पाप या ग़लती का अज्ञानता व सूझबूझ से गहरा संबंध
 



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वास्तव में पाप या अपराध या गलती का अज्ञानता व सूझबूझ से गहरा संबंध है। उदाहरण स्वरूप एक अपनी आर्थिक समस्याओं के निवारण के लिए परिश्रम करने के स्थान पर चोरी की योजना

बनाता है। अपने हिसाब से उसकी योजना पूरी होती है और वह हर पहलु पर ध्यान देते हुए कार्यवाही करता है और अपनी पहचान छुपाने की भी व्यवस्था करता है किंतु

फिर भी वह पकड़ा जाता है क्योंकि उसे इस बात का ज्ञान नहीं था कि उदाहरण स्वरूप उस घर की निगरानी की जा रही है और उदाहरण स्वरूप सामने वाले घर में कई सुरक्षा

कर्मी रात दिन उस घर पर नज़र रखे हैं जिसमें वह चोरी करना चाहता है। यदि उसे इस बात का ज्ञान होता तो वह कदापि उस घर में चोरी न करता।

इसके अतिरिक्त यदि उसमें सूझबूझ होती और बुद्धि पूरी होती तो वह चोरी के परिणामों पर ध्यान देता और दूरदर्शिता से सोचते हुए यह काम न करता।

इसी लिए जिन लोगों को अपराध की बुराईयों और परिणामों का भलीभांति ज्ञान होता है वे कभी भी अपराध नहीं करते किंतु जिन लोगों का ज्ञान कम होता है और

मूर्खों की भांति अपनी बनायी योजना से आश्वस्त होकर सोचते हैं कि वे पकड़े नहीं जाएगें वही अपराध करते हैं और पकड़े जाते हैं।

इस प्रकार से यह स्पष्ट हुआ कि अपराध की बुराई और परिणाम का यदि किसी को सही रूप से पूरी तरह से ज्ञान हो तो वह अपराध नहीं कर सकता।

बिल्कुल यही दशा ईश्वरीय दूतों की होती है। चूंकि ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने की योग्यता के कारण उनका ज्ञान पूर्ण और वे विलक्षण बुद्धि के स्वामी

तथा दूरदर्शिता व सूझबूझ की चरम सीमा पर होते हैं इस लिए वे पाप जो वास्तव में धार्मिक अपराध है नहीं करते क्योंकि उन्हें पाप की बुराई और उसके परिणाम का पूर्ण रूप से ज्ञान होता है।

यह यह ज्ञान वास्तव में उनकी उन्हीं विशेष क्षमताओं व योग्यताओं के कारण होता है जिसके आधार पर उन्हें ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने का पात्र समझा जाता है।