उन का ऐहतेराम करें और उनकी गराँ क़द्र ख़िदमात का ऐतेराफ़ करें।v
लेकिन उसका मतलब यह भी नही कि तमाम सहाबा (बतौरे मुतलक़) आदिल थे और उनके बाज़ आमाल व नज़रियात, तंक़ीद और ऐतेराज़ से मा फ़ौक़ हैं क्योकि सहाबा भी बशर हैं और उनसे भी ग़लती और भूल चूक होती है, चुनाँचे तारीख़ में यह बात मौजूद है कि उन में बाज़ हज़रात राहे मुस्तक़ीम से दूर हो गये थे, यहाँ तक कि कुछ लोग ख़ुद आँ हज़रत (स) के दौर में ही आपके रास्ते से दूर हो गये बल्कि क़ुरआने मजीद ने अपनी बाज़ आयतों और सूरों में जैसे सूर ए मुनाफ़ेकून, अहज़ाब, हुजरात, तहरीम, फ़त्ह, मुहम्मद और तौबा में इस बात की तसरीह की है।

लिहाज़ा बाज़ सहाबा हज़रात के आमाल पर जायज़ और मुहज़्ज़ब अंदाज़ में तंक़ीद करना हरगिज़ा कुफ़्र का सबब नही क़रार पा सकतास क्योकि कुफ़्र व ईमान का मेयार वाज़ेह है और उन दोनो का महवर व मर्कज़ रौशन है और वह तौहीद व रिसालत और ज़रुरियाते दीन जैसे वुजूबे नमाज़, रोज़ा, हज, शराब और जुए का हराम होना जैसी चीज़ों को मानना और उसका इंक़ार करना है, अलबत्ता क़लम और ज़बान को बदतमीज़ी और भोन्डी बातों से महफ़ूज़ रखना ज़रुरी है, क्योकि यह बातें एक मुहज़्ज़ब मुसलमान जो सीरते ख़ातिमुन नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) पर अमल पैरा है उस के लिये ज़ेब नही देती, बहरहाल इसके वाबजूद अकसर सहाबा सालेह और मुसलेह थे, जो लायक़े ऐहतेराम और मुसतहिक़्क़े इकराम हैं।

लेकिन इसके बावजूद सहाबा को जरह व तादील (आदिल या ग़ैर आदिल साबित करने) के क़वायद पर इस लिये तौला जाता है ताकि सही और क़ाबिले ऐतेमाद सुन्नत से वाक़िफ़ियत हासिल हो जाये, क्योकि हम जानते हैं कि रसूले ख़ुदा (स) के जाने के बाद आपकी तरफ़ बहुत ज़्यादा क़िज़्ब व बोहतान मंसूब है। (जैसा कि यह बात तमाम लोग जानते हैं और ख़ुद रसूल (स) ने इस बात की वाक़े होने की ख़बर भी दी थी) और इस बात के बारे में दोनो तरफ़ के उलामा हज़रात ने भी अहम किताबें लिखी हैं जैसे सुयूती और इब्ने जौज़ी वग़ैरह, ताकि वह हदीसें जो वाक़ेयन रसूले ख़ुदा (स) से सादिर हुई हैं उनके दरमियान और जो हदीसें गढ़ कर आपकी तरफ़ मंसूब की गई हैं उनके दरमियान इम्तियाज़ पैदा हो सके।

20. शिया, इमाम महदी मुन्तज़र (स) के वुजूद का अक़ीदा रखते हैं, क्यो कि इस बारे में कसीर रिवायात रसूले इस्लाम (स) से नक़्ल हुई हैं कि वह औलादे फ़ातेमा (अ) से होगें और इमाम हुसैन (अ) के नवें बेटे हैं, क्योकि इमाम हुसैन (अ) के आठवे बेटे (आठवी पुश्त) इमाम हसन असकरी (अ) हैं जिन की वफ़ात 260 हिजरी में हुई और आपको खु़दा ने सिर्फ़ एक बेटा इनायत किया था जिसका नाम मुहम्मद था चुनाँचे आप ही इमाम मेहदी (अ) हैं जिनकी कुनियत अबुल क़ासिम है।[6]

