यह हक़ीक़त है।
 


किताब: यह हक़ीक़त है


लेखक: हुज्जतुल इस्लाम वल मुसलेमीन शेख़ जाफ़र अल हादी
एक दूसरे से पहचान की ज़रुरत (..............................................)
और फिर तुम में शाख़ें और क़बीले क़रार दिये हैं ताकि आपस में एक दूसरे को पहचान सको।
(सूर ए हुजरात आयत 13)
इस्लाम जब आया तो आपस में लोग अलग अलग और बहुत से गिरोहों में बटे हुए ही नही थे बल्कि एक दूसरे से लड़ाई, झगड़े और ख़ून ख़राबे में लगे रहते थे मगर इस्लामी तालीमात के सदक़े में आपसी दुश्मनी और एक दूसरे से अजनबियत की जगह मेल जोल और दुश्मनी की जगह एक दूसरे की मदद और रिश्ते तोड़ने की बजाए नज़दीकी पैदा हुई और इसका नतीजा यह हुआ कि इस्लामी हुकुमत एक अज़ीम उम्मत की शक्ल में सामने आई।

जिसने उस वक़्त अज़ीम इस्लामी तहज़ीब व तमद्दुन को पेश किया और इस्लाम से वाबस्ता गिरोहों को हर ज़ालिम व जाबिर से बचा लिया और उनकी पुश्त पनाही की। जिस की बेना पर यह उम्मत दुनिया की तमाम कौ़मों में क़ाबिले ऐहतेराम क़रार पाई और ज़ालिमों की निगाहों में रोब व दबदबे और हैबत के साथ ज़ाहिर हुई।

लेकिन यह सब चीज़ें नही वुजूद में आयीं मगर इस्लामी उम्मत के दरमियान आपस का इत्तेहाद व भाईचारगी और तमाम गिरोहों का एक दुसरे से राब्ता रखने की बेना पर जो कि दीने इस्लाम के साये में हासिल हुआ था, हालाँकि इन की शहरियत, राय, सक़ाफ़त, पहचान और तक़लीद अलग अलग थी। अलबत्ता उसूल व असास फ़रायज़ व वाजिबात में इत्तेफ़ाक़ व इत्तेहाद काफ़ी हद तक मौजूद था। यक़ीनन इत्तेहाद, क़ुव्वत और इख़्तिलाफ़ कमज़ोरी है।

बहरहाल यह मसअला इसी तरह जारी रहा यहाँ कि एक दूसरे से जान पहचान और आपसी मेल जोल की जगह इख़्तिलाफ़ात ने ले ली और एक दूसरे की समझने की जगह नफ़रत ने ले ली और एक गिरोह दूसरे गिरोह के बारे में कुफ़्र के फ़तवे देने लगा इस तरह फ़ासले पर फ़ासले बढ़ते गये। जिसकी वजह से जो रही सही इज़्ज़त थी वह भी रुख़सत हो गई और मुसलमानों की सारी शानो शौकत ख़त्म हो गई और सारा रोब व दबदबा जाता रहा और हालत यह हुई कि क़यामत की अलमबरदार क़ौम ज़ालिमों के हाथों ज़िल्लत व रुसवाई उठाने पर मजबूर हो गई। यहाँ तक कि उनकी नशवो नुमा के दहानों में लोमड़ी और भेड़िये सिफ़त लोग क़ाबिज़ हो गये। यही नही बल्कि उनके घरों के अँदर तमाम आलम की बुराईयाँ, और दुनिया के सबसे बुरे और ख़राब लोग घुस आये। नतीजा यह हुआ मुसलमानों का सारा माल व मनाल लूट लिया गया और उनके मुक़द्देसात की तौहीन होने लगी और उनकी इज़्ज़तें फ़ासिक़ो और फ़ाजिरों की मरहूने मिन्नत हो गई और पस्ती के बाद पस्ती और हार के बाद हार होने लगी। कहीं अंदुलुस में खुली हुई हार का सामना हुआ तो कहीं बुख़ारा और समरकंद, ताशकंद, बग़दाद, माज़ी और हाल में फ़िलिस्तीन और अफ़ग़ानिस्तान में हार पर हार का सामना करना पड़ा।

और हाल यह हो गया कि लोग मदद के लिये बुलाते थे लेकिन कोई जवाब देने वाला न था, फ़रियाद करने वाले थे मगर कोई उनकी फ़रियाद सुनने वाला नही था।

ऐसा क्यों हुआ, इसलिये कि बीमारी कुछ और थी दवा कुछ और, अल्लाह ने तमाम कामों की बागडोर उनके ज़ाहिरी असबाब पर छोड़ रखी है, क्या इस उम्मत की इसलाह उस चीज़ के अलावा किसी और चीज़ से भी हो सकती है कि जिससे इब्तेदा में हुई थी?

