क़यामत पर आस्था का महत्व
 



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सरल शब्दों में हम मनुष्य की परिपूर्णता के अर्थ इस प्रकार से बता सकते हैं कि मनुष्य की परिपूर्णता उस प्रकार बनना है जैसा कि उसे बनाने वाले ने चाहा है।

निश्चित रूप से हर रचनाकार जब कोई रचना बनाता है तो उसका अंतिम रूप उसके मन में होता है और वह अपने मन में उसी सीमा तक अपनी रचना को पहुचांने का प्रयास करता है।

उदाहरण स्वरूप यदि एक चित्रकार एक चित्र बनाना चाहता है तो उसके लिए विचार करता है,

कैनवस पर कुछ लकीरे खींचता है और फिर आकृति उभरने लगती है किंतु इस रचना की परिपूर्णता यह है कि जो चित्र,

चित्रकार ने बनाना चाहा वह पूरी तरह से बन जाए उसमें हर वह रंग भर दिये जाएं जिसे चित्रकार भरना चाहता हो और फिर उसे अंतिम रूप दिये जाने के बाद प्रदर्शनी में रख दिया जाए।

किंतु आप एसे चित्र की कल्पना करें तो केवल कुछ लकीरों पर आधारित हो या फिर उसमें रंग न भरा हो तो वह कैसा होगा।

या आप एक पौधे की कल्पना करें जिसे एक बाग़बान लगाता है उसकी इच्छा यह होती है कि यह पौधा बड़ा वृक्ष बने,

उसकी छाया से लोग लाभ उठाएं उसकी डालियां उसके फलों से लदीं रहें और फिर उसके फलों से अन्य पौधे लगाए जाएं किंतु यदि वह पौधा, पौधा ही रह जाए तो क्या होगा?

उसमें फल न लगें तो क्या होगा?

मनुष्य की स्थिति इससे भिन्न है, ईश्वर ने उसकी आरंभिक रचना की और फिर उसे एक सीमा तक एसा अधिकार दिया जिसके द्वारा वह अपनी परिपूर्णता की यात्रा को अपनी शक्ति

से जारी रखे अर्थात ईश्वर ने चाहा कि मनुष्य रूप यह पौधा, थोड़ी दूर पर मौजूद जलाशय तक स्वंय अपनी जड़ें फैला कर सींचाई की व्यवस्था करे

और ईश्वर की महान रचना के रूप में अपने चित्र में स्वंय रंग भरे और यह शक्ति विशेष रूप से ईश्वर ने मनुष्य को दी है। परिपूर्णता यही है ।

अर्थात मनुष्य पूर्ण रूप से मनुष्य बनी। मनुष्य की सारी विशेषताओं के साथ और फिर उस गतंव्य तक पहुंचे जहां तक उसे उसके रचनाकार ने पहुंचाना चाहा

अर्थात वह रूप धारण करे जो उसे उसके रचनाकार ने देना चाहा है ।

इस संदर्भ में जैसा कि स्पष्ट है सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य को अपने गंतव्य की पहचान होनी चाहिए उसे पता होना चाहिए के उसे क्यों बनाया गया है क्योंकि

परिपूर्णता की ओर यात्रा, परिपूर्णता के गंतव्य के प्रति मनुष्य के ज्ञान पर निर्भर होती है जो लोग इसी संसार को सब कुछ समझते हैं उनकी यह यात्रा इस प्रकार से होती है कि वे

हर वस्तु को इसी संसार के लिए और इसी संसार में मानते हैं इस प्रकार उनके सारे काम एसे होते हैं जिनका उद्देश्य संसारिक सुख भोग होता है

किंतु कुछ लोग एसे होते हैं जो यह समझते हैं कि इस संसार के बाद भी कोई संसार है जहां हिसाब किताब होगा और कर्मों का फल मिलेगा इसी लिए उनका काम एसा होता है

जिसमें संसारिक साधनों की प्राप्ति के साथ ही परलोक की व्यवस्था के लिए प्रयास की झलक भी होती है और परलोक के लिए कर्म का प्रयास भी उतना होता है

जितना उसमें परलोक का विश्वास होता है या दूसरे शब्दों में उसे लिए परिपूर्णता का अर्थ जितना स्पष्ट होता है।

आज की चर्चा के मुख्य बिन्दु

• जीवन की विभिन्न गतिविधियों का कारण, इच्छाओं की पूर्ति, लक्ष्यों और उद्देश्यों तक पहुंचना अर्थात अंतिम व निर्णायक परिपूर्णता तक पहुंचना है और

विभिन्न कामों की शैली व मात्रा तथा उन की दिशा वास्तव में उन लक्ष्यों की पहचान पर निर्भर होती है जिन तक पहुंचने का प्रयास किया जाता है।

• ईश्वर ने मनुष्य की आरंभिक रचना की और फिर उसे एक सीमा तक एसा अधिकार दिया जिसके द्वारा वह अपनी परिपूर्णता की

यात्रा को अपनी शक्ति से जारी रखे और इस यात्रा और फिर गंतव्य तक पहुंचने के लिए उसे आवश्यक साधन भी दिये किंतु इसके लिए शर्त यह है

कि मनुष्य का बोध इतना विकसित हो जिससे वह अपने गतंव्य और उस के लिए की जाने वाली यात्रा में आवश्यक साधनों का ज्ञान रखे।