आपको मोवस्सक़ मुसलमानों को देखा है और आपकी विलादत, ख़ुसूसियात और इमामत नीज़ आपकी इमामत पर आप के वालिद की तरफ़ से नस्स की ख़बर दी है, आप अपनी विलादत के पाँच साल बाद लोगों की नज़रों से ग़ायब हो गये, क्योकि दुश्मनों ने आपको क़त्ल करने का इरादा कर लिया था लेकिन ख़ुदा वंदे आलम ने आपको इसलिये बचा कर रखा है ता कि आख़िरी ज़माने में अदल व इंसाफ़ पर मबनी इस्लामी हुकूमत क़ायम करें और ज़मीन को ज़ुल्म व फ़साद से पाक करे दें, जो कि ज़ुल्म व जौर से भरी होगी।

और यह कोई अज़ीब व ग़रीब बात नही है कि आपकी उम्र इस क़दर तूलानी कैसी होगी? क्योकि क़ुरआने मजीद इस वक़्त भी हज़रते ईसा (अ) के ज़िन्दा होने की ख़बर दे रहा है, जबकि उनकी विलादत को 2008 साल हो चुके हैं, इसी तरह हज़रते नूह (अ) अपनी क़ौंम में 950 साल ज़िन्दा रहे और अपनी क़ौम को अल्लाह की तरफ़ दावत देते रहे और हज़रते ख़िज़्र (अ) भी अभी तक ज़िन्दा है क्योकि अल्लाह तआला हर शय पर क़ादिर है, उसकी मशीयत पूरी होने वाली है, जिसे कोई टाल नही सकता। क्या उसने हज़रत युनुस (अ) के बारे में यह नही फ़रमाया कि

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(सूर ए साफ़्फ़ात आयत 143, 144)
अगर वह तसबीह करने वालों में से न होते तो रोज़े क़यामत तक उसी के पेट में रह जाते।
चुनाँचे अहले सुन्नत के अकसर बुज़ुर्ग और जलीलुल क़द्र उलामा इमाम मेहदी (अ) की विलादत और उनके वुजूद के क़ायल हैं और उन्होने उनके औसाफ़ व वालेदैन के नाम का ज़िक्र किया है जैसे

अ. अब्दिल मोमिन शबलन्जी अपनी किताब नुरुल अबसार फ़ी मनाक़िबे आले बैतिन नबीयिल मुख़्तार में।
आ. इब्ने हजर हैसमी मक्की शाफ़ेई ने अपनी किताब अस सवाएक़े मोहरेक़ा में कहते हैं अबुल क़ासिम मुहम्मह अल हुज्जह की उम्र उनके वालिद की वफ़ात के वक़्त पाँच साल की था कि लेकिन ख़ुदा ने इसी सिन में आपको हिकमत अता की और उनका नाम क़ायम मुन्तज़र है।

इ. क़ंदूज़ी हनफ़ी बलख़ी ने अपनी किताब यनाबिउल मवद्दत में इसका तज़िकरा किया है जो दौराने ख़िलाफ़ते उस्मानिया तुर्की में (आस्ताना) से छपी है।
ई. सैयद मुहम्मद सदीक़ हसन कंनौजी बुख़ारी ने अपनी किताब अल एज़ाआ लेमा काना वमा यकूनो बैना यदेईस साआ में इसे लिखा है।

यह हैं मुतक़द्देमीने उलामा के अक़वाल और मुतअख़्ख़ेरीन में से डाक्टर मुस्तफ़ा राफ़ेई ने अपनी किताब इस्लामुना में लिखा है, चुनाँचे जब उन्होने मसअल ए विलादत की बहस की है कि तो बड़ी तूल व तफ़सील के साथ बहस की है और इस बारे में उन तमाम ऐतेराज़ात और शुबहात के जवाब दिये हैं जो इस मक़ाम पर ज़िक्र किये जाते हैं।