आज उम्मते इस्लामी अपने ख़िलाफ़ किये जाने वाले समाजी, अक़ीदती और इत्तेहाद मुख़ालिफ़ सबसे शदीद और सख़्त हमले से जूझ रही है, मज़हबी मैदानों में अंदर से इख़्तिलाफ़ किया जा रहा है, इज्तेहादी चीज़ों को इख़्तिलाफ़ी चीज़ों के तौर पर पेश किया जा रहा है और यह हमला ऐसा है कि इसके बुरे नतीजे ज़ाहिर होने वाले ही हैं, क्या ऐसे मौक़े पर हम लोगों के लिये बेहतर नही है कि अपने इत्तेहाद की सफ़ों को मुत्तसिल रखें और आपसी ताअल्लुक़ात को मोहकम व मज़बूत करें? हम मानते हैं कि अगरचे हमारे बाज़ रस्म व रिवाज अलग अलग हैं मगर हमारे दरमियान बहुत सी चीज़ें ऐसी हैं जो एक और मुशतरक हैं जैसे किताब व सुन्नत जो कि हमारा मरकज़ और सर चश्मा हैं, वह मुशतरक हैं तौहीद व नबुव्वत, आख़िरत पर सब का ईमान है, नमाज़ व रोज़ा, हज व ज़कात, जिहाद और हलाल व हराम यह सब हुक्मे शरीयत हैं जो सब के लिये एक और मुशतरक है, नबी ए अकरम (स) और उनके अहले बैत (अ) से मुहब्बत और उनके दुश्मनों से नफ़रत करना हमारे मुशतरेकात में से हैं। अलबत्ता इसमे कमी व ज़ियादती ज़रुर पाई जाती है, कोई ज़्यादा मुहब्बत और दुश्मनी का दावा करता है और कोई कम, लेकिन यह ऐसा ही है जैसे कि एक हाथ की तमाम उँगलियाँ आख़िर में एक ही जगह (जोड़ से) जाकर मिलती हैं, हालाँकि यह तूल व अर्ज़ और शक्ल व सूरत में एक दूसरे से मुख़्तलिफ़ हैं या उसकी मिसाल एक जिस्म जैसी है, जिसके आज़ा व जवारेह मुख़्तलि़फ़ होते हैं, मगर बशरी फ़ितरत के मुताबिक़ जिस्मानी पैकर के अंदर हर एक का किरदार जुदा जुदा होता है और उनकी शक्लों में इख़्तिलाफ़ पाया जाता है, मगर इसके बावजूद एक दूसरे के मददगार होते हैं और उनका मजमूआ एक ही जिस्म कहलाता है।

चुनाँचे बईद नही है कि उम्मते इस्लामिया की तशबीह जो यदे वाहिद और एक बदन से दी गई है इस में इसी हक़ीक़त की तरफ़ इशारा किया गया हो।

साबिक़ में मुख़्तलिफ़ इस्लामी फ़िरक़ों और मज़ाहिब के उलामा एक दूसरे के साथ बग़ैर किसी इख़्तिलाफ़ के ज़िन्दगी गुज़ारते थे बल्कि हमेशा एक दूसरे के साथ मदद किया करते थे, हत्ता बाज़ ने एक दूसरे के अक़ायदी या फ़िक़ही किताबों के शरह तक की है और एक दूसरे से शरफ़े तलम्मुज़ हासिल किया, यहाँ तक कि बाज़ तो दूसरे की तकरीम की बेना पर बुलंद हुए और एक दूसरे की राय की ताईद करते, बाज़ बाज़ को इजाज़ ए रिवायत देते या एक दूसरे से इजाज़ ए नक़्ले रिवायत लेते थे ताकि उनके फ़िरक़े और मज़हब की किताबों से रिवायत नक़्ल कर सकें और एक दूसरे के पीछे नमाज़ पढ़ते, उन्हे इमाम बनाते, दूसरे के ज़कात देते, एक दूसरे के मज़हब को मानते थे, ख़ुलासा यह कि तमाम गिरोह बड़े प्यार व मुहब्बत से एक दूसरे के साथ ऐसे ज़िन्दगी गुज़ारते थे, यहाँ तक कि ऐसा महसूस होता था कि जैसे उनके दरमियान कोई इख़्तिलाफ़ ही नही है, जबकि उन के दरमियान तन्क़ीदें और ऐतेराज़ात भी होते थे लेकिन यह तंक़ीदें मुहज़्ज़ब व मुवद्दब अंदाज़ में किसी इल्मी तरीक़े से रद्द होती थी।

