इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र
 



1

मानवाधिकार उन अधिकारों में से है जो मानवीय प्रवृत्ति का अनिवार्य अंश है। मानवाधिकार का स्थान, सरकारों की सत्ता से ऊपर होता है और विश्व की सभी सरकारों को उसका सम्मान करना चाहिए।



संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों ने वर्ष १९४८ में विश्व मानवाधिकार घोषणापत्र को तीस अनुच्छेदों के साथ पारित किया। पश्चिमी संस्कृति और लेबरल मान्यताओं के



आधार पर पारित इस घोषणापत्र का आरंभ से ही विरोध होने लगा था और समय बीतने के साथ ही साथ, इस विरोध में भी वृद्धि हुई क्योंकि इस घोषणापत्र के बहुत से



अनुच्छेद विश्व के विभिन्न राष्ट्रों की मान्यताओं और संस्कृति से मेल नहीं खाते। मुसलमान बुद्धिजीवियों के अनुसार, यद्यपि इस घोषणापत्र के बहुत से अनुच्छेद उचित हैं किंतु उसके अधिकांश



अनुच्छेद अधूरे और अस्वीकारीय हैं। इसी लिए मुसलमान सरकारों और बुद्धिजीवियों ने एक ऐसे घोषणापत्र के संकलन का फैसला किया जो इस्लामी मानवाधिकार के आधार पर



हो और जिसे इस रूप में पूरे विश्व के सामने पेश किया जा सके। मानवाधिकारों पर ध्यान, पश्चिम के प्रचारों के विपरीत, पश्चिम से आंरभ नहीं हुआ बल्कि



इस्लाम ने अपने उदय के समय से ही, व्यापक मानवाधिकार का सिद्धान्त पेश किया है।



मनुष्य के मौलिक अधिकारों के संदर्भ में इस्लाम के विकसित दृष्टिकोणों के दायरे में इस्लामी कांफ्रेंस संगठन ने इस्लामी देशों के प्रतिनिधि के रूप में,



वर्ष १९७९ और १९८१ में इस संदर्भ में दो दस्तावेज़ प्रकाशित किए। पांच अगस्त वर्ष १९९० को ओआईसी के विदेशमंत्रियों की १९वीं बैठक में जो क़ाहिरा में आयोजित हुई,



इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र पारित हुआ और इस दिन को मानवाधिकार और मानवीय सम्मान दिवस घोषित किया गया। इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र में यद्यपि,



मानवाधिकार के संदर्भ में इस्लाम के समस्त दृष्टिकोणों का वर्णन नहीं किया गया है किंतु इसके बावजूद यह घोषणापत्र, मानवाधिकारों के संदर्भ में पश्चिमी दृष्टिकोण की तुलना में



इस्लामी शिक्षाओं की श्रेष्ठता को भलीभांति स्पष्ट करता है। इस घोषणापत्र का संकलन करने वालों ने इसकी भूमिका में मनुष्य के बारे में इस्लाम की कुछ शिक्षाओं का वर्णन किया गया है।



इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र क़ुरआन मजीद के सूरए हुजोरात की आयत नंबर १३ से आरंभ होता है कि जिसमें कहा गया हैः हे लोगो!



हमने तुम लोगों को एक पुरुष और एक महिला से पैदा किया और तुम्हें जातियों और समुदायों में बांट दिया ताकि तुम एक दूसरे को पहचान सको।



निश्चित रूप में तुम लोगों में ईश्वर के निकट सब से अधिक सम्मानीय वह है जो सब से अधिक पापों से बचने वाला हो।



इस घोषणापत्र के आरंभ में इस बात की ओर भी संकेत किया गया है कि इस्लाम में ईश्वर के निकट मनुष्य का क्या स्थान है और यह कि मनुष्य धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि है।



इसके बाद एकेश्वरवाद और एक ही ईश्वर की उपासना का विषय प्रस्तुत किया गया है कि जिसका अनिवार्य परिणाम किसी अन्य के सामने शीश नवाने से दूरी है।



अन्य लोगों की उपासना को नकारना, मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता की आधारशिला है। इसी प्रकार इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र की



भूमिका में मानव सभ्यता की रक्षा के लिए आस्था व आध्यात्म को आवश्यक बताया गया है और बल दिया गया है कि इस्लाम में आध्यात्म और संसारिक विषयों को एक साथ मिला कर



पेश किया गया है।



इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र की भूमिका में जिस अंतिम विषय पर बल दिया गया है वह यह है कि मनुष्य के मौलिक अधिकार



और स्वतंत्रता इस्लाम का अंश है और किसी को भी यह अधिकार प्राप्त नहीं है कि वह उनका हनन करे।



इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र को मानवाधिकार घोषणापत्र से अलग करने वाली प्रमुख विशेषता मनुष्य के आध्यात्मिक आयाम पर बल दिया जाना है।



क्योंकि इस्लाम मनुष्य के कल्याण के लिए उसके आध्यात्मिक आयाम के साथ ही उसके सांसारिक आयाम पर भी ध्यान देता है।



इसी आधार पर इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र के बहुत से अनुच्छेदों का आधार इस्लाम की मानवीय शिक्षाएं और मानवीय सम्मान है।



इस घोषणापत्र ने जिन विषयों पर बल दिया है उनमें से एक अधिकार, आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्ति तथा आध्यात्मिक प्रशिक्षण का अधिकार है ताकि इस प्रकार उसे परलोक में भी सफलता प्राप्त हो।



इस्लाम की दृष्टि में इस संसार में मनुष्य के जीवन की शैली, परलोक में उसकी जीवन शैली का निर्धारण करती है।