21. जाफिर फ़िरक़े वाले लोग नमाज़ पढ़ते हैं, रोज़ा रखते हैं और अपने माल में से ज़कात व ख़ुम्स अदा करते हैं और मक्क ए मुकर्रमा जा कर एक बार बतौरे वाज़िब हज्जे बैतुलल्लाहिल हराम करते हैं और इसके अलावा भी मुसतहब हज्ज व उमरा अदा करते रहते हैं और नेकियों की तरफ़ दावत देते हैं और बुराईयों से रोकते हैं, और अवलिया ए ख़ुदा व रसूल से मुहब्बत करते हैं और ख़ुदा व रसूल के दुश्मनों से दुश्मनी करते हैं और अल्लाह की राह में हर उस काफ़िर व मुशरिक से जिहाद करते हैं जो इस्लाम के ख़िलाफ़ ऐलाने जंग करता हो और उस हाकिम से जंग करते हैं, जो क़हर व ग़लबे के ज़रिये उम्मते मुसलिमा पर मुसल्लत हो गया हो और दीने इस्लाम (जो दीने हनीफ़ और हक़ है) की मुवाफ़िक़त करते हुए तमाम इक़्तेसादा, समाजी और घरेलू कामों और मशग़लों में मसरुफ़ रहते हैं, जैसे तिजारत, इजारा, निकाह, तलाक़, मीरास, तरबीयत व परवरिश, रज़ाअत और हिजाब वगै़रह और इस सब चीज़ों के अहकाम को इज्तेहाज के ज़रिये हासिल करते हैं, जिन्हे मुत्तक़ी और परहेज़गार उलामा, किताब, सही सुन्नत और अहले बैत साबित शुदा हदीसों और अक़्ल व इजमा के ज़रिये इस्तिम्बात करते हैं।

22. और शिया अक़ीदा रखते हैं कि तमाम यौमिया फ़रायज़ के अवक़ात मुअय्यन हैं, और यौमिया नमाज़ के लिये पाँच वक़्त हैं, फ़ज्र, ज़ोहर, अस्र, मग़रिब और एशा और अफ़ज़ल यह है कि हर नमाज़ को उसके मख़सूस वक़्त में अंजाम दिया जाये, मगर यह कि नमाज़े ज़ोहर व अस्र और नमाज़े मग़रिब व एशा को जमा करके पढ़ा जा सकता है, क्योकि रसूले ख़ुदा (स) ने किसी उज़्र, मरज़, बारिश और सफ़र के बग़ैर इन दो नमाज़ों को एक साथ पढ़ा था, जैसा कि सही मुस्लिम वग़ैरह में नक़्ल हुआ है, और यह उम्मते मुस्लिमा की सहूलत के लिये किया गया है, ख़ास तौर से हमारे ज़माने में एक फ़ितरी और आम बात है।