इस के लिये ज़िन्दा और तारीख़ी दलीलें मौजूद हैं, जो इस अमीक़ और वसीअ तआवुन पर दलालत करती हैं, मुस्लिम उलामा ने इसी तआवुन के ज़रिया इस्लामी सक़ाफ़त और मीरास को सैराब किया है, उन्ही चीज़ों के ज़रिये मज़हबी आज़ादी के मैदान में उन्होने ताज्जुब आवर मिसालें क़ायम की हैं बल्कि वह इसी तआवुन के ज़रिये दुनिया में क़ाबिले ऐहतेराम क़रार पाये हैं।

यह मुश्किल मसअला नही है कि उलामा ए उम्मते मुसलिमा एक जगह जमा न हो सकें और सुल्ह व सफ़ाई से किसी मसअले में बहस व मुबाहसा न कर सकें और किसी इख़्तिलाफ़ी मसअले में इख़लास व सिदक़े नीयत के साथ ग़ौर व ख़ौज़ न कर सकें, नीज़ हर गिरोह को न पहचान सकें।
जैसे यह बात कितनी माक़ूल और हसीन है कि हर फ़िरक़ा अपने अक़ायद और फ़िक़ही व फ़िक्री मौक़िफ़ को आज़ादाना तौर पर वाज़ेह फ़ज़ा में पेश करे, ता कि उनके ख़िलाफ़ जो इत्तेहाम, ऐतेराज़, दुश्मनी और बेजा जोश में आने का, जो उमूर सबब बनते हैं वह वाज़ेह व रौशन हो जायें और इस बात को सभी जान लें कि हमारे दरमियान मुशतरक और इख़्तिलाफ़ी मसायल क्या हैं ता कि लोग उस से जान लें कि मुसलमानों के दरमियान ऐसी चीज़ें ज़्यादा हैं जिन पर सबका इत्तेफ़ाक़ है और उनके मुक़ाबले में इख़्तिलाफ़ी चीज़ें कम हैं, इससे मुसलमानों के दरमियान मौजूद इख़्तिलाफ़ और फ़ासले कम होगें और वह एक दूसरे के नज़दीक आ जायें।

यह रिसाला इसी रास्ते का एक क़दम है, ता कि हक़ीक़त रौशन हो जाये और उस को सब लोग अच्छी तरह पहचान लें, बेशक अल्लाह तौफ़ीक़ देने वाला है।


फ़िरक़ ए इमामिया जाफ़रिया
1. दौरे हाज़िर में इमामिया फ़िरक़ा मुसलमानों का बड़ फ़िरक़ा है, जिसकी कुल तादाद मुसलमानों की तक़रीबन एक चौथाई है और इस फ़िरक़े की तारीख़ी जड़ें सदरे इस्लाम के उस दिन से शुरु होती हैं कि जिस सूर ए बय्यनह की यह आयत नाज़िल हुई थी:

(.................................)
(सूर ए बय्यना आयत 7)
बेशक जो लोग ईमान लाये और अमले सालेह अंजाम दिया वही बेहतरीने मख़लूक़ हैं।
चुनाँचे जब यह आयत नाज़िल हुई तो रसूले ख़ुदा (स) ने अपना हाथ अली (अ) के शाने पर रखा उस वक़्त असहाब भी वहाँ मौजूद थे और आपने फ़रमाया:
(.....................................)

ऐ अली, तुम और तुम्हारे शिया बेहतरीने मख़लूक़ हैं।
इस आयत की तफ़सीर के ज़ैल में देखिये, तफ़सीरे तबरी (जामेउल बयान), दुर्रे मंसूर (तालीफ़, अल्लामा जलालुद्दीन सुयुती शाफ़ेई), तफ़सीरे रुहुल मआनी तालीफ़ आलूसी बग़दादी शाफ़ेई।

इसी वजह से यह फ़िरक़ा जो कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) की फ़िक़ह में उनका पैरोकोर होने की बेना पर उनकी तरफ़ मंसूब है। शिया फ़िरक़े का नाम से मशहूर हुआ।

