संभव वस्तु और कारक
 



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अर्थात प्रयोगशाला में ज्ञान का पता नहीं लगाया जा सकता और न ही आत्मा को सिद्ध किया जा सकता है।



आत्मा जो भौतिकता से परे है उस की उपस्थिति का सब बड़ा प्रमाण सच्चे सपनें हैं और बहुत से महापुरुषों और तपस्वियों तथा ईश्वरीय दूतों द्वारा पेश



किये गये चमत्कार हैं जो साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं हैं यह ईश्वरीय दूतों के चमत्कार ऐतिहासिक रूप से सिद्ध हैं और इन्हें कहानियां नहीं समझा जा सकता है।



इस प्रकार से अभौतिक अस्तित्व की उपस्थिति सिद्ध होती है और इस प्रकार से ईश्वर के बारे में भौतिक विचार धारा का तर्क निराधार हो जाता है।



भौतिक विचार धारा का दूसरा सिद्धान्त यह है कि पदार्थ सदैव से था और सदैव रहेगा और उसे पैदा नहीं किया जा सकता



और उसे किसी कारक की आवश्यकता नहीं है और वास्तव में वही स्वयंभू अस्तित्व है।



इस सिद्धान्त में पदार्थ के सदैव से होने और अनन्तकाल तक रहने पर बल दिया गया है और उसके बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है कि पदार्थ की



रचना नहीं की जा सकती अर्थात किसी ने उसकी रचना नहीं की है वह स्वंय ही अस्तित्व में आया है किंतु पहली बात तो यह है कि



प्रयोग व विज्ञान की दृष्टि से पदार्थ का ऐसा होना सिद्ध ही नहीं है क्योंकि प्रयोग की पहुंच सीमित होती है और प्रयोग द्वारा किसी भी वस्तु के लिए यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि



वह अनन्त तक रहने वाली है अर्थात किसी भी प्रकार का प्रयोग, स्थान व काल की दृष्टि से से ब्रह्मांड के अनन्त होने को सिद्ध नहीं कर सकता।



दूसरी बात यह है कि यदि मान भी लिया जाए कि पदार्थ अन्नत काल तक रहने वाला है तो भी इसका अर्थ यह नहीं होगा कि उसे किसी पैदा करने वाले



की आवश्यकता नहीं है जैसाकि एक अनन्तकालीन व्यवस्था के गतिशील होने को यदि स्वीकार किया जाए तो उस व्यवस्था को अनन्तकाल की दशा तक पहुंचाने के लिए



ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस प्रकार से यह नहीं माना जा सकता है कि पदार्थ के अनन्तकालिक होने की दशा, उसे उस दशा में पहुंचाने वाली



ऊर्जा की आवश्यकता से ही मुक्त कर देती है और यदि यह भी मान लिया जाए कि पदार्थ की किसी ने रचना नहीं की है तो भी इस का अर्थ कदापि यह नहीं होता कि पदार्थ इस



कारण स्वंयभू अस्तित्व वाला हो जाएगा क्योंकि पिछली चर्चाओं में हम यह सिद्ध कर चुके हैं कि पदार्थ किसी भी दशा में स्वंयंभू अस्तित्व नहीं हो सकता।