23. शिया भी दूसरे मुसलमानों की तरह अज़ान देते हैं, अलबत्ता जब जुमल ए हय्या अलल फ़लाह आता है तो उसके बाद हय्या अला खै़रिल अमल भी पढ़ते हैं, क्योकि रसूले ख़ुदा (स) के दौर में यह हिस्सा आज़ान में कहा जाता था लेकिन बाद में हज़रत उमर ने अपने इज्तेहाद की बेना पर यह इल्लत बताते हुए कि चूँकि इससे मुसलमान जिहाद करने से रुक जायेगें उसको अज़ान से हज़्फ़ कर दिया, उनका कहना था कि मुसलमान इससे यह समझ बैठेगें कि नमाज़ ही बेहतरीने अमल है लिहाज़ा जिहाद की तरफ़ फिर कोई रग़बत नही करेगा, इस लिये इसे अज़ान में हज़्फ़ कर दिया जाये तो बेहतर है। जैसा कि अल्लामा क़ौशजी अशअरी ने अपनी किताब शरहे तजरीदुल ऐतेक़ाद में और अल मुन्सिफ़ में, कंदी, कंजुल उम्माल में मुत्तक़ी हिन्दी वग़ैरह ने इसे नक़्ल किया है इस के अलावा उमर ने एक और जुमले का इज़ाफ़ा कर दिया। अस सलातों ख़ैरुन मिन नौम, जबकि यह जुमला रसूले इस्लाम (स) के ज़माने में नही था। देखिये, कुतुबे हदीस व तारीख़। जबकि इबादत और उसके मुक़द्दमात इस्लाम में शारेअ के अम्र और उसके इज़्म पर मौक़ूफ़ हैं यानी शरीयत में हर अमल के लिये क़ुरआन और सुन्नत से नस्से ख़ास या नस्से आम मौजूद हो, और अगर किसी अमल की नस्स न हो तो वह अमल मरदुद और बिदअत हैं जिसे उसके अंजाम देने वाले के मुँह पर मार दिया जायेगा, क्योकि इबादत में किसी चीज़ की ज़ियादती या कमी मुमकिन नही है, बल्कि तमाम शरई उमूर में किसी की ज़ाती राय का कोई दख़ल नही है, अलबत्ता शिया हज़रात जो अशहदो अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह के बाद अशहदो अन्ना अलीयन वलीयुल्लाह कहते हैं तो यह उन रिवायात की बेना पर है जो रसूले ख़ुदा (स) और अहले बैत (अ) से नक़्ल की गई हैं, और उनमें यह तसरीह मौजूद है कि मुहम्मद रसूलुल्लाह कहीं ज़िक्र नही हुआ या बाबे जन्नत पर नही लिखा गया मगर उसके साथ अली वलीयुल्लाह ज़रुर था और यह जुमला इस बात की अक्कासी करता है कि शिया अली (अ) को नबी भी नबी समझते चे जाय कि वह आपकी रुबूबियत या उलूहीयत का अल अयाज़ो बिल्लाह अक़ीदा रखते हों, लिहाज़ा तौहीद व रिसालत की शहादत के बाद तीसरी शहादत (अलीयन वलीयुल्लाह) कहना जायज़ है इस उम्मीद में कि यह भी मतलूबे परवरदिगार हो। अलबत्ता इसको ज़ुज़ और वुजूब के क़स्द से अंजाम न दे, यही शियों के अकसर उलामा का फ़तवा है।

लिहाज़ा यह ज़ियादती बग़ैर क़स्दे ज़ुज़ईयत के अंजाम दी जायेगी, जैसा कि हमने कहा है लिहाज़ा यह ऐसा नही है कि शरअ में उसकी कोई अस्ल न हो, इसलिये यह बिदअत है।

24. और शिया जमीन या मिट्टी या कंकड़ के टुकड़ों और पेड़ पौधों वग़ैरह पर सजदा करते हैं और दरी, क़ालीन या चादर कपड़े और खाई जाने वाली चीज़ों और ज़ेवरात पर सजदा नही होता, क्योकि इस सिलसिले में बड़ी तादाद में शिया व सुन्नती किताबों में हदीसें मौजूद हैं, क्योकि रसूले ख़ुदा (स) का तरीक़ा यह था कि आप मिट्टी और ज़मीन पर सजदा करते थे बल्कि आप मुसलमानों को भी यही हुक्म देते थे, चुनाँचे एक दिन जनाबे बेलाल ने अपने अम्मामे की कोर पर जला देने वाली गर्मी से बचने की बेना पर सजदा किया तो रसूल इस्लाम (स) ने बेलाल के अम्मामे को पेशानी से अलग कर दिया और फ़रमाया:

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ऐ बेलाल, अपनी पेशानी को ज़मीन पर रखो।
इसी तरह की हदीस सुहैब और रबाह के बारे में नक़्ल की गई है, जब आपने फ़रमाया
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ऐ सुहैब और ऐ रबाह अपनी पेशानी को ज़मीन पर रखो।
देखिये, सही बुखारी व कंज़ुल उम्माल या अल मुसन्नफ़, तालीफ़ अब्दुल रज़्ज़ाक़ अस सनआनी, या अस सुजूद अलल अर्ज़, तालीफ़ काशिफ़ुल ग़िता।
और नबी ए अकरम (स) ने उस जगह यह इरशाद फ़रमाया (जैसा कि सही बुख़ारी वग़ैरह में आया है)
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मेरे लिये ज़मीन को मस्जिद और ताहिर व मुतह्हर बनाया गया है।