2. शिया फ़िरक़ा बड़ी तादाद में ईरान, इराक़, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान, में ज़िन्दगी बसर करता है, इसी तरह उस की एक बड़ी तादाद खाड़ी देशों तुर्की, सीरिया (शाम), लेबनान, रूस और उससे अलग होने वाले बहुत से नये देशों में मौजूद हैं, नीज़ यह फ़िरक़ा यूरोपी मुल्कों जैसे इँगलैंड, फ़्रास, जर्मनी और अमेरिका, इसी तरह अफ़्रीक़ा के मुमालिक और मशरिक़ी एशिया में भी फ़ैला हुआ है, उन मक़ामात पर उनकी मस्जिदें और इल्मी, सक़ाफ़ती और समाजी मराकिज़ भी हैं।

3. इस फ़िरक़े के लोग अगरते मुख़्तलिफ़ मुल्कों, क़ौमों और रंग व नस्ल से ताअल्लुक़ रखते हैं लेकिन इसके बावजूद अपने दीगर मुसलमान भाईयों के साथ बड़े प्यार व मुहब्बत से रहते हैं और तमाम आसान या मुश्किल मैदानों में सच्चे दिल और इख़लास के साथ उनका तआवुन करते हैं और यह सब अल्लाह के इस फ़रमान पर अमल करते हुए इसे अंजाम देते हैं:

(..........................................)
(सूर ए हुजरात आयत 10)
मोमिनीन आपस में भाई भाई हैं।
या इस क़ौले ख़ुदा पर अमल करते हैं:
(.............................................)
नेकी और तक़वा में एक दूसरे की मदद करो।
(सूर ए मायदा आयत 2)
और अल्लाह के रसूल (अ) के इस क़ौल की पाबंदी करते हुए:
1. (.................................................)
(मुसनदे अहमद बिन हम्बल जिल्द 1 पेज 215)
मुसलमान आपस में एक दूसरे के लिये एक हाथ की तरह हैं।
या आपका यह क़ौल उन के लिये मशअले राह है:
2. (...................................................)
मुसलमान सब आपस में एक जिस्म की तरह हैं।
(अस सहीहुल बुख़ारी, जिल्द 1 किताबुल अदब पेज 27)
4. पूरी तारीख़े इस्लाम में दीने ख़ुदा और इस्लामी उम्मत के देफ़ाअ के सिलसिले में इस फ़िरक़े का एक अहम और वाज़ेह किरदार रहा है जैसे उसकी हुकुमतों, रियासतों ने इस्लामी सक़ाफ़त व तमद्दुन की हमेशा ख़िदमत की है, नीज़ इस फ़िरक़े के उलामा और दानिशवरों ने इस्लामी मीरास को ग़नी बनाने और बचाने के सिलसिले में मुख़्तलिफ़ इल्मी और तजरूबी मैदानों में जैसे हदीस, तफ़सीर, अक़ायद, फ़िक़ह, उसूल, अख़लाक़, देराया, रेजाल, फ़लसफ़ा, मौऐज़ा, हुकुमत, समाजियात, ज़बान व अदब बल्कि तिब व फ़िज़िक्स किमीया, रियाज़ियात, नुजूम और उसके अलावा बहुत हयातियाती उलूम के बारे में लाख़ों किताबें तहरीर करके इस सिलसिले में बहुत अहम किरदार अदा किया है बल्कि बहुत से उलूम की बुनियाद रखने वाले उलामा इसी फ़िरक़े से ताअल्लुक़ रखते हैं।[1]

5. शिया फ़िरक़ा मोअतक़ीद है कि ख़ुदा अहद व समद है, न उसने किसी को जना है और न उसे किसी ने जन्म दिया है और न ही कोई उसका हमसर है और उससे जिस्मानियत, जेहत, मकान, ज़मान, तग़य्युर, हरकत, सऊद व नुज़ूल वग़ैरह जैसी सिफ़तें जो उसकी सिफ़ाते कमाल व जलाल व जमाल के शायाने शान नही हैं, उनकी नफ़ी करता है।

और शिया यह अक़ीदा रखते हैं कि उसके अलावा कोई मअबूद नही, हुक्म और तशरीअ (शरीयत के क़ानून बनाना) सिर्फ़ उसी के हाथ में है और हर तरह का शिर्क चाहे वह ख़फ़ी हो या जली एक अज़ीम ज़ुल्म और न बख़्शा जाने वाला गुनाह है।

