इत्तेहाद अस्रे हाज़िर की अहम ज़रूरत
 



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अगर वह “बदा” “तक़य्या” “मुता” “तहरीफ़े क़ुरआन” वग़ैरा पर एतिराज़ करते हैं, उन्हे बुरा समझते हैं उनके हवाले से हमारे क़ुलूब को मजरूह करते हैं,



हम पर तोहमत लगाते हैं तो उसका इलाज ये है कि हम उन्हें धुतकार कर भगा दें, नही बल्कि उसका



इलाज ये है कि हम उन्हे बतायें कि भाई जैसा आप समझ रहें हैं वैसा नही है। हक़ीक़त कुछ और है।



वह हम पर उन अक़ाएद की वजह से इल्ज़ाम व इत्तेहाम लगाते हैं मगर क्यों ? इसलिये कि उन्होनें उसे समझा नही है,



हम में से किसी ने उन्हे बताया नही है वह अपने ज़ामे नाक़िस पर फ़ैसला कर लेते हैं कि ये सब बातिल है,



मगर जब मज़बूत और मुतक़न दलाएल से सामना होता है तो उनमें से बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो क़ुबूल करते हैं और हक़ परस्तों के क़ाफ़िले के सफ़ीर बन जाते हैं।



जब सारे इस्लामी फ़िर्क़े एक जगह पर जमा होगें और ख़ुशगवार और दोस्ताना फ़िज़ा में मुबाहिसा और मुनाज़िरा करेगें तो यक़ीनन उनके ऊपर बहुत सी बातें आशकार होगीं,



जिन्हे वह उससे पहले तक नही जानते थे, ये अम्र उनकी फ़िक्र व नज़र में तबदीली या नर्मी व शिद्दत का सबब होगी।



बहुत मुम्किन है कि नज़रियों का तसादुम नाब और ख़ालिस इस्लाम का चेहरा लोगों के सामने पेश कर दे।



वह इस्लाम जिसे आज से चौदह सौ साल क़ब्ल आँ हज़रत (स) ने पेश किया था तो दुनिया ने देखा कि ख़ूख़ाँर दरिन्दा सिफ़त अरब,



जो इस्लाम से पहले दौलत, बदकारी, ज़ुल्म व सितम और क़त्ले आम का हरीस था। बाप दौलत बचाने के लिये अपने हाथों बेटी का गली दबा कर फ़ख्र से गर्दन उठाता था।



एक क़बीले का ऊँट दूसरे क़बीले के सरदार के हौज़ में एक घूँट पानी पी लेता था तो चालीस साल तक इंसानी ख़ून बरसता रहता था मगर तशफ़्फ़ी न होती।



क़त्ल पर सुकून न था क़ातिल मक़तूल का ख़ून पीता था। सीना चाक करके दिल व जिगर कच्चा चबाता था।



आँख, कान, नाक, हाथ, पैर काट कर हार बना कर पहनता था और ख़ुश होता था और देखने वाले उसकी मदह व ताज़ीम करते थे।



लेकिन यही अरब मुसलमान होकर इंसान बन जाता है। इस्लाम का नबी उजड़े मोहाजिर को मदीने के बसे हुए अंसारी का भाई बनाते हैं तो दौलत का पुजारी अरब,



जो दौलत के लिये बेटी को ज़िन्दा दफ़न करता था, आज इतना बदला हुआ नज़र आता है कि मालदार अंसारी लुटे हुए मोहाजिर को अपनी आधी जायदाद की पेशकश करता है।



सोचिये इस्लाम कितना बड़ा इंकेलाब लाया था। इस्लाम ने हुकूमत के बजाय इंसानी किरदार की तामीर की थी,



इस्लाम का तरीक़े कार बुराई मिटाने में बुरे को मिटाना न था बल्कि बुरे को अछ्छा बना कर बुराई मिटाई जा रही थी लिहाज़ा तल्वार की ज़रूरत न थी,



सीरत की ज़रूरत थी और इस्लाम यूँ इन्क़िलाब सा ला रहा था कि दिमाग़ वही थे मगर अंदाज़े फ़िक्र बदल गया था। आँखे वही थी मगर अंदाज़ बदल गया था।



