इत्तेहाद अस्रे हाज़िर की अहम ज़रूरत
 



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सैय्यद एजाज़ हुसैन मूसवी

इत्तेहादे बैनुल मुसलेमीन अस्रे हाज़िर की सबसे बड़ी और अहम ज़रूरत है। जिससे कोई भी साहिबे अक़्ल व फ़हम इंकार नही कर सकता।



तरक़्क़ी के इस दौर में जहाँ दुनिया चाँद सितारों पर कमंदें डाल के उसे पूरी तरह से तसख़ीर करने के मंसूबे बना रही है,



बाज़ तंग नज़र और कोताह फ़िक्र मुसलमान उसी फ़ितना व फ़साद में ग़र्क़ रह कर दूसरे इंसानो के इरतेक़ा की राह में रख़ना अन्दाज़ी करने में मशग़ूल हैं



और मुसलसल उनकी रेशा दवानियाँ ज़ोर पकड़ती जा रही हैं। मुख़्तलिफ़ हीलों बहानों और हरबों के इस्तेमाल से वह पुराने हथियारों की रोग़न माला कर रहे हैं ताकि सीधे साधे,



सादा लौह मुसलमानों को राहे हक़, राहे मुस्तक़ीम और राहे निजात से दूर रख सकें। उनके पास नये दलाएल और एतिराज़ तो हैं नही,



लिहाज़ा उनही कोहना और फ़रसूदा बातों को नये लिबास से आरास्ता करके लोगों की बे इल्तेफ़ाती और बे तवज्जोही से फ़ायदा उठाने की फ़िक्र में है।



ज़रूरत इस बात की है कि जैसे जैसे फ़ितना परदाज़ों की दसिसा कारियों में तुन्दी और तेज़ी आ रही है वैसे वैसे हक़ परस्तों को अपनी रफ़्तार बढ़ानी होगी।



उन्हे भी ख़ुद को हर तरह से आरास्ता करना होगा ताकि वक़्ते ज़रूरत मुक़ाबले में उन्हे नाकामी का सामना न करना पड़े।



आज सिर्फ़ बाज़ नासमझ और नादान मुसलमान ही नही बल्कि दुनिया की बड़ी बड़ी हुकुमतें, ताक़तें,



शख़्सियतें इस बात के दरपै हैं कि मुसलमानों में किसी तरह से इत्तेफ़ाक़ और हमदिली की फ़िज़ा हमवार न होने पाये।



इस लिये कि ये उनके मंसूबों को अमली जामा पहनने से रोकने का बाइस होगा। इसी लिये वह इस अम्र के तहक़्क़ुक़ के लिये जान व माल या साज़िश व फ़ितना,



किसी भी तरह के हरबे इस्तेमाल करने से बाज़ नही आते।



और मुसलमानों की ये सादा लौही है कि वह उन्हे अपना दोस्त व हमदम समझते हैं जिनसे दोस्ती के लिये उन्हे क़ुरआने मजीद और अक़वाले मासूमीन (अ) में बार बार रोका गया और मना किया गया है।



बाज़ लोग ये ख़्याल करते हैं कि इत्तेहाद बैनुल मुसलेमीन का मतलब ये है कि हम अपने अक़ाएद व अहकाम से दस्त बरदार हो कर उनके



मसलक व मज़हब को अपना ले या क़बूल कर लें और उनके मज़हब के मुताबिक़ आमाल बजा लाने लगें।



ऐसा हरगिज़ नही है और अगर कोई इसका ये मतलब समझता है तो ये उसका ख़्याले ख़ाम है और कुछ नही।



बाज़ हज़रात ये भी कहते हैं कि हम तो इत्तेहाद करने के लिये राज़ी हैं और दिल से इत्तेहाद करना चाहते हैं मगर हमारे मुख़ालिफ़ जब इस अम्र में



कोई दिलचस्पी नही लेते या हमारी तरह हमारे ख़िलाफ़ साज़िशों से हाथ नही खींचते तो हमें भी क्या ज़रूरत है कि हम उन्हे इसकी दावत दें और इस पर इसरार करें ?



तो मैं ऐसे लोगों और उन भाईयों से ये कहना चाहूँगा कि इसके लिये हमें भी पैग़म्बरे इस्लाम (स) और मासूमीन (अ) की



सीरत से दर्स लेना चाहिये और उनकी तअस्सी करना चाहिये। पैग़म्बरे इस्लाम (स) को मालूम है कि ये काफ़िर ईमान लाने वाले नही हैं मगर फिर भी आप (स) बार बार दावते तौहीद देते हैं



ताकि उनके दिल अल्लाह के दीन की तरफ़ माएल हो जायें।



आँ हज़रत (स) के वह ख़ुतूत जो आपने अपने ज़माने के बादशाहों को तहरीर फ़रमाये हैं वह भी इसी बात का सुबूत हैं कि हक़



परस्तों को इबलाग़ में पहल और सबक़त करनी चाहिये और इस बात से मायूस नही होना चाहिये कि नतीजा क्या होगा ?



पैग़म्बरे इस्लाम (स) की रेहलत के बाद एक तवील मुद्दत तक मौला ए काऍनात (अ) का सुकूत करना इस बात की अलामत थी कि इस्लाम का शीराज़ा बिखरने से बच जाये।



जैसे भी हो अस्ले इस्लाम पर आँच न आने पाये आँ हज़रत (स) की मेहनत ज़ाया न होने पाये।



क्या आज के मुसलमान इस्लामी फ़िरक़ो के आपसी शीराज़े को बिखरने से बचाने के लिये इतना भी नही कर सकते कि एक दूसरे की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ायें और तमाम इस्लामी



फ़िरक़ व मज़ाहिब अपने इख़्तेलाफ़ात पर सुकूत अख़्तियार करके अमन व अमान के साथ मुत्तहिद हो जाये ताकि अस्ले इस्लाम बदनाम न हो।



क्या आज हम ऐसा नही कर सकते कि तंग नज़र व कोताह फ़िक्र मुसलमानों को जिनकी फ़िक्रें मुन्जमिद हैं या कर दी गयी हैं,



आगे बढ़ कर उन्हे अपना भाई होने का यक़ीन दिलायें, वह हमारे भाई हैं, ख़ुद से क़रीब लायें, तअस्सुब की ऐनक को किनारे करें और मंतिक़ी गुफ़्तुगू और



वाज़ेह दलाएल से एक दूसरे के मज़हब को समझें। मेहर व मोहब्बत से रिफ़ाक़त की फ़िज़ा ईजाद करें। ठंढे दिल व दिमाग़ और निहायत सब्र व हौसले से उनकी बातें,



उनकी गुफ़्तुगू और उनकी दलीलें सुनें उसका मुनासिब और नर्मी से जवाब दें।