इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र
 



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जीने के अधिकार को, मुनष्य का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण अधिकार कहा जा सकता है। मूल रूप से अन्य सभी मानवाधिकार, उसी समय प्राप्त हो सकते हैं जब मनुष्य के जीने के



अधिकार पर ध्यान दिया गया हो। इसी लिए इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र में यह सिद्धान्त, इस्लाम धर्म की शिक्षाओं के अनुसार पेश किया गया है और उसके दूसरे



अनुच्छेद में कहा गया हैः जीवन ईश्वर का उपहार और ऐसा अधिकार है जिसे हर मनुष्य के लिए निश्चित बनाया गया है और सारे लोगों और समाजों तथा सरकारों का यह कर्तव्य है कि



वह इस अधिकार की रक्षा करें। इस्लाम की दृष्टि से हर मनुष्य का जीने का अधिकार इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि क़ुरआने मजीद ने इस अधिकार के



हनन को सारे मनुष्यों की हत्या के समान कहा है। इसी लिए इस्लाम ने युद्ध व रक्तपात को अस्वीकारीय बताया है और केवल विशेष परिस्थितियों में अपने देश,



धर्म या पीड़ितों की रक्षा के लिए युद्ध को सही ठहराया है किंतु इस प्रकार के युद्धों में भी आम नागरिकों, बंदियों, घायलों बल्कि पशुओं और पेड़ पौधों के अधिकारों पर ध्यान देना भी



आवश्यक बताया गया है। इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र के तीसरे अनुच्छेद में इन सभी विषयों की ओर संकेत किया गया है। इस अनुच्छेद में युद्ध के दौरान आम नागरिकों की रक्षा,



घायलों के उपचार, बंदियों पर ध्यान देने और पेड़ों को काटने से बचने, खेतों की सुरक्षा और इमारतों को गिराने से बचने जैसे विषयों पर बल दिया गया है।



इसके साथ ही इस्लाम में पर्यावरण की रक्षा पर भी बहुत ध्यान दिया गया है और उसकी रक्षा के लिए बहुत सी सिफारिशें भी हैं।



कुरआने मजीद में इस विषय की ओर संकेत किया गया है और ईश्वर ने, धरती और उसके उपहारों से लाभ उठाने की मनुष्य को अनुमति दी है इस शर्त के साथ कि मनुष्य इन उपहारों



की रक्षा करे और अपव्यय के मार्ग पर न चले।



मानव सम्मान वह अन्य विषय पर जिस पर इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र में ध्यान दिया गया है।



इस्लाम, मानव सम्मान और उसकी प्रतिष्ठा को अत्याधिक महत्वपूर्ण और मूल्यवान समझता है। इस धर्म के अनुसार, मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना और धरती पर उसका उत्तराधिकारी है।



क़ुरआने मजीद के सूरए इसरा की आयत नंबर ७० में हम मानव सम्मान के बारे में पढ़ते हैः हम ने आदम की संतान को सम्मान दिया,



और उन्हें जल थल में सवारियों द्वारा उठाया और विभिन्न प्रकार की पवित्र अजीविकाओं में से उन्हें अजीविका दी और उन्हें अपनी बहुत सी रचनाओं से श्रेष्ठ बनाया।



इस प्रकार से इस्लाम ने यह स्पष्ट किया कि मनुष्य, भलाई द्वारा अपना सम्मान बढ़ा सकते हैं और इसी प्रकार भष्टाचार और पापों द्वारा अपना सम्मान गंवा भी सकते हैं।



प्रत्येक दशा में मानव सम्मान, उनके मध्य समानता के सिद्धान्त का आधार है।



समानता एक ऐसा इस्लामी सिद्धान्त है जिसका इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र में वर्णन किया गया है। इस घोषणापत्र के पहले अनुच्छेद में कहा गया हैः सामूहिक रूप से मानव समाज का



हर सदस्य, एक परिवार का भाग है जिन्हें ईश्वर की उपासना और आदम की संतान होने के कारण एक समान समझा जाता है।



सारे लोग, मानवीय सम्मान और कर्तव्यों की दृष्टि से समान हैं बिना किसी जाति, वर्ण, भाषा, लिंग, धर्म या विचारधारा या सामाजिक स्थान के अंतर्गत भेदभाव के।



इस आधार पर मानवता में सारे लोग एक समान हैं और जो विषय उनके मध्य एक दूसरे से श्रेष्ठता का कारण बनता है वह पापों से बचना और ईश्वर से निकटता है।



इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र के इस अनुच्छेद का वर्णन करते हुए कहा गया है कि सारे लोग, ईश्वर के परिवार की भांति हैं और उनमें से ईश्वर के



निकट सबसे अधिक प्रिय वही है जो अन्य मनुष्यों के लिए सब से अधिक लाभदायक होता है और किसी को भी किसी पर श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है



और यदि है तो उसका मापदंड ईश्वर से भय और पापों से दूरी ही है जो निश्चित रूप से एक आध्यात्मिक विशेषता है और ईश्वर उसका प्रतिफल देता है।



इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र का छठां अनुच्छेद, महिल व पुरुष के मध्य समानता पर बल देता है इसमें कहा गया हैः मानवीय दृष्टि से महिला व पुरुष समान हैं



और जिस प्रकार से महिलाओं के कर्तव्य हैं उसी प्रकार उन्हें अधिकार भी दिये गये हैं और महिला को, एक स्वाधीन सामाजिक व आर्थिक व्यक्तित्व वाला सदस्य समझा गया है।



जैसाकि हम देखते हैं इस्लाम में महिलाओं के लिए बहुत से अधिकार रखे गये हैं और उन्हें व्यक्तित्व की दृष्टि से पुरुषों की भांति समझा गया है।



किंतु यह भी निश्चित है कि महिला और पुरुष के मध्य मौजूद कुछ अंतरों के कारण कुछ अधिकारों और कर्तव्यों में भी अंतर पाया जाता है।



जैसा कि इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र के इसी अनुच्छेद में पुरुष को परिवार की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला तथा रक्षक बताया गया है।



क़ानून की दृष्टि में समानता ऐसा अधिकार है जिस पर इस्लाम ने बल दिया है।



इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र के अनुच्छेद नंबर १९ में धर्म व क़ानून की नज़र में सब को समान बताया गया है और कहा गया हैः न्यायालय का द्वार खटखटाना और उसकी शरण में



जाना ऐसा अधिकार है जो सब से लिए निश्चित है। इस अनुच्छेद में अपराध और दंड के बारे में निर्णय का एकमात्र स्रोत धर्म को बताया गया है।



दूसरे शब्दों में इस्लाम के नियम, अपराध की क़िस्म और उस पर दंड का निर्धारण करते हैं ताकि इसमें मानवीय गलती का स्थान न रहे।



इसी के साथ, इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र में इस विषय पर भी बल दिया गया है कि आरोपी, निर्दोष होता है यहां तक कि उसका दोष,



न्यायिक मार्गों द्वारा तथा सफाई देने की सुविधा के बाद सिद्ध हो जाए। इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र के अनुच्छेद क्रमांक २० में भी बल दिया गया है कि किसी भी व्यक्ति की



गिरफतारी केवल नियमों के अनुसार होनी चाहिए। इस अनुच्छेद में हर प्रकार की मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना से मना किया गया है।