और शियों ने यह अक़ायद: अक़्ले मोहकम (सालिम) से अख़्ज़ किये है, जिनकी ताईद व तसदीक़ किताबे ख़ुदा और सुन्नते शरीफ़ा से भी होती है।

और शियों ने अपने अक़ायद के मैदान में उन हदीसों पर तकिया नही किया है जिन में इसराईलियात (जाली तौरेत और इंजील) और मजूसीयत की घड़ी हुई बातों की आमेज़िश है, जिन्होने अल्लाह तआला को इंसान की तरह माना है और वह उसकी तशबीह मख़लूक़ से देते हैं या फ़िर उसकी तरफ़ ज़ुल्म व जौर और लग़व व अबस जैसे अफ़आल की निस्बत देते हैं, हालाँकि अल्लाह तआला उन तमाम बातों से निहायत बुलंद व बरतर है या यह लोग ख़ुदा के पाक व पाक़ीज़ा मासूम नबियों की तरफ़ बुराईयों और कबीह बातों की निस्बत देते हैं।

6. शिया अक़ीदा रखते हैं कि ख़ुदा आदिल व हकीम है और उसने अदल व हिकमत से ख़ल्क़ किया है, चाहे वह जमाद हो या नबात, हैवान हो या इंसान, आसमान हो या ज़मीन, उसने कोई शय अबस नही ख़ल्क़ की है, क्योकि अबस (फ़ुज़ूल या बेकार होना) न तंहा उसके अदल व हिकमत के मनाफ़ी है बल्कि उसकी उलूहीयत से भी मनाफ़ी है जिसका लाज़िमा है कि खु़दा वंदे आलम के लिये तमाम कमालात का इस्बात किया जाये और उससे हर क़िस्म के नक़्स और कमी नफ़ी की जाये।

7. शिया यह अक़ीदा रखते हैं कि ख़ुदा वंदे आलम ने अदल व हिकमत के साथ इब्तेदाए ख़िलक़त से ही उसकी तरफ़ अंबिया और रसूलों को मासूम बना कर भेजा और फिर उन्हे वसीअ इल्म से आरास्ता किया जो वही के ज़रिये अल्लाह की जानिब से उन्हे अता किया गया और यह सब कुछ बनी आदम की हिदायत और उसे उसके गुमशुदा कमाल तक पहुचाने के लिये था ता कि उसके ज़रिये से ऐसी ताअत की तरफ़ भी उसकी रहनुमाई हो जाये जो उसे जन्नती बनाने के साथ साथ परवरदिगार की ख़ुशनूदी और उसकी रहमत का मुसतहिक़ क़रार दे और उन अंबिया व मुरसलीन के दरमियान आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा और हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा (स) सबसे मशहूर हैं जिनका ज़िक्र क़ुरआने मजीद में आया है या जिन के असमा और हालात हदीसों में बयान हुए हैं।
8. शियों का अक़ीदा है कि जो अल्लाह की इताअत करे, उसके अवामिर को नाफ़िज़ करे और ज़िन्दगी के हर शोअबे में उसके क़वानीन पर अमल करे वह निजात याफ़ता और कामयाब है और वही मदह व सवाब का हक़दार है, चाहे वह हबशी ग़ुलाम ही क्यो न हो और जिसने अल्लाह की नाफ़रमानी की और उसके अवामिर को न पहचाना और अल्लाह के अहकाम के बजाए दूसरों के अहकाम के बंधन में बंध गया, वह मज़म्मत, हलाक शुदा और घाटा उठाने वालों में से है, चाहे वह क़रशी सैयद ही क्यो न हो जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीसे शरीफ़ में आया है।

शिया अक़ीदा रखते हैं कि सवाब व सज़ा मिलने की जगह क़यामत का दिन है। जिस दिन हिसाब व किताब, मीज़ान व जन्नत व जहन्नम सबके सामने होगें और यह मरहला बरज़ख़ और आलमे क़ब्र के बाद होगा, नीज़ अक़ीद ए तनासुख़ जिसके मुनकेरीने क़यानत क़ायल हैं, उसको शिया बातिल क़रार देते हैं क्योकि अक़ीद ए तनासुख़ से क़ुरआने करीम और हदीसे पाक की तकज़ीब लाज़िम आती है।

9. शिया अक़ीदा रखते हैं कि अंबिया व मुरसलीन की आख़िरी फ़र्द और उन सबसे अफ़ज़ल नबी हज़रत मुहम्मद बिन अबदुल्लाद बिन अब्दुल मुत्तलिब हैं, जिन्हे ख़ुदा वंदे आलम ने हर ख़ता व लग़जिश से महफ़ूज़ रखा और हर गुनाहे सग़ीरा व कबीरा से मासूम क़रार दिया है चाहे वह क़बले नबुव्वत हो या बादे नबुव्वत, तबलीग़ का मरहला हो या कोई और काम हो और उनके ऊपर क़ुरआने करीम नाज़िल किया ता कि वह इंसानी ज़िन्दगी के लिये एक हमेशा बाक़ी रहने वाले क़ानून और दस्तूरुल अमल क़रार पाये। पस रसूले इस्लाम (स) ने रिसालत की तबलीग़ की और अमानत व सदाक़त व इख़लास के साथ लोगों तक पहुचा दिया और इस अहम और क़ीमती रास्ते में हर मुम्किन कोशिश की, शिया हज़रात के यहाँ रसूले इस्लाम की शख़्सियत, आपके ख़ुसूसियात, मोजिज़ात और आपके हालात से मुतअल्लिक़ सैकड़ों किताबें मौजूद हैं।

बतौरे नमूना देखिये: किताब अल इरशाद तालीफ़ शेख मुफ़ीद, आलामुल वरा, आलामुल होदा, तालीफ़ तबरसी, मौसूआ (मोअजम) बिहारुल अनवार, तालीफ़ अल्लामा मजलिसी और मौजूदा दौर की मौसूअतुर रसूलिल मुस्तफ़ा, तालीफ़ मोहसिन ख़ातेमी।

10. शियो का अक़ीदा है कि क़ुरआने करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) पर हज़रत जिबरईल (अ) के ज़रिये नाज़िल हुआ, जिसे कुछ बुज़ुर्ग सहाबा ने रसूले इस्लाम (स) के दौर में आपके हुक्म से जमा और मुरत्तब किया। जिन में सरे फ़ेहरिस्त हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) है, इन हज़रात ने बड़ी मेहनत और मशक़्क़त के साथ उसको लफ़्ज़ व लफ़्ज़ याद किया और उसके हुरुफ़ व कलेमात नीज़ सूरह व आयात की तादाद भी मुशख़्ख़स व मुअय्यन कर दी, इस तरह यह एक के बाद दूसरी नस्ल तक मुन्तक़िल होता आ रहा है और आज मुसलमानों के तमाम फ़िरक़े रात व दिन उसकी तिलावत करते हैं, न उसमें कोई ज़ियादती हुई और न ही कोई कमी, यह हर क़िस्म की तहरीफ़ व तबदीली से महफ़ूज़ है, शिया हज़रात के यहाँ इस बारे में भी मुतअद्दिद छोटी और बड़ी किताबें मौजूद हैं।[2]

11. शिया अक़ीदा रखते हैं कि जब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) की वफ़ात का वक़्त क़रीब हुआ तो आपने हज़रत अली (अ) को तमाम मुसलमानों की रहबरी के लिये अपना ख़लीफ़ा और लोगों के लिये इमाम के तौर पर मंसूब किया ता कि अली (अ) उनकी सियासी क़यादतऔर फ़िक्री रहनुमाई फ़रमाएँ और उनकी मुश्किलों को हल करें, उनके नुफ़ूस का तज़किया करें और उनकी तरबीयत करें और यह सब ख़ुदा के हुक्म से मक़ामे ग़दीरे ख़ुम में रसूल (स) की हयात के आख़िरी दौर और आख़िर हज के बाद, उन मुसलमान हाजियों के दूर तक फैले मजमें अंजाम पाया, जो आपके साथ उसी वक़्त हज करके वापस आ रहे थे, जिनकी तादाद बाज़ रिवायात के मुताबिक़ एक लाख तक पहुचती है और उस मुनासिबत पर कई आयते नाज़िल हुईं।[3]

उसके बाद नबी ए अकरम (स) ने अली (अ) के हाथों पर लोगों से बैअत तलब की, चुनाँचे तमाम लोगों ने बैअत की और उन बैअत करने वालों में सबसे आगे मुहाजेरीन व अंसार के बुज़ुर्ग और मशहूर सहाबा थे मज़ीद तफ़सील के लिये देखिये: किताब अल ग़दीर, जिस में अल्लामा अमीनी ने मुसलमानों के तफ़सीरी और तारीख़ी मसादिर व मआख़िज़ से इस वाक़ेया को नक़्ल किया है।