चमत्कार और उससे संबंधित शंकायें
 



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मोजिज़ा और चमत्कार पैग़म्बरी सिद्ध करने का साधन है कि तो वे ऐसा क्यों करते थे? इस शंका के उत्तर में हम यह कहेंगे कि वास्तव में बहुत से ऐसे लोग थे जो

पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा मोजिज़े के प्रदर्शन और हर प्रकार से अपनी पैग़म्बरी के प्रमाण प्रस्तुत किये जाने के बाद भी बार- बार मोजिज़े और चमत्कार की मांग करते थे

और उनमें ज्ञान और विश्वास प्राप्त करने की भावना नहीं होती थी इसी लिए यह कदापि आवश्यक नहीं है कि हर ईश्वरीय दूत लोगों की मांगों पर किसी बाज़ीगर की भांति चमत्कार दिखाने लगे

बल्कि जब आवश्यक होता है तब ईश्वरीय दूत चमत्कार दिखाता है। इसी लिए यदि हम आज के युग में कोई असाधारण काम देखें तो उसे मोजिज़ा या चमत्कार

उस अर्थ में नहीं कह सकते जिसका वर्णन हमने अपनी आज की और पिछली चर्चाओं में की है।

वास्तव में मोजिज़ा पैग़म्बरों की पैग़म्बरी सिद्ध करने का साधन होता है और अतीत के जिन ईश्वरीय दूतों ने मोजिज़ा या विशेष अर्थ में चमत्कार का प्रदर्शन किया है वह उनके समाज की

परिस्थितयों के अनुकूल रहे हैं उदाहरण स्वरूप हज़रत मूसा, जिन्हें यहूदी, ईसाई और मुसलमान ईश्वरीय दूत मानते हैं

जिस काल में थे उसमें जादू का अत्यधिक चलन था और उन्हें

पराजित करने के लिए मिस्र के शासक फिरऔन ने जिसके बनाए हुए पिरामिड आज के लोगों के आकर्षण का केन्द्र हैं, जादूगरों को बुलाया था।

इसी लिए हजऱत मूसा को ऐसा चमत्कार दिया गया था

जो जादूगरों को असमर्थ करने की क्षमता रखता था या हज़रत ईसा का उदाहरण पेश किया जा सकता है।

उनके काल में चिकित्सकों का अत्यधिक सम्मान था इसी लिए उन्हें ऐसा चमत्कार दिया गया

जो चिकित्सकों के सामर्थ में नहीं था। या फिर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के काल में साहित्य को अत्याधिक महत्व प्राप्त था और अरब दूसरी भाषा

बोलने वाले सभी लोगों को गूंगा कहते थे इस काल में ईश्वर ने उन्हें क़ुरआन जैसा मोजिज़ा प्रदान किया जिसमें बार- बार साहित्यकारों को चुनौती दी गयी है कि वह उस जैसी या

उसके किसी एक अंश जैसी रचना करें।