ज़बान वही थी मगर गुफ़्तार बदल गयी थी। क़दम वही थे मगर गफ़्तार बदल गयी थी। दिल वही थे मगर जज़्बात व मोहब्बत व नफ़रत के सोते और धारे बदल गये थे।



इस्लाम ने इंसान को इंसान के बराबर कर दिया था ।



क्या आज के मुसलमान के दरमियान वही उख़ुव्वत और बिरादरी का रिश्ता क़ायम नही हो सकता जो आँ हज़रत (स) ने मुसलमानों के दरमियान क़ायम किया था ?



क्या इस राह की शुरुआत इत्तेहाद और वहदत व हमदिली की दावत के ज़रिये मुम्किन है? या इत्तेहाद के अलावा कोई और



रास्ता है जो इस मक़सद की तकमील में मोआविन साबित हो सकता हो। उसके ज़रिये से दावत दी जाये।?



लिहाज़ा मालूम हुआ कि आज भी इस दुखी दुनिया का इलाज इस्लाम ही है और सिर्फ़ मोहम्मद (स) का इस्लाम जिसने कल दरिन्दा सिफ़त अरब को आदमी बनाया था



आज वह ख़ूँख़ार यूरोप व अमरीका को आदमी बना सकता है मगर कायनात का सबसे अज़ीम नुक़सान ये है कि वह इस्लाम आज 73 फ़िरक़ों में बटा हुआ है।



इस्लाम दूसरों के दर्द का दरमान कैसे बने जो मुसलमानो का दर्दे सर बना हुआ है।



अफ़सोस मुसलमान कल के जाहिल अरब और आज के ख़ूँख़ार यूरोप और अमरीका की तरह दरिन्दा सिफ़त है इस पर फ़रेब ये है कि



इस्लाम की तारीख़ में एक फ़िरक़े का इस्लाम दूसरे फ़िरक़े के इस्लाम के लिये ख़ूँख़ार दरिन्दा सिफ़त नज़र आ रहा है।



लिहाज़ा आज अगर ऐसी कोई कोशिश की जाती है जिससे वह हक़ीक़ी और इस्लामी मालूम हो सके जो आलमे इंसानियत का निजात दहिन्दा था और है और अपने



निजात दहिन्दा होने का कामयाब इम्तेहान अरब के अहदे जाहेलियत में दे चुका है तो ऐसी कोशिश तख़फ़ीफ़े असलहा की क़ाबिले क़द्र कोशिश से हज़ार गुना ज़्यादा ममदूह है औऱ



फ़लाहे इंसानियत के लिये इस ज़हरीले अहद में तिरयाक़ की हैसियत रखती है ।



मगर ये इस्लाम मालूम न होगा जब तक इस्लाम के तमाम फ़िरक़ों की छान फटक न होगी। तहक़ीक़े मज़हब की इस मुफ़ीद और



तिरयाक़ी कोशिश को जब “रवादारी” की सूली पर फाँसी दी जाती है



और सच्चे इस्लाम को उजागर करने को जब “फ़िरक़ा वारियत” फैलाने का मज़मूम इल्ज़ाम दिया जाता है तो सिसकती



इंसानियत की आहें बुलंद होती हैं मगर कौन दिल है जो इन आहों को सुनें। आह इंसानियत जो इंसानो के हाथों ज़िन्दा गोर है। काश तेरा हमदर्द जल्द ज़ुहूर करता।



लिहाज़ा गुज़िश्ता तमाम बातों के पेशे नज़र अस्रे हाज़िर में इत्तेहादे इस्लामी या इत्तेहाद बैनुल मुसलेमीन की



दावत देना या इसके तहक़्क़ुक़ के लिये क़दम उठाना एक निहायत ज़रूरी और मुसतहसन काम है।



इस लिहाज़ से और इस काम में पहल करने वाले इस कानफ़ेरेन्स के बानियान मुबारक बाद और शुक्रिया के मुसतहिक